Thursday, July 19, 2018

The philosophy of #Divine #love is an #eternal Truth, the path of #Divine #Love #Consciousness (Raganuga Bhakti) is an Eternal Religion, and the Bliss of #Radha #Krishna is the actual Divine substance your #soul has been looking for since eternity.

मन भावन सावन आय रे।
घनन घनन घन गरजि तरजि सखि! मोहिं विरहिनि डरपाय रे।
चम चम चम चम चमकि चमकि जनु, चपला मोहिं चिढ़ाय रे।
पिउ पिउ कहि पापी पपिहा सखि! जनु मोहिं जरिहिं जराय रे।
कोकिल कूकि कूकि कलकंठहिं, जनु कटु वचन सुनाय रे।
नाचि नाचि चहुँ ओर मोर गन, जनु तनु सुधि बिसराय रे।
जो ‘कृपालु’ पिय आय जाँय तो, जाँय सबै खिसियाय रे।।
भावार्थ:–एक विरहिणी सखी कहती है कि मन को लुभाने वाला सावन का महीना आ गया, किन्तु प्रियतम नहीं आये। सखी! देख तो, बादल गरज–गरजकर मुझ विरहिणी को डरा रहे हैं। बिजली चमक–चमककर मानो मुझे चिढ़ा रही है। पापी पपीहा ‘पिउ पिउ’ कह–कहकर मानो मुझ जली को और जला रहा है। कोयल मधुर ध्वनि से कूक–कूककर मानो व्यंग्य वचन सुना रही है। चारों ओर मोरगण नाच–नाचकर मानो मेरी सुधि–बुधि भुला रहे हैं। ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में सखी कहती है कि अगर ऐसे समय में प्रियतम आ जायँ तो सब के सब खिसिया जायँ।

(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।

ऐ मन! भूत को भूल वो माफ़ हो जायेगा, उसको बैठ कर मत सोच कि मैंने यह पाप किया, मैंने ये जो किया सो किया, भूल जा, वर्तमान को देख। एक ही मन है दो नहीं है। अगर भूत का चिंतन करेगा, गंदी-गंदी बातें जो तुमने पाप की, की हैं तो फिर मन गंदा होता जायेगा। उसको भूल जा और वर्तमान में, मन में हरि गुरु को ही ला, शुद्ध कर दे मन। मन शुद्ध हो जायेगा, तो फ़िर गुरु दिव्य बना देगा स्वरूप शक्ति से। तब फ़िर लक्ष्य की प्राप्ति हो जायेगी। भूत भविष्य सब बन जायेगा।

Tuesday, June 26, 2018

मेरी #राधारमण सों यारी, तन मन -धन उन पर #वारी
#बनवारी सों ह्वै गइ यारी, #तन #मन #धन उन पर वारी।
मेरी राधारमण सों यारी,यह #जीवन उन पर वारी।
मेरी राधारमण सों यारी,क्या समझेगा कोउ #संसारी
मेरी राधारमण सों यारी,#अगनित #प्रानन दउँ वारी।।

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#कामना एवं #प्रेम....!!!
कामना ' प्रेम ' का विरोधी तत्व है । लेने - देने का नाम व्यापार है । जिसमें #प्रेमास्पद से कुछ #याचना की भावना हो , वह प्रेम नहीं है । जिसमें सब कुछ देने पर भी तृप्ति न हो , वही प्रेम है । संसार में कोई व्यक्ति किसी से इसलिये प्रेम नहीं कर सकता क्योंकि प्रत्येक #जीव#स्वार्थी है वह #आनन्द चाहता है , अस्तु लेने - लेने की भावना रखता है । जब दोनों पक्ष लेने- लेने की घात में हैं तो मैत्री कितने क्षण चलेगी ? तभी तो स्त्री - पति , बाप - बेटे में दिन में दस बार टक्कर हो जाती है । जहाँ दोनों लेने - लेने के चक्कर में हैं , वहाँ टक्कर होना स्वाभाविक ही है और जहाँ टक्कर हुई , वहीं वह नाटकीय #स्वार्थजन्य प्रेम समाप्त हो जाता है । वास्तव में #कामनायुक्त प्रेम प्रतिक्षण घटमान होता है ,जबकि - #दिव्य #प्रेम प्रतिक्षण वर्द्धमान होता है । #कामना #अन्धकार - #स्वरुप है , #प्रेम - #प्रकाश #स्वरुप है ।
#Nature of the #Soul:
Let us reflect on the questions, "Who am I?" and, "Is it personal happiness that I seek or the happiness of others?" The answer will be "I do not know who I am, but I do know that I only desire my own happiness." Now if you were a material being, then you would have attained happiness from material objects, But being a part of #God, you can be truly happy only after attaining #Divine #Bliss. This is logically acceptable and has been proved by our own experience since eternity. If, being divine souls, we could have attained true happiness through material objects, then we would have never been unhappy, dissatisfied or miserable because we have attained material happiness in varying degrees throughout our innumerable past lives. This is a definite proof of the fact that we are divine souls and not material beings, because material things have never really satisfied us.
Excerpt from the book "#Prem #Ras #Siddhanta#Philosophy of #Divine #Love by ---- #JAGADGURU_SHRI_KRIPALU_JI_MAHARAJ.

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संसार का दुःख-सुख भयानक है, खतरनाक है। काम में सफलता मिली तो फूल गये और काम में नुकसान हो गया तो फीलिंग हो रही है। ये गलत बीमारी है। अच्छा फल मिल जाये तो भी ठीक, खराब फल मिले तो भी ठीक। समझ लो, हमारे पूर्वजन्म के कर्म खराब रहे होंगे। हमने पहले दान दिया होगा तो हमको पैसा अधिक मिल गया। पहले हमने दान नहीं दिया होगा तो हम गरीब हैं। ये तो हमारा दोष है, भगवान् क्या करे इसमें ? उसको फील नहीं करना चाहिये, आगे की बनाना चाहिये। जो बीता सो बीता।
------- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

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मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...