Wednesday, May 2, 2018

भगवान का बल निरन्तर हमारे पास रहने पर भी सक्रिय नहीं होता, इसका कारण है कि हम उसे स्वीकार नहीं करते। जब भी हम भगवान् के बल का अनुभव करने लगेंगे, तभी वह बल सक्रिय हो जायेगा और हम निहाल हो जाएंगे।
हमारी भोगों में सुख की आस्था इतनी दृढ़मूल हो रही है कि वैराग्य के शब्दों से वह दूर नहीं होती। किसी महान विपत्ति का प्रहार तथा भगवान् अथवा उनके किसी प्रेमीजन महापुरुष की कृपा ही इस आस्था को दूर कर सकते हैं।
शरणागत वही हो पाता है, जो दीन है। जिसे अपनी बुद्धि, सामर्थ्य, योग्यता का अभिमान है, वह किसी के शरण क्यों होना चाहेगा। जब अपना सारा बल, बलों की आशा - भरोसा टूट जाते हैं, तब वह भगवान् की और ताकता है और उनका आश्रय चाहता है।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
तेरी मेहरबानी का है बोझ इतना कि मैं तो उठाने के क़ाबिल नहीं हूँ।
My Lord, You have bestowed so much grace on me,that I am unable to lift this heavy load.
मैं आ तो गया हूँ ,मगर जानता हूँ कि तेरे दर पे आने के क़ाबिल नहीं हूँ।
I have come to You fully knowing that I am not worthy of coming to You.
जमाने की चाहत में खुद को भुलाया ,तेरा नाम हरगिज़ जुबां पर न लाया।
My strong desire for the world made me forget myself and my lips never uttered Your name.
ख़तावार हूँ मैं,गुनाहगार हूँ मैं,तुम्हें मुँह दिखाने के काबिल नहीं हूँ।
I am an offender and sinner;I am not worthy of showing my face to You.
तुम्हीं ने अदा की मुझे ज़िंदगानी ,मगर तेरी महिमा मैंने न जानी।
You gave me life, but I did not glorify You in life.
कर्ज़दार तेरी दया का हूँ इतना कि क़र्ज़ा चुकाने के क़ाबिल नहीं हूँ।
I am so indebted to you for Your grace,that I am unable to repay my debt.
ये माना कि दाता है तू कुल जहाँ का,मगर झोली आगे फैलाऊँ मैं कैसे?
I know You are the supreme Provider,yet how can I ask You for anything?
जो पहले दिया है वो भी कुछ कम नहीं है,उसी को निभाने के क़ाबिल नहीं हूँ।
What you have given me already,I am not able to contain.
तमन्ना यही है कि सर को झुका दूँ।तेरा दीद एक बार दिल में मैं पा लूँ।
My only desire now is to bow my head and see You in my heart.
सिवा दिल के टुकड़ों के ऐ मेरे दाता,कुछ भी चढ़ाने के क़ाबिल नहीं हूँ।।
Oh, my Lord! Except for my heart,I have nothing to offer You.
****RADHEY-RADHEY****
जगदगुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज के श्रीमुख से अमृत वचन:
जब संसारमात्र ही सदोष है,तो हम कहाँ तक दोष-चिन्तन करेंगे। यदि यह कहो कि क्या करें,दोष-दर्शन स्वभाव-सा बन गया,तो हमें कोई आपत्ति नहीं,तुम दोष देख सकते हो,किन्तु दूसरों के नहीं,अपने ही दोष क्या कम हैं। अपने दोषों को देखने में तुम्हारा स्वभाव भी न नष्ट होगा,तथा साथ ही एक महान् लाभ भी होगा। वह महान् लाभ तुलसी के शब्दों में- ' जाने ते छीजहिं कछु पापी' अर्थात् दोष जान लेने पर कुछ न कुछ बचाव हो जाता है,क्योंकि वह जीव उनसे बचने का कुछ न कुछ अवश्य प्रयत्न करता है।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
अगर उसकी डांट पर,उसके समझाने पर,उसके दोष निकालने पर,जीव विभोर हो जाता है,रोम-रोम से,तो समझ लो,उसका कल्याण हो गया।लेकिन जब तक विभोर नहीं होता है वो,समझ लो कि वह शरणागत है ही नहीं। वह धोखे में है,वह समझता है कि मैंने प्रणाम कर लिया है,चरणामृत ले लिया है,आरती कर लिया है तो मैं गुरु जी के शरणागत हो गया। यह सब बहिरंग क्रियायें है। मन-बुद्धि की शरणागति से ही काम बनेगा।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
जब आज को कल पर टालते ही रहोगे तो उम्र चाहे जितनी हो कभी भगवत भजन प्रारम्भ नही कर सकोगे। बुढापे मे तो अपना शरीर ही सम्भालना मुश्किल हो जाता है। भजन एवं सेवा क्या करोगे ? अगर तुम्हारा भगवत प्राप्ति, भगवत प्रेम ही लक्ष्य है तो फिर देर किस बात कि? किसका इन्तजार है? करुणा निधि के समक्ष दीन बनकर एक बार केवल एक बार सच्चे हृदय से कहकर तो देखो। वे सब कुछ दे देंगे।
---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
व्यर्थ चिंता मत करो , तुम सिर्फ हरि-गुरु का रुपध्यान करो और रो रोकर पुकारो मैं आ जाऊंगा ।
जैसे मैंने तुम्हें इस बार ढूंढ लिया था वैसे आगे भी ढूंढ लूंगा; यह मेरा काम है आप उसकी चिंता न करें ।
तुम सिर्फ निष्काम भाव से हरि-गुरु में ही अनन्य होकर साधना करते रहो , मेरा काम मै करुंगा ही जैसे सदा करते आया हूॅ, तुम अपना काम (मेरे द्वारा दिऐ उपदेशो के अनुसार साधना) करते रहो बस !! बाकी सब मेरा काम है मैं स्वयम् कर लूंगा, दृढ़ विश्वास करके साधना-पथ पर चलते रहो ।
----- तुम्हारा 'महाराजजी' ।

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दूसरे के दोष न देखो,परनिंदा न करो। दूसरों को सुधारने के लिये भी उनके दोष न देखो। भगवतप्राप्ति से पहले ऐसा कौन है जो दोषरहित हो। अरे! कोई न कोई दोष तो हर किसी में विध्यमान है ही। सभी माया के अंडर में हैं,सभी दोषी हैं। तुम लोगों को दूसरों की तो बड़ी भारी फिक्र है लेकिन स्वयं का तुम्हारा क्या होगा,इसकी फिक्र क्यों नहीं करते हो।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...