This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Wednesday, June 6, 2018
भगवान की उस रूप माधुरी का वर्णन कौन कर सकता है?वे एक बार जिसकी ओर प्रेम की नजर से देख लेते; उसीपर प्रेमसुधा बरसा कर उसे अमर कर देते,उसकी सारी विषयासक्ति को नष्ट कर अपना प्रेमी बना लेते। पंडित जगन्नाथ जी कहते हैं-
"रे चित्त!तेरे हित के लिए तुझे सावधान किये देता हूँ। कहीं तू उस वृन्दावन में गाय चराने वाले,नवीन नील मेघ के सामान कान्ति वाले छैल को अपना बंधू न बना लेना,वह सौन्दर्य रूप अमृत बरसाने वाली अपनी मंद मुस्कान से तुझे मोहित करके तेरे प्रिय समस्त विषयो को तुरंत नष्ट कर देगा।"
जय श्री राधे।
"रे चित्त!तेरे हित के लिए तुझे सावधान किये देता हूँ। कहीं तू उस वृन्दावन में गाय चराने वाले,नवीन नील मेघ के सामान कान्ति वाले छैल को अपना बंधू न बना लेना,वह सौन्दर्य रूप अमृत बरसाने वाली अपनी मंद मुस्कान से तुझे मोहित करके तेरे प्रिय समस्त विषयो को तुरंत नष्ट कर देगा।"
जय श्री राधे।
Monday, May 28, 2018
श्री महाराजजी से प्रश्न:- संसार में और भगवत क्षेत्र में हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर:- भगवान से प्यार न करने के कारण आत्मशक्ति गिर गयी है इसलिए हृदय कठोर नहीं रह सकता संसार में,पिघल जाता है। यह दोष है। तो जितना भगवान की और पिघले उतना इधर कठोर हो। ऐसा balance होना चाहिए। संसार अलग है भगवान अलग है। दोनों में अलग-अलग हिसाब किताब है। चालाकी होनी चाहिए; संसार में कोई सिर काट के चरणों में रख दे तो भी यह न समझो कि यह हमारे सुख के लिए ऐसा कर रहा है। संसार में अपने स्वार्थ के लिए ही सब लोग काम करते हैं,यह सिद्धान्त को सदा याद रखो और जब भगवान के area में जा रहे हो तो वहाँ complete surrender करो। वहाँ बुद्धि लगाया कि बरबाद हुए। बड़े बड़े सरस्वती व्रहस्पति का सर्वनाश हो गया,साधारण जीव कि क्या गिनती है? तो दोनों एरिया अलग अलग हैं,अलग अलग सिद्धान्त है,अलग अलग प्रक्रियाएँ हैं।
कृपया इसे ध्यान से पढें........!!!
श्री महाराजजी के पुराने सत्संगी जो उनके अत्यंत निकट थे,उन्होने बताया।
'एक बार महाराजजी मसूरी में थे तो वहाँ एक पुराना सत्संगी आया।जब वो महाराजजी के पास गया तो महाराजजी ने उससे पूछा,"तू आ गया?"
सत्संगी ने कहा"हाँ महाराजजी, आपकी कृपा से आ गया"। फिर महाराजजी किसी अन्य सत्संगी से वार्ता करने लगे और पुराने सत्संगी की ओर ध्यान नहीं दिया।
फ़िर थोड़ी देर बाद उसी पुराने सत्संगी से महाराजजी ने पूछ, "तू आ गया? " और उसने भी वही उत्तर दिया कि "हाँ महाराजजी, आपकी कृपा से आ गया"।
फिर महाराजजी किसी और सत्संगी के साथ व्यस्त हो गए। थोड़ी देर बाद महाराजजी ने उसी सत्संगी से कहा"तुम जानते हो कृपा क्या होती है ?"
सत्संगी ने कहा"नहीं महाराजजी,आप ही बताइये।".
तब महाराजजी ने कहा "एक बार श्री कृष्ण कहीं जा रहे थे और उन्हे राधारानी से विरह महसूस हो रहा था।उन्हें बहुत ज्यादा विरह सता रहा था, फिर वे किसी वृक्ष के सहारे गिरे, और उनका हाथ किसी गंदे तालाब मे जा गिरा। जब उन्होने अपना हाथ बाहर निकाला तो उन्होने देखा कि उनके हाथ मे बहुत सारे कीड़े हैं। ठाकुरजी ने सोचा, "अब ये कीड़े मेरे हाथ मे आएँ हैं तो मै इनको फिर उस गंदे तालाब मे नही डालूंगा,मैं इन्हें मनुष्य शरीर दूंगा।पर फिर उन्होने सोचा कि सिर्फ मनुष्य देह से काम नहीं बनेगा,मैं धरती पर अवतरित होकर इनका गुरु स्वयं बनूंगा।"
फिर महाराजजी ने तेज स्वर मे कहा"तुम सब वही कीड़े हो"।
सत्संगी ने कहा"हाँ महाराजजी, आपकी कृपा से आ गया"। फिर महाराजजी किसी अन्य सत्संगी से वार्ता करने लगे और पुराने सत्संगी की ओर ध्यान नहीं दिया।
फ़िर थोड़ी देर बाद उसी पुराने सत्संगी से महाराजजी ने पूछ, "तू आ गया? " और उसने भी वही उत्तर दिया कि "हाँ महाराजजी, आपकी कृपा से आ गया"।
फिर महाराजजी किसी और सत्संगी के साथ व्यस्त हो गए। थोड़ी देर बाद महाराजजी ने उसी सत्संगी से कहा"तुम जानते हो कृपा क्या होती है ?"
सत्संगी ने कहा"नहीं महाराजजी,आप ही बताइये।".
तब महाराजजी ने कहा "एक बार श्री कृष्ण कहीं जा रहे थे और उन्हे राधारानी से विरह महसूस हो रहा था।उन्हें बहुत ज्यादा विरह सता रहा था, फिर वे किसी वृक्ष के सहारे गिरे, और उनका हाथ किसी गंदे तालाब मे जा गिरा। जब उन्होने अपना हाथ बाहर निकाला तो उन्होने देखा कि उनके हाथ मे बहुत सारे कीड़े हैं। ठाकुरजी ने सोचा, "अब ये कीड़े मेरे हाथ मे आएँ हैं तो मै इनको फिर उस गंदे तालाब मे नही डालूंगा,मैं इन्हें मनुष्य शरीर दूंगा।पर फिर उन्होने सोचा कि सिर्फ मनुष्य देह से काम नहीं बनेगा,मैं धरती पर अवतरित होकर इनका गुरु स्वयं बनूंगा।"
फिर महाराजजी ने तेज स्वर मे कहा"तुम सब वही कीड़े हो"।
जय श्री राधे।
साधक को अपनी शरणागति पर ध्यान देना चाहिए। वैसे आप लोगों को लगता है कि हम पूर्ण शरणागत हैं लेकिन वस्तुतः ऐसा है नही। छोटी सी भी बात आप से कही जाती है, आपका तुरंत उत्तर होता है नहीं हमने तो ऐसा नहीं किया अथवा ऐसा किया तो नहीं था न जाने कैसे हो गया? बाहर से आप मान भी लें लेकिन भीतर से अपनी गलती स्वीकार नहीं करते। गुरु आपके अन्दर की बात नोट करते हैं। वह परीक्षा भी लेता है। और साधक परीक्षा में फेल हो गया तब भी गुरु बारम्बार परीक्षा लेना बंद नहीं करता। जिस कक्षा का जीव है उसी कक्षा का परचा उसको दिया जाता है। अगर आप परीक्षा देने से घबराएंगे तो आप कभी भी भगवद प्राप्ति नहीं कर सकेंगे। इस प्रकार बार बार परीक्षा देते हुए हमें शरणागति को पूर्ण करना है।
............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
अरे मनुष्याे! श्रद्धा कराे, श्रद्धा पैदा कराे, गुरु वाक्य पर पूर्ण विश्वास करो। पहले ही अनुभव नही हाेगा। अजी पहले अनुभव कराओ ताे हम विश्वास करें। पहले अनुभव कराओ, पहले डिग्री मिल जाये उसके बाद पढ़ाई शुरु करेंगे। पहले फल मिल जाये,फिर बीज डालेंगे खेत में। संसार में ऐसा कहीं हुआ है? बस,भगवान् के एरिया में आप इम्पाँसिबल बात करना चाहते है।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
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