Friday, March 16, 2018

समय का सदा सदुपयोग करना मनुष्य का सर्वोत्तम सिद्धान्त है। सदुपयोग सत पदार्थों के चिन्तन से ही सम्भव है। सत्य पदार्थ केवल श्यामा श्याम का नाम , रूप,लीला , गुण, धाम एवं जन ही हैं।
--------- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

जिस जीव के हृदय मे पश्चाताप है , वह परम उन्नति कर सकता है । परंतु जिसे अपने बुरे कर्मों पर दुःख नहीं होता , जो अपनी गिरि दशा का अनुभव नहीं करता , जिसे समय के व्यर्थ बीत जाने का पश्चताप नहीं , वह चाहे कितना भी बड़ा विद्वान हो , कैसा भी ज्ञानी हो , कितना भी विवेकी हो , वह उन्नति के शिखर पर कभी नहीं पहुँच सकता । जहाँ पूर्वकृत कर्मों पर सच्चे हृदय से पश्चाताप हुआ , जहां सर्वस्व त्याग कर श्री कृष्ण के चरणों मे जाने की इच्छा हुई , वहीं समझ लो उसकी उन्नति का श्री गणेश हो गया । वह शीघ्र ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

व्यर्थ चिंता मत करो , तुम सिर्फ हरि-गुरु का रुपध्यान करो और रो रोकर पुकारो मैं आ जाऊंगा ।
जैसे मैंने तुम्हें इस बार ढूंढ लिया था वैसे आगे भी ढूंढ लूंगा; यह मेरा काम है आप उसकी चिंता न करें ।
तुम सिर्फ निष्काम भाव से हरि-गुरु में ही अनन्य होकर साधना करते रहो , मेरा काम मै करुंगा ही जैसे सदा करते आया हूॅ, तुम अपना काम (मेरे द्वारा दिऐ उपदेशो के अनुसार साधना) करते रहो बस !! बाकी सब मेरा काम है मैं स्वयम् कर लूंगा, दृढ़ विश्वास करके साधना-पथ पर चलते रहो ।

----- तुम्हारा 'महाराजजी' ।

एक बड़ी विलक्षण बात यह है कि लोग बड़े दावे से यह कहा करते हैं कि संसार मिथ्या है,इसमें सुख नहीं है,फिर भी संसार की ही ओर तेजी से भागे जा रहे हैं। इसका एक रहस्य है,गंभीरतापूर्वक समझिये।
हम लोग संसार-सम्बन्धी धन,पुत्र,स्त्री,पति आदि के अभाव में झुंझला कर,'संसार मिथ्या है',ऐसा कह देते हैं। परन्तु ज्यों ही उपर्युक्त धन-पुत्रादि मिल जाते हैं,पुन: इसी में लिपट जाते हैं। वस्तुत:संसार को मिथ्या नहीं कहते। यथा-जब एक पिता का पुत्र मर जाता है तो उसके शव को पिता आदि श्मशान ले जाते हैं एवं यह नारा लगाते जाते हैं कि 'राम नाम सत्य है'। इस नारे का वास्तविक अर्थ तो यही है कि पुत्र किसी का नहीं होता,व्यर्थ ही उसमें आसक्त होकर लोग अशान्त होते हैं,सत्य वस्तु तो एकमात्र ईश्वर ही है। किन्तु ,ऐसा भाव पिता आदि का नहीं होता। आप कहेंगे,अवश्य होता होगा। परन्तु इसका परिचय तो तभी मिल सकता है जब कदाचित् पुत्र पुन: जीवित हो उठे। तब पिता आदि तत्क्षण 'राम नाम सत्य है' का नारा बन्द कर देंगे,क्योंकि अब बेटा सत्य है। यहाँ तक कि शव को जलाने के बाद लौटते समय भी कोई 'राम नाम सत्य है' नहीं बोलता। इसका अन्तरंग रहस्य कुछ और है। वह यह कि संसार में ऐसा कोई ही तत्त्वज्ञानी गृहस्थी होगा जो 'राम नाम सत्य है' को मंगलवाचक मानता हो। यदि किसी पिता की पुत्री श्वसुरालय के लिए विदा हो रही हो,पालकी चलने वाली हो और कोई महानुभाव उस समय 'राम नाम सत्य है' बोल दें तो कदाचित् वह पिटे बिना न छूटे। यदि राम नाम मंगलमय है, इतना भी ज्ञान किसी को होता तो वह तो बड़ा प्रसन्न होता कि हमारी पुत्री का यह गृहस्थ प्रवेश परम मंगलमय होगा। किन्तु,ऐसे आस्तिक गृहस्थी अंगुलियों पर गिने जाने वाले ही होंगे। क्योंकि समस्त संसार के लोग 'राम नाम सत्य है' का अर्थ यही लगाते हैं कि यदि यह नारा लगाया गया तो शायद कोई मर जायगा।अब सोचिये,राम नाम अमरत्व देने वाला है किन्तु,आस्तिक समाज उसका क्या सदुपयोग कर रहा है! वस्तुस्थिति तो यह है कि धन,पुत्र,स्त्री,पति आदि को ही हम लोग आनन्द का केन्द्र समझते हैं और उन्हीं की रक्षा एवं वृद्धि के लिए प्राय: ईश्वर को मानते हैं। तब फिर भला धन,पुत्रादि के अभाव को हम श्रेष्ठ कैसे मानेंगे ? हम तो धन नष्ट होने पर ही कहेंगे कि लक्ष्मी चंचल है,वह किसी एक की नहीं है। यही हमारा ज्ञान है जिसका भावार्थ पूर्ण अज्ञान ही है। जब-जब संसार सम्बन्धी किसी प्रिय वस्तु का अभाव होता है,हम यह कह देते हैं कि संसार मिथ्या है। किसी पुत्र ने पिता को डाँटा,किसी ने अपमान किया,बस ज्ञान हो गया कि पुत्र,पत्नी आदि सब स्वार्थी है,सब धोखेबाज हैं। मैं किसी से प्यार न करुँगा,मैंने जान लिया,समझ लिया,किन्तु दो मिनट बाद जैसे ही पुत्र या स्त्री ने कहा-क्षमा कीजियेगा,मैं भांग पीकर कुछ अनर्गल शब्द बोल गया था,आप तो मेरे सर्वस्व हैं,'बस,तुरन्त आपका ज्ञान बदल गया एवं आप कहने लगे-'वही तो मैं सोच रहा था कि मेरा पुत्र अथवा स्त्री अथवा पति ऐसा कैसे कह सकता है!'अर्थात् पुत्र एवं पति सब स्वार्थी हैं,यह ज्ञान अभाव में हुआ था,जब वे अनुकूल हो गये तब ज्ञान बदल गया। बस,यही स्थिति हमारी सर्वत्र, सर्वदा रहती है।भावार्थ यह कि हम लोग संसार के अभाव से घृणा करते हैं,संसार से नहीं।

----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Monday, March 12, 2018

You would be familiar with the word satsang. Sat means "Saint" or "Divine personality" and sang means "to associate". If sat, the Saint, is genuine and our sang, association with him, is also genuine, then we will attain our ultimate goal of God-realization and Divine Bliss. The Vedas state:
tadvigyānārthaṁ sa gurumevābhigachchhet
samitpāṇiḥ śhrotriyaṁ brahmaniṣhṭham (Mundakopanishad)

A true Saint is one who has complete knowledge of the scriptures,and also practical realization of God. He should be able to impart to us the theoretical knowledge of the Vedas. Furthermore, he should have attained Divine vision of God. He must possess the treasure of Divine Love Bliss. If someone has a cheque book but nothing in the bank, what can the cheque book achieve? If one merely talks about God, without having surrendered to Him and having attained Divine Love, then that talk will merely increase ones pride.
----JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.

कुछ समय का नियम बनाकर प्रतिदिन श्यामसुंदर का स्मरण करते हुए रोकर उनके नाम-लीला-गुण आदि का संकीर्तन एवं स्मरण करो एवं शेष समय में संसार का आवश्यक कार्य करते हुए बार-बार यह महसूस करो कि श्यामसुंदर हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहें हैं, और उन्हें आप दिखा-दिखा कर कार्य कर रहे हैं। इस प्रकार कर्म भी न्यायपूर्ण होगा एवं थकावट भी न होगी। एक बार करके देखिये।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
"संसार में हमें 'सुख' दिखायी पड़ता है, पर वास्तव में संसार का सुख ,सुख नहीं धोखा है।
-----श्री महाराजजी।"

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...