Wednesday, June 6, 2018

प्रत्येक आत्मा श्यामसुन्दर का देह है। और जैसे आपका यह प्राकृत देह आपकी ही अर्थात् आत्मा की ही सर्विस करता है, प्रतिक्षण आत्मा को सुख देने के लिये ही संकल्प से लेकर क्रियायें तक करता है। उसी प्रकार श्यामसुन्दर का देह अर्थात् आत्मा भी श्यामसुन्दर का नित्य किंकर है, किन्तु इस आत्मा ने अनादिकाल से देह को आत्मा मान लिया अर्थात् आत्मा को देही नहीं माना, देह मान लिया, इस भ्रम के कारण देह सम्बन्धी विषयों में अर्थात् संसार के पदार्थों को विषय बनाकर, इन्द्रियों के सुखों में लिप्त हो गया और यह क्रम अनन्तानन्त युगों से चला आ रहा है। अगर कभी सौभाग्य से कोई जीव स्व स्वरुप को जान ले अर्थात् ' मैं ' को श्यामसुन्दर का नित्य किंकर रियलाइज करे, विश्वासपूर्वक माने, तो फिर श्यामसुन्दर की प्राप्ति में कुछ भी देर नहीं,कुछ भी साधना की अपेक्षा नहीं।
---- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
यह मनुष्य का शरीर बार–बार नहीं मिलता। दयामय भगवान् चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् दया करके कभी मानव देह प्रदान करते हैं। मानव देह देने के पूर्व ही संसार के वास्तविक स्वरूप का परिचय कराने के लिए गर्भ में उल्टा टाँग कर मुख तक बाँध देते हैं। जब गर्भ में बालक के लिए कष्ट असह्य हो जाता है तब उसे ज्ञान देते हैं और वह प्रतिज्ञा करता है कि मुझे गर्भ से बाहर निकाल दीजिये, मैं केवल आपका ही भजन करूँगा । जन्म के पश्चात् जो श्यामसुन्दर को भूल जाता है, उसकी वर्तमान जीवन में भी गर्भस्थ अवस्था के समान ही दयनीय दशा हो जाती है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यह मानव देह देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, इसीलिये सावधान हो कर श्यामसुन्दर का स्मरण करो।
( प्रेम रस मदिरा:सिद्धान्त–माधुरी )
---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:- राधा गोविन्द समिति।
अरे मनुष्याे! श्रद्धा कराे, श्रद्धा पैदा कराे, गुरु वाक्य पर पूर्ण विश्वास करो। पहले ही अनुभव नही हाेगा। अजी पहले अनुभव कराओ ताे हम विश्वास करें। पहले अनुभव कराओ, पहले डिग्री मिल जाये उसके बाद पढ़ाई शुरु करेंगे। पहले फल मिल जाये,फिर बीज डालेंगे खेत में। संसार में ऐसा कहीं हुआ है? बस,भगवान् के एरिया में आप इम्पाँसिबल बात करना चाहते है।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
हे! दया के सागर। अब मेरी और निहारों और फ़िर जो उचित हो करो,यदि मेरी कमी के कारण मुझे आप नहीं मिल रहे हो तो,फ़िर कमी को इसी क्षण मिटा दो।
-----जगदगुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज।
भगवान की उस रूप माधुरी का वर्णन कौन कर सकता है?वे एक बार जिसकी ओर प्रेम की नजर से देख लेते; उसीपर प्रेमसुधा बरसा कर उसे अमर कर देते,उसकी सारी विषयासक्ति को नष्ट कर अपना प्रेमी बना लेते। पंडित जगन्नाथ जी कहते हैं-
"रे चित्त!तेरे हित के लिए तुझे सावधान किये देता हूँ। कहीं तू उस वृन्दावन में गाय चराने वाले,नवीन नील मेघ के सामान कान्ति वाले छैल को अपना बंधू न बना लेना,वह सौन्दर्य रूप अमृत बरसाने वाली अपनी मंद मुस्कान से तुझे मोहित करके तेरे प्रिय समस्त विषयो को तुरंत नष्ट कर देगा।"
जय श्री राधे।

Monday, May 28, 2018

तुम ही मम नंदकुमार, थे हो रहिहौ सरकार।
तुम ही मम साँचो यार,टुक हमरिहुँ ओर निहार।
तू अंशी नंदकुमार ,मैं तो हूँ अंश तिहार।
यह नात सोचु सरकार, टुक हमरिहुँ ओर निहार।।
------ जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
श्री महाराजजी से प्रश्न:- संसार में और भगवत क्षेत्र में हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर:- भगवान से प्यार न करने के कारण आत्मशक्ति गिर गयी है इसलिए हृदय कठोर नहीं रह सकता संसार में,पिघल जाता है। यह दोष है। तो जितना भगवान की और पिघले उतना इधर कठोर हो। ऐसा balance होना चाहिए। संसार अलग है भगवान अलग है। दोनों में अलग-अलग हिसाब किताब है। चालाकी होनी चाहिए; संसार में कोई सिर काट के चरणों में रख दे तो भी यह न समझो कि यह हमारे सुख के लिए ऐसा कर रहा है। संसार में अपने स्वार्थ के लिए ही सब लोग काम करते हैं,यह सिद्धान्त को सदा याद रखो और जब भगवान के area में जा रहे हो तो वहाँ complete surrender करो। वहाँ बुद्धि लगाया कि बरबाद हुए। बड़े बड़े सरस्वती व्रहस्पति का सर्वनाश हो गया,साधारण जीव कि क्या गिनती है? तो दोनों एरिया अलग अलग हैं,अलग अलग सिद्धान्त है,अलग अलग प्रक्रियाएँ हैं।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...