Wednesday, April 4, 2018

सारा संसार मायाजनित अज्ञान के द्वारा अन्धा हो रहा है परन्तु अपने को कोई भी अज्ञानी नहीं समझता सभी ज्ञानी समझते हैं।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

जगद्गुरूत्तम वंदना.....!!!
वेदों शास्त्रों, पुराणों, गीता,भागवत ,रामायण तथा अन्यानय धर्मग्रन्थों के शाश्वत अलौकिक ज्ञान के संवाहक तुमको कोटि-कोटि प्रणाम। जन-जन तक यह ज्ञान पहुँचाकर दैहिक ,दैविक,भौतिक तापों से तप्त कलियुगी जीवों के लिए तुमने महान उपकार किया है जो सरलतम,सरस,सार्वत्रिक ,सार्वभौमिक,भक्तियोग प्राधान्य मार्ग तुमने प्रतिपादित किया है,वह विश्व शांति का सर्व-सुगम साधन है,असीम शाश्वत आनंद का मार्ग है। सभी धर्मानुयायीयों को मान्य है।
हे जगद्गुरूत्तम! तुमको कोटि-कोटि प्रणाम। कोटि-कोटि प्रणाम।
तुम्हारे असंख्य प्रवचन , तुम्हारे द्वारा श्री श्यामा श्याम का गुणगान, तुम्हारे द्वारा रचित ग्रंथ,तुम्हारे द्वारा निर्मितस्मारक, 'भक्ति मंदिर','प्रेम मंदिर', तुम्हारे ही अनेक रूप हैं,इस सत्य का साक्षात्कार करा दो। हमारी इस पुकार को सुनकर अनसुना न करने वाले 'पतित पुकार सुनत ही धावत' का पालन करने वाले शीघ्रातिशीघ्र आकर थाम लो। भवसिंधु में डूबने से बचा लो। मगरमच्छ,घड़ियाल की तरह काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद मात्सर्य हमें निगलने के लिए हमारी और बढ़े आ रहे हैं। कहीं तुम्हारा सारा परिश्रम व्यर्थ न चला जाये अत: आकार हमे बचा लो।
भक्तों के आंसुओं से शीघ्र प्रसन्न होने वाले भक्तवत्सल सद्गुरु देव तुमको कोटि-कोटि प्रणाम।
हे हमारे जीवन धन! हमारे प्राण! हमारे पथ प्रदर्शक ! हमारे इस विश्वास को दृढ़ कर दो कि तुम सदा सर्वत्र हमारे साथ हो,हमारे साथ ही चल रहे हो,खा रहे हो,बोल रहे हो,हँस रहे हो,खेल रहे हो,हर क्रिया में तुम्हारी ही उपस्थिती का अनुभव हो। तुम्हारा नाम लेकर तुम्हें पुकारें,और तुम सामने आ जाओ। नाम में नामी विध्यमान है इस सिद्धान्त को हमारे मस्तिक्ष में बारंबार भरने वाले! अब इसे क्रियात्मक रूप में हमें अनुभव करवा दो।
हे दयानिधान! नाम में प्रकट होकर कृपा करने वाले कृपालु!
तुमको कोटि-कोटि प्रणाम।
हे जगद्गुरूत्तम! भगवती नन्दन!
तुम्हारी महिमा का गुणगान सहस्त्रों मुखों से भी असंभव है। तुम्हारी वंदना में क्या लिखें कोई भी लौकिक शब्द तुम्हारी स्तुति के योग्य नहीं है।
बस तुम्हारा 'भक्तियोग तत्त्वदर्शन ' युगों-युगों तक जीवों का मार्गदर्शन करता रहेगा।
तुम्हारे श्री चरणों में यही प्रार्थना है कि जो ज्ञान तुमने प्रदान किया उसको हम संजोये रहे और तुम्हारे द्वारा बताये गये आध्यात्मिक ख़जाने की रक्षा करते हुएतुम्हारे बताए हुए मार्ग पर चल सकें।
धर्म,संस्कृति ,ज्ञान,भक्ति के जीवंत स्वरूप हे जगद्गुरूत्तम ! तुमको कोटि-कोटि प्रणाम। कोटि-कोटि प्रणाम।

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Friday, March 16, 2018

कामना एवं प्रेम....!!!
कामना ' प्रेम ' का विरोधी तत्व है । लेने - देने का नाम व्यापार है । जिसमें प्रेमास्पद से कुछ याचना की भावना हो , वह प्रेम नहीं है । जिसमें सब कुछ देने पर भी तृप्ति न हो , वही प्रेम है । संसार में कोई व्यक्ति किसी से इसलिये प्रेम नहीं कर सकता क्योंकि प्रत्येक जीव स्वार्थी है वह आनन्द चाहता है , अस्तु लेने - लेने की भावना रखता है । जब दोनों पक्ष लेने- लेने की घात में हैं तो मैत्री कितने क्षण चलेगी ? तभी तो स्त्री - पति , बाप - बेटे में दिन में दस बार टक्कर हो जाती है । जहाँ दोनों लेने - लेने के चक्कर में हैं , वहाँ टक्कर होना स्वाभाविक ही है और जहाँ टक्कर हुई , वहीं वह नाटकीय स्वार्थजन्य प्रेम समाप्त हो जाता है । वास्तव में कामनायुक्त प्रेम प्रतिक्षण घटमान होता है ,जबकि - दिव्य प्रेम प्रतिक्षण वर्द्धमान होता है । कामना अन्धकार - स्वरुप है , प्रेम - प्रकाश स्वरुप है ।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
समय का सदा सदुपयोग करना मनुष्य का सर्वोत्तम सिद्धान्त है। सदुपयोग सत पदार्थों के चिन्तन से ही सम्भव है। सत्य पदार्थ केवल श्यामा श्याम का नाम , रूप,लीला , गुण, धाम एवं जन ही हैं।
--------- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

जिस जीव के हृदय मे पश्चाताप है , वह परम उन्नति कर सकता है । परंतु जिसे अपने बुरे कर्मों पर दुःख नहीं होता , जो अपनी गिरि दशा का अनुभव नहीं करता , जिसे समय के व्यर्थ बीत जाने का पश्चताप नहीं , वह चाहे कितना भी बड़ा विद्वान हो , कैसा भी ज्ञानी हो , कितना भी विवेकी हो , वह उन्नति के शिखर पर कभी नहीं पहुँच सकता । जहाँ पूर्वकृत कर्मों पर सच्चे हृदय से पश्चाताप हुआ , जहां सर्वस्व त्याग कर श्री कृष्ण के चरणों मे जाने की इच्छा हुई , वहीं समझ लो उसकी उन्नति का श्री गणेश हो गया । वह शीघ्र ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

व्यर्थ चिंता मत करो , तुम सिर्फ हरि-गुरु का रुपध्यान करो और रो रोकर पुकारो मैं आ जाऊंगा ।
जैसे मैंने तुम्हें इस बार ढूंढ लिया था वैसे आगे भी ढूंढ लूंगा; यह मेरा काम है आप उसकी चिंता न करें ।
तुम सिर्फ निष्काम भाव से हरि-गुरु में ही अनन्य होकर साधना करते रहो , मेरा काम मै करुंगा ही जैसे सदा करते आया हूॅ, तुम अपना काम (मेरे द्वारा दिऐ उपदेशो के अनुसार साधना) करते रहो बस !! बाकी सब मेरा काम है मैं स्वयम् कर लूंगा, दृढ़ विश्वास करके साधना-पथ पर चलते रहो ।

----- तुम्हारा 'महाराजजी' ।

एक बड़ी विलक्षण बात यह है कि लोग बड़े दावे से यह कहा करते हैं कि संसार मिथ्या है,इसमें सुख नहीं है,फिर भी संसार की ही ओर तेजी से भागे जा रहे हैं। इसका एक रहस्य है,गंभीरतापूर्वक समझिये।
हम लोग संसार-सम्बन्धी धन,पुत्र,स्त्री,पति आदि के अभाव में झुंझला कर,'संसार मिथ्या है',ऐसा कह देते हैं। परन्तु ज्यों ही उपर्युक्त धन-पुत्रादि मिल जाते हैं,पुन: इसी में लिपट जाते हैं। वस्तुत:संसार को मिथ्या नहीं कहते। यथा-जब एक पिता का पुत्र मर जाता है तो उसके शव को पिता आदि श्मशान ले जाते हैं एवं यह नारा लगाते जाते हैं कि 'राम नाम सत्य है'। इस नारे का वास्तविक अर्थ तो यही है कि पुत्र किसी का नहीं होता,व्यर्थ ही उसमें आसक्त होकर लोग अशान्त होते हैं,सत्य वस्तु तो एकमात्र ईश्वर ही है। किन्तु ,ऐसा भाव पिता आदि का नहीं होता। आप कहेंगे,अवश्य होता होगा। परन्तु इसका परिचय तो तभी मिल सकता है जब कदाचित् पुत्र पुन: जीवित हो उठे। तब पिता आदि तत्क्षण 'राम नाम सत्य है' का नारा बन्द कर देंगे,क्योंकि अब बेटा सत्य है। यहाँ तक कि शव को जलाने के बाद लौटते समय भी कोई 'राम नाम सत्य है' नहीं बोलता। इसका अन्तरंग रहस्य कुछ और है। वह यह कि संसार में ऐसा कोई ही तत्त्वज्ञानी गृहस्थी होगा जो 'राम नाम सत्य है' को मंगलवाचक मानता हो। यदि किसी पिता की पुत्री श्वसुरालय के लिए विदा हो रही हो,पालकी चलने वाली हो और कोई महानुभाव उस समय 'राम नाम सत्य है' बोल दें तो कदाचित् वह पिटे बिना न छूटे। यदि राम नाम मंगलमय है, इतना भी ज्ञान किसी को होता तो वह तो बड़ा प्रसन्न होता कि हमारी पुत्री का यह गृहस्थ प्रवेश परम मंगलमय होगा। किन्तु,ऐसे आस्तिक गृहस्थी अंगुलियों पर गिने जाने वाले ही होंगे। क्योंकि समस्त संसार के लोग 'राम नाम सत्य है' का अर्थ यही लगाते हैं कि यदि यह नारा लगाया गया तो शायद कोई मर जायगा।अब सोचिये,राम नाम अमरत्व देने वाला है किन्तु,आस्तिक समाज उसका क्या सदुपयोग कर रहा है! वस्तुस्थिति तो यह है कि धन,पुत्र,स्त्री,पति आदि को ही हम लोग आनन्द का केन्द्र समझते हैं और उन्हीं की रक्षा एवं वृद्धि के लिए प्राय: ईश्वर को मानते हैं। तब फिर भला धन,पुत्रादि के अभाव को हम श्रेष्ठ कैसे मानेंगे ? हम तो धन नष्ट होने पर ही कहेंगे कि लक्ष्मी चंचल है,वह किसी एक की नहीं है। यही हमारा ज्ञान है जिसका भावार्थ पूर्ण अज्ञान ही है। जब-जब संसार सम्बन्धी किसी प्रिय वस्तु का अभाव होता है,हम यह कह देते हैं कि संसार मिथ्या है। किसी पुत्र ने पिता को डाँटा,किसी ने अपमान किया,बस ज्ञान हो गया कि पुत्र,पत्नी आदि सब स्वार्थी है,सब धोखेबाज हैं। मैं किसी से प्यार न करुँगा,मैंने जान लिया,समझ लिया,किन्तु दो मिनट बाद जैसे ही पुत्र या स्त्री ने कहा-क्षमा कीजियेगा,मैं भांग पीकर कुछ अनर्गल शब्द बोल गया था,आप तो मेरे सर्वस्व हैं,'बस,तुरन्त आपका ज्ञान बदल गया एवं आप कहने लगे-'वही तो मैं सोच रहा था कि मेरा पुत्र अथवा स्त्री अथवा पति ऐसा कैसे कह सकता है!'अर्थात् पुत्र एवं पति सब स्वार्थी हैं,यह ज्ञान अभाव में हुआ था,जब वे अनुकूल हो गये तब ज्ञान बदल गया। बस,यही स्थिति हमारी सर्वत्र, सर्वदा रहती है।भावार्थ यह कि हम लोग संसार के अभाव से घृणा करते हैं,संसार से नहीं।

----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...