Saturday, August 11, 2018

कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥
(भागवत १०-२९-१५)
काम, क्रोध, स्नेह, भय किसी भी भाव से अगर मन में भगवान् को लावे, तो उसका मन भगवान् से मिल कर शुद्ध हो जायेगा। गंगा जी में प्यार से यमुना जी मिलें तो भी प्रयाग से वह गंगा जी कहलायेंगी। और चाहे कोई कुल्ला कर दे पापात्मा, वो कुल्ला, उसका मुँह से उच्छिष्ट पानी, गंगा जी नदी में मिल गया, अब वो गंगा जी हो गया। इतनी नदियाँ मिलती हैं गोमुख के बाद बंगाल की खाड़ी तक, कितने झरने मिलते हैं, सब गंगा जी बन गए।
गंगा जी गन्दी नहीं होतीं, जो गंगा जी से मिलता है, वो शुद्ध हो जाता है, गंगा बन जाता है।
संसार में भी यह बता रहे हैं।
रवि पावक सुरसरि की नाईं।
अग्नि में तमाम मुर्दे जलते हैं और हवन भी होता है।देवताओं को। अग्नि कहता है, हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा,
जो हमारे अन्दर आएगा, मैं अग्नि बना दूँगा। जला दूँगा।
मैं तो शुद्ध रहूँगा ही। सूर्य कितनी गन्दी चीज़ों में पड़ता है
और शुद्ध वस्तु में भी पड़ता है, लेकिन वो गन्दा नहीं होता। तो, भगवान् या महापुरुष जो शुद्ध हैं,
उससे अशुद्ध व्यक्ति प्यार करेगा, तो वो अशुद्ध शुद्ध हो जायेगा। शुद्ध अशुद्ध नहीं होगा।


प्राणधन नँदनंदन घनश्याम। तुम ही हो मम आत्मा श्याम।
तुम ही हो मम अंशी श्याम। तुम ही हो मम स्वामी श्याम।
हौं चह बस तेरा सुख श्याम। दे दो प्रेम 'कृपालुहुँ' श्याम।।

ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ,पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ,पाँच प्राण,मन,बुद्धि,अहंकार... ये अठारह तत्व मरने के बाद भी साथ जाया करते हैं हर योनि में हर जन्म में। ये आपकी बुद्धि इसी जन्म की नहीं है,ये अनन्त जन्मों की पली पोसी बड़ी डेवलप(Develop) की हुई बुद्धि है। लेकिन केवल इतना ही सीखा आपकी बुद्धि ने कि संसारी स्वार्थ सिद्धि के लिये क्या क्या करना चाहिये संसारियों के प्रति। वो आप करते हैं। सफलता मिली,कम मिली,नहीं मिली,कहीं उल्टा हो जाता है, कहीं चप्पलें मिलती हैं बीच बीच में आपको। लेकिन आप उसी क्षेत्र में हैं अपना उसी में आगे बढ़ रहे हैं।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
हे!अकारण करुण पतितपावन!
अनन्तानन्त जन्मों में अनन्तानन्त स्त्री - पतियों से अनन्तानन्त बार जूते, लात, चप्पल खाकर भी उनसे वैराग्य नहीं हुआ । भगवत्सम्बन्धी बातें पढते, सुनते, मानते हुए भी मन हठ नहीं छोडता । तुम्हारी कृपा के बिना इन्द्रियों की विषयासक्ति नहीं छुट सकती । अत: हे कृपालु ! अपनी अकारण करुणा से मुझे अपना लो । ....... अत: हे करुणासिन्धु, दीनबन्धु, मेरे श्रीकृष्ण ! तुम अपनी अकारण करुणा का स्वरुप प्रकट करते हुए मुझे अपना लो । मैं तो अनन्त जन्मों का पापी हूँ किन्तु तुम तो पतितपावन हो । यही सोचकर तुम्हारे द्वार पर आ गया ।

सुनी इन, कानन जब ते तान।
तब ते बिसरि गई सुधि सिगरी, कान करैं सखि! का न?।
अब सो तान सुरीली मुरलिहिं, छुटत न कैसेहुँ ध्यान।
अब सो ध्यान जरावत हमरो, सिगरो तन, मन, प्रान।
अब सो प्रान पयान करन चह, रह्यो न कछु मोहिं भान।
अब ‘कृपालु’ सोइ भान रहत इक, सुनहुँ तान नहिं आन।।
भावार्थ:– एक विरहिणी कहती है कि अरी सखी! जब से इन कानों ने श्यामसुन्दर की सुरीली तान सुनी है तब से मुझे कोई सुधि नहीं है। ये कान जो न करें वह थोड़ा है। अरी सखी! अब तो उस मुरली की तान का ध्यान एक क्षण के लिए भी नहीं हटता एवं तान का ध्यान रहने के कारण विरह में मेरा तन, मन, प्रान सभी जल रहा है और कहाँ तक कहूँ अब मेरा प्राण निकलना चाहता है। मुझे कुछ भी होश नहीं है। ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में मुझे एक ही होश है कि वह तान फिर कब सुनूँ।
(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
हमारो राधावल्लभ प्रान।
कोटिन प्रान वारि दउँ लखि सखि! नेकु मंद मुसकान।
चितवनि चपल लखत अपलक दृग, कलप पलक सम मान।
झूमत मुकुट लटनि मुख चूमति, घूमति भृकुटि कमान।
लकुटिहिं लपट पीतपट अटपट, काछनि नट उनमान।
सो ‘कृपालु’ रस को बखान जब, टेरत मुरलिहिं तान।।
भावार्थ:– श्री राधावल्लभ जी हमारे प्राणों के भी प्राण हैं। उनकी थोड़ी सी मधुर मुस्कान पर मैं अपने अनन्त प्राण न्यौछावर करती हूँ। उनकी रसभरी चंचल चितवन को निर्निमेष दृष्टि से देखते हुए इतना रस पाती हूँ कि एक कल्प भी एक क्षण के समान प्रतीत होता है। मतवाली चाल के कारण मोर मुकुट का झोंके खाना, घुँघराली लटों का मुख चूमना एवं भौहों का अटपटे ढंग से घूमना देखते ही बनता है। अटपटे ढंग से लकुटी पर लिपटा हुआ पीत पट एवं नट के समान कछी हुई काछनी अनुपमेय है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं–जब वे राधावल्लभ रसभरी मुरली की तान छेड़ते हैं तब जो रस बरसता है, वह पीते ही बनता है, शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

(प्रेम रस मदिरा:- श्रीकृष्ण–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।

कुत्ता जब हड्डी चबाता है तो चबाते चबाते उसके ही मुँह से खून निकलने लगता है । कुत्ता सोचता है हड्डी से खून निकल रहा है और चबाता जाता है। ऐसे ही हम लोग हैं बार बार संसार वालों से जूते चप्पल खाते हैं और फिर वहीं आनंद ढूँढते हैं । उसी बाप से उसी बीवी से कहते हैं कि तुम स्वार्थी हो और फिर यह उम्मीद करते हैं कि वो हमारा सुख चाहेगा और हमें आनंद दे देगा। वो कहाँ से दे देगा वो तो तुमसे सुख चाहता है।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...