Saturday, August 11, 2018

The world is nothing but a stage where the selfish game of self-interest is being enacted. Each player plays his role according to his intellectual ability. But until we understand where our true self-interest lies, that is, until there is a firm decision that the material world is to be renounced, our ultimate purpose or aim will not be fulfilled. In the world, everyone is wandering around for the fulfilment of their aim of perfect happiness. If an expert, a Saint tells us that the path to attain this goal is not here but in the opposite direction, then we will surrender to God and attain that Supreme Bliss. But those who don’t surrender and continue to love the material world as they have done in countless past lives remain bound.
हमरी ओर टुक हेरो री किशोरी राधे।
यद्यपि भलीभांति हौं जानत, तुम बिनु हितू न मेरो री किशोरी राधे।
तदपि रसिक जन कही न मानत, रहत विषय को चेरो री किशोरी राधे।
परनिंदा परदोष कथन में, चतुर विचित्र चितेरो री किशोरी राधे।
करत नाम अपराध निरंतर, हिय हंकार घनेरो री किशोरी राधे।
बात बनावत ब्रज रसिकन की, मन कामादि बसेरो री किशोरी राधे।
नाम ‘कृपालु’ काम तुम जानति, भलो बुरो जस तेरो री किशोरी राधे।।
भावार्थ:- हे वृषभानुनंदिनी राधे! थोड़ा इस अधम की ओर भी अपनी कृपा-कटाक्ष युक्त दृष्टि डालिए। यद्यपि मैं यह बात पूर्ण रूप से जानता हूँ कि तुम्हारे बिना मेरा कोई भी हितैषी नहीं। तुम ही एकमात्र मुझ अगति की गति हो तथापि महापुरुषों के बताये हुए आदेशों का परिपालन नहीं करता वरन् सांसारिक विषयों का दास ही बना रहता हूँ। दूसरों की निन्दा एवं दोषों के प्रकट करने में मैं एक अद्भुत चित्रकार की भाँति अत्यन्त निपुण हूँ। देहाभिमान के कारण अपनी अहंकारपूर्ण बुद्धि से लोकातीत महापुरुषों में भी दोष निकालते हुए, सर्वदा नामापराध-स्वरूप अक्षम्य पाप करता रहता हूँ। महापुरुषों में भी सर्वश्रेष्ठ ब्रज रसिकों की सी बातें बघारा करता हूँ, किन्तु हृदय में काम, क्रोध, लोभ आदि दोषों को स्थिर रूप से बसाये रहता हूँ। मेरा नाम तो ‘श्री कृपालु जी’ (कृपा करने वाला) है किन्तु कार्य तो तुम भली-भाँति जानती ही हो फिर भी अच्छा-बुरा मैं जैसा भी हूँ केवल तुम्हारा ही तो हूँ।
(प्रेम रस मदिरा:-दैन्य-माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।

सारी गीता क्या है?
अर्जुन कहता है—
मैं युद्ध नहीं करूँगा। इनको मारना है?
हाँ, और किसको मारने आया है? 
ऐ! राम राम राम राम मैं नहीं युद्ध करता।
क्यों रे! द्वारिका में जब तू मेरी हेल्प लेने गया था
और ये तेरा दुश्मन दुर्योधन भी गया था, याद कर।
तो मैंने कहा था
कि भई, एक पार्टी में तो १८ अक्षौहिणी सेना हथियारबंद रहेगी
और एक पार्टी में मैं अकेला, बिना हथियार उठाये।
तुम दोनों में चुन लो।
तो तुमने क्या चुना था? हमको न?
हाँ हाँ, याद है।
तो तब क्या मालूम नहीं था, किससे लड़ना है,
किसको मारना है?
नहीं, मालूम था।
तो आज क्या नई बात हो गई, जो कहता है युद्ध नहीं करूँगा?
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न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥
युद्ध नहीं करूँगा,
ओ कृष्ण! सुन लो।
ऐ ऐ! और मैं आपका शिष्य हूँ—
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।
आपके शरणागत हूँ,
खाली ‘पन्न’ नहीं हूँ, ‘प्रपन्न’ हूँ।
‘पन्न’ माने, जैसे हम लोग गुरु और भगवान् को प्रणाम करते हैं न, लेट गये।
ये ‘पन्न’ है।
और ‘प्रपन्न’ माने मन से उनकी आज्ञा मानना।
तो कहता है— ‘शिष्यस्तेऽहं’,
मैं आपका शिष्य हूँ
और ‘शाधि’ आज्ञा दो।
आज्ञा दो, वो मैं मानूँगा, ‘प्रपन्न’ हूँ।
तो उस समय भगवान् कह देते, युद्ध कर।
युद्ध नहीं करूँगा।
ये लो। हा-हा! एक तरफ कहता है, मैं ‘प्रपन्न’ हूँ, आज्ञा दो।
और दूसरी तरफ कहता है, युद्ध नहीं करूँगा।
ये गुरु को डाँट रहा है।
क्यों नहीं करेगा?
ये अधर्म होगा, पाप होगा, ये सब मरेंगे,
इनकी स्त्रियाँ विधवा होगीं, वो करैक्टरलैस होंगी,
हाऽ! क्या होगा भविष्य में।
तो भगवान् ने कहा—
ऐसा है कि तू धर्म की शरण में भी है और मेरी शरण में भी है। दो शरणागति हैं तेरी इस समय।
तो १८ अध्याय के अन्त में भगवान् ने कहा—
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा।
‘एकं’ माने अनन्य।
‘एकं’ माने और कामना न रहे, निष्काम।
और ये जो तू पाप-पाप कर रहा है न,
तो पाप और पुण्य का फल तो मैं ही देता हूँ न?
तो मेरा क़ानून है कि
अगर कोई मेरी शरणागति में न हो
और किसी के मर्डर की सोचे भी, तो पाप।
करे तो दूर की बात।
लेकिन अगर मेरे शरणागत है उसका मन,
तो फिर किसी कर्म का फल नहीं मिलेगा।
क्योंकि पाप को मैं माफ़ कर देता हूँ, ये मेरा क़ानून है।
लॉ के अन्तर्गत है।
हर क़ानून में सब-सेक्शन हुआ करता है हमारी गवर्नमेंट में।
तो धर्म का पालन न करेगा तो पाप होगा,
तो दण्ड मिलेगा, ये लॉ।
सब-सेक्शन आया।
लेकिन अगर कोई मेरी शरणागति में आ गया,
तो उसको पाप नहीं लगेगा।
क्योंकि उसका मन मुझमें है।
और प्रत्येक कर्म का कर्ता मन होता है।
बस हो गई गीता।
उसी को इतना लम्बा-चौड़ा लेक्चर
१८ अध्याय में समझाने के लिये करना पड़ा।

Thursday, July 19, 2018

हमारे अन्दर दुर्भावना पनपने का मुख्य कारण है – स्वयं की दूसरे से तुलना करना और अपने आपको अच्छे होने का सर्टिफिकेट दे डालना । यही दुर्भावना #साधना करने पर भी हमें आगे नहीं बढ़ने देती । सब जगह हम दूसरों के प्रति छोटी भावना कर लेते हैं। #तुच्छभावना ! हमें इससे बचना चाहिए । हम #अल्पज्ञ यह नहीं जान सकते की हम सही हैं या नहीं । हम में यह क्षमता ही कहाँ ?
जो #राधा_भाव के #साक्षात #मूर्तिमान स्वरूप हैं,जो स्वयं #महाभाव हैं,जिन के रोम-रोम से श्री #कृष्ण प्रेम रस सदा टपकता रहता है,जिन के #दिव्य वचन सुनते ही #माया #अविद्या का जाल सदा-सदा के लिये नष्ट हो जाता है,जो स्वयं #प्रेम के #सगुण #साकार रूप हैं,जिन के अंदर-बाहर श्री कृष्ण प्रेम लबालब भरा है,जो इस धरा पे कृष्ण प्रेम दान करने के लिये अवतरित हुए हैं,ऐसे सहेज सनेही #सद्गुरुदेव जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु के चरण-कमलों पर बार-बार #बलिहार जाने को जी चाहता है।
जय-जय श्री राधे।
ए #मनुष्यों#मानव_देह प्राप्त हुआ है , #भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ #भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर। #पतन के लिये ताे अन्य याेनी है। #संसार मे रह कर तुम #संसार का उपयाेग कराे दुरुपयाेग नही और संसार मे #अनासक्त हाेकर #भगवतप्राप्ति करो , #भक्ति कराे #भगवान् की क्योंकि मानव देह का एक मात्र #लक्ष्य#भगवतप्राप्ति ही है,अन्य कुछ नहीं। नहीं ताे ये #अनमाेल #खजाना #मानव #देह छिन जायेगा और कुकर शुकर की योनि मे भेज देंगें #भगवान

#साधना का पहला #शत्रु है - #अहंकार। जहाँ अहंकार आया , समझो #दीनता खत्म। दीनता ख़त्म तो समझो कि साधना चौपट हो गयी। आपको #उपासना #भगवान् की ही करनी है। #संसार में बस #व्यवहार करना है। बाहर से #आदर कीजिये , परन्तु #अटैचमेंट न हो , लेकिन #ईश्वरीय_क्षेत्र में #अनन्य #प्रेम होना चाहिए।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...