Saturday, April 14, 2018

जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगो से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।
-----जगदगुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज।

श्रीकृष्ण के अवतार के जितने भी कारण शास्त्रों में बताये गए हैं। वे सब ठीक ही हैं। किन्तु प्रमुख कारण जीवों पर अकारण कृपा करना ही है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
प्रश्न : जो संत या भगवान की निंदा करे ,उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?
उत्तर : श्रीमहाराजजी द्वारा:- जिससे तुम्हारा 24 घंटे का साथ है,उसकी बात सुनकर तो हँस कर उसकी बात सुनलों ,वह खिसिया कर चुप हो जायेगा। जिससे कभी-कभी का संबंध है,उसको झिड़क दो ,उससे संबंध खत्म कर दो, हर जगह अलग-अलग व्यवहार करना पड़ेगा ।
ब्रह्म सर्वव्यापक, है सर्वनियन्ता है, सर्वसृष्टा है। जबकि जीव व्याप्य है, नियम्य है, सृज्य है। जीव के ब्रह्म से अनेक संबंध हैं। वस्तुतः श्रीकृष्ण ही जीव के माता, पिता, भ्राता, स्वामी, सखा, पुत्र, प्रियतम, सब कुछ हैं। इन्हीं संबंधों से केवल श्रीकृष्ण की निष्काम सेवा करनी है।
........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Wednesday, April 4, 2018

जगदगुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज के श्रीमुख से अमृत वचन:
जब संसारमात्र ही सदोष है,तो हम कहाँ तक दोष-चिन्तन करेंगे। यदि यह कहो कि क्या करें,दोष-दर्शन स्वभाव-सा बन गया,तो हमें कोई आपत्ति नहीं,तुम दोष देख सकते हो,किन्तु दूसरों के नहीं,अपने ही दोष क्या कम हैं। अपने दोषों को देखने में तुम्हारा स्वभाव भी न नष्ट होगा,तथा साथ ही एक महान् लाभ भी होगा। वह महान् लाभ तुलसी के शब्दों में- ' जाने ते छीजहिं कछु पापी' अर्थात् दोष जान लेने पर कुछ न कुछ बचाव हो जाता है,क्योंकि वह जीव उनसे बचने का कुछ न कुछ अवश्य प्रयत्न करता है।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
श्यामसुन्दर पर तुम्हारा इतना अधिकार है जितना अपने आप पर भी नहीं है। वे तुमसे इतना प्यार करते है जितना तुम अपने आप से भी नहीं करते।
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

साधना है एक ही बस, भक्ति हरि की प्यारे।
---श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...