Thursday, July 19, 2018

हमारे अन्दर दुर्भावना पनपने का मुख्य कारण है – स्वयं की दूसरे से तुलना करना और अपने आपको अच्छे होने का सर्टिफिकेट दे डालना । यही दुर्भावना #साधना करने पर भी हमें आगे नहीं बढ़ने देती । सब जगह हम दूसरों के प्रति छोटी भावना कर लेते हैं। #तुच्छभावना ! हमें इससे बचना चाहिए । हम #अल्पज्ञ यह नहीं जान सकते की हम सही हैं या नहीं । हम में यह क्षमता ही कहाँ ?
जो #राधा_भाव के #साक्षात #मूर्तिमान स्वरूप हैं,जो स्वयं #महाभाव हैं,जिन के रोम-रोम से श्री #कृष्ण प्रेम रस सदा टपकता रहता है,जिन के #दिव्य वचन सुनते ही #माया #अविद्या का जाल सदा-सदा के लिये नष्ट हो जाता है,जो स्वयं #प्रेम के #सगुण #साकार रूप हैं,जिन के अंदर-बाहर श्री कृष्ण प्रेम लबालब भरा है,जो इस धरा पे कृष्ण प्रेम दान करने के लिये अवतरित हुए हैं,ऐसे सहेज सनेही #सद्गुरुदेव जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु के चरण-कमलों पर बार-बार #बलिहार जाने को जी चाहता है।
जय-जय श्री राधे।
ए #मनुष्यों#मानव_देह प्राप्त हुआ है , #भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ #भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर। #पतन के लिये ताे अन्य याेनी है। #संसार मे रह कर तुम #संसार का उपयाेग कराे दुरुपयाेग नही और संसार मे #अनासक्त हाेकर #भगवतप्राप्ति करो , #भक्ति कराे #भगवान् की क्योंकि मानव देह का एक मात्र #लक्ष्य#भगवतप्राप्ति ही है,अन्य कुछ नहीं। नहीं ताे ये #अनमाेल #खजाना #मानव #देह छिन जायेगा और कुकर शुकर की योनि मे भेज देंगें #भगवान

#साधना का पहला #शत्रु है - #अहंकार। जहाँ अहंकार आया , समझो #दीनता खत्म। दीनता ख़त्म तो समझो कि साधना चौपट हो गयी। आपको #उपासना #भगवान् की ही करनी है। #संसार में बस #व्यवहार करना है। बाहर से #आदर कीजिये , परन्तु #अटैचमेंट न हो , लेकिन #ईश्वरीय_क्षेत्र में #अनन्य #प्रेम होना चाहिए।
मेरे प्रिय #साधक
#देवदुर्लभ #मानव #देह पाना ही #भगवतकृपा है। फिर भी #श्री_कृष्ण_भक्ति का #तत्त्वज्ञ#गुरु मिल जाय और वह #बोध करा दे (स्वयं #शास्त्रों को पढ़ कर तो #अनंत #युगों में भी #तत्त्वज्ञान असंभव है) तो फिर अब कौन सी #हरि_गुरु_कृपा शेष है। अब तो #साधक की ही कृपा (#साधना करने की) अपेक्षित है।

#शरणागति का अर्थ है कुछ न करना। मन, बुद्धि का समर्पण ही शरणागति है।
जब हम कोई भी कर्म करते हैं, तो हम सोचते हैं, कि ये कर्म हमने किया है, किन्तु जब हम भगवान् की शरणागति की ओर बढ़ते हैं, तब हम ये सोचना प्रारम्भ करते हैं, कि सब कुछ करने वाला भगवान् है और जब हमें इस बात पर दृढ़ विश्वास हो जायेगा कि सब कुछ करने वाला भगवान् है, तो हमारा सोचना, करना सब बन्द हो जायेगा और हम कर्तापन के अभिमान से मुक्त हो जायेंगे और हमारा सब काम बन जायेगा। जैसे कबीरदास जी ने कहा था, ‘जो करे सो हरि करे, रहे कबीर, कबीर‘।
श्री राम जै राम अवध बिहारी, शरण शरण मैं तो शरण तिहारी।
आत्माराम पूर्णकाम अवध बिहारी,नयनाभिराम राम शरण तिहारी।।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...