In this world, there are few fortunate ones, who move towards God. Amongst them, only a few are fortunate enough to get the association of a genuine Saint. Amongst them too, there are a few who are fortunate enough to get the Divine knowledge. Nevertheless, there is one flaw, which does not let them progress. It is their habit of procrastination. When it comes to worldly activities, we do these immediately. We never defer activities like attaching our minds somewhere, or showing aversion somewhere, or insulting someone, or causing damage to someone. We do these instantly. But we always postpone God related activities. Vedas say – "Don’t leave anything for tomorrow. Who knows, tomorrow may not come in your life". So, do not procrastinate even for a moment. Start practicing devotion right from this moment.
This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Sunday, September 23, 2018
जो व्यक्ति अनावश्यक अधिक बोलता है, उसी की लड़ाई अधिक होती है। वह स्वयं परेशान रहता है और दूसरों को भी परेशान करता है। अपना परमार्थ भी वह इसी दोष के कारण ही खराब कर लेता है। जो चुप रहता है, गड़बड़ी तो उससे भी होती है,लेकिन वह आगे नहीं बढ़ पाती। संसार में भी उसको अधिक परेशानी नहीं होती और परमार्थ भी उसका ठीक रहता है।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रचारिका सुश्री श्रीधरी दीदी द्वारा #राधाष्टमी_महोत्सवकी बहुत-बहुत शुभकामनायें ।
वृषभानुनंदिनी मादनाख्य महाभाव स्वरूपिणी कृष्णप्रिया श्रीराधा कृपाकांक्षी महानुभाव !
आप सभी को भोरीभारी बरसानेवारी के अवतरण दिवस की बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनायें ।
कृपा की मूरति श्री राधारानी के गुणों का वर्णन पूर्णतम पुरुषोतम ब्रह्म श्रीकृष्ण भी नहीं कर सकते, उन अकारण करुणामयी माँ की कृपा की थाह भी कोई नहीं पा सकता । हमारे परमपूज्य गुरुदेव जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ह्लादिनी शक्ति स्वरूपिणी नीलांबरधारिणी प्यारी श्यामा जू के स्वभाव का वर्णन करते हुए कहते हैं –
"ऐसो सरल सुभाय श्री श्यामा जू को ! जैसो नहिं कहुँ सुन्यो न देख्यो, हौं कह भुजहिं उठाय" ।
अर्थात् हमारी श्यामा जू सरलता से भी अधिक सरल हैं, भोरी हैं । उनके जैसा अकारण करुण स्वभाव आज तक न किसी का सुना न देखा गया ये प्रतिज्ञापूर्वक कहा जा सकता हैं । वे जीवों पर केवल कृपा ही करती हैं, निरंतर कर रही हैं बिना पात्र - अपात्र का विचार किये । लेकिन हम जैसे अधम जीव उन अनंत कृपाओं का अनुभव नहीं कर पाते अपितु निरंतर उनसे शिकवा शिकायत ही करते रहते हैं । निरंतर माया के थपेड़े सहते हुए संसार में धोखा खाते हुए भी उन्हीं स्वार्थी अनित्य रिश्तेदारों को ही अपना सर्वस्व मानते हैं और ऐसी कृपावतारिणी माँ को अपना नहीं मान पाते । इसलिए जीव की स्थिति और दयनीय होती जाती है । जब तक हम वेदवाणी, गुरु वाणी पर पूर्ण विश्वास करके श्री राधारानी को अपना सर्वस्व नहीं मान लेंगें तब तक हम वास्तविक आनंद की कल्पना भी नहीं कर सकते ।
अतएव आइये राधाष्टमी के इस पावन पर्व पर हम अपनी सनातन ममतामयी माँ से यही प्रार्थना करें –
अतएव आइये राधाष्टमी के इस पावन पर्व पर हम अपनी सनातन ममतामयी माँ से यही प्रार्थना करें –
तू तो है समर्थ सर्वशक्तिमयी श्यामा, मन में समा जा आजा मेरे उर धामा ।।
मोहिं जनि लखु मैं तो पातक धामा, अपनो कृपालु स्वभाव लखु श्यामा ।।
तेरे तो हैं अगनित जन गुणधामा, एक निगुणी भी अपनी कर ले श्यामा ।।
माया के जूते लात खाया आठुयामा, अब तो बना ले मोहिं बेर भई श्यामा ।।
(श्यामा-श्याम गीत)
मोहिं जनि लखु मैं तो पातक धामा, अपनो कृपालु स्वभाव लखु श्यामा ।।
तेरे तो हैं अगनित जन गुणधामा, एक निगुणी भी अपनी कर ले श्यामा ।।
माया के जूते लात खाया आठुयामा, अब तो बना ले मोहिं बेर भई श्यामा ।।
(श्यामा-श्याम गीत)
एक बार पुन: सभी श्री राधाकृष्ण चरणानुरागी भक्तों को किशोरी जू के प्राकट्य दिवस की शुभकामनायें एवं बधाई ।
भोरीभारी बरसानेवारी की जय। वृषभानुनंदिनी राधारानी की जय। कीर्तिकुमारी की जय। छोटी जी किशोरी जू की जय।
अगति के गति तुम दीनदयाल!
जग सब बने बने के साथी, पति वनिता पितु बाल।
पै तुम कूबरि कहँ सुंदरि करि, किय निहाल तत्काल।
लै द्वै मूठि सुदामहिँ कन किय, दै द्वै लोक निहाल।
उन पाण्डव वनवासिन कहँ तुम, दियो साथ गोपाल।
दिय ‘कृपालु’ गति-मातु पूतनहिँ, तुम सम कौन कृपाल।।
जग सब बने बने के साथी, पति वनिता पितु बाल।
पै तुम कूबरि कहँ सुंदरि करि, किय निहाल तत्काल।
लै द्वै मूठि सुदामहिँ कन किय, दै द्वै लोक निहाल।
उन पाण्डव वनवासिन कहँ तुम, दियो साथ गोपाल।
दिय ‘कृपालु’ गति-मातु पूतनहिँ, तुम सम कौन कृपाल।।
भावार्थ:-हे दीनों पर दया करने वाले श्यामसुन्दर! निराधार के तुम्हीं आधार हो। जगत् के माता, पिता, स्त्री, पति, बच्चे आदि सब तो बने-बने के ही साथी हैं, किन्तु तुमने तो कुबरी सरीखी कुरूपा स्त्री को भी सुन्दरी बना कर निहाल कर दिया। सुदामा के दो मुट्ठी तंदुल लेकर दो लोक दे दिये। वनवासी अकिंचन पाण्डवों का भी तुमने पूरा-पूरा साथ दिया। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कहाँ तक कहें? विष पिलाने वाली पूतना राक्षसी को भी अपनी माता के समान गोलोक दान कर दिया। तुम्हारे समान कृपालु और कौन हो सकता है?
(प्रेम रस मदिरा:- दैन्य - माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
हमें #कभी भी #मन मे #निराशा नहीं लाना है, #दृढ़ #विश्वास #जमाना है, ये नहीं सोचना है की #साधना करते हुये इतने #दिन हो गये, इतने #साल बीत गये लेकिन #हमारा काम अब तक नहीं बना । ये #सोचिये की अब तो उनके हो गये, उनके #हाथों #बिक गये सब कुछ दे दिया अब time से क्या #मतलब । आज मिले कल मिले #हजार #जन्म बाद मिले या न मिले । हमारा काम उनको अपना मान कर उनकी सेवा की याचना करना । उनकी #विरह में #तड़पते रहना बस हमारी इतनी #ड्यूटि है । इसके आगे सोचना नहीं है, #सोचना #विचारना#बुद्धि लगाना ये #शरणागत का #काम नहीं है ।
Tuesday, August 14, 2018
पहले #नदी पार हो जाओ ,तब #नाव को चैलेंज करो। अगर 10 फीट भी अभी नदी पार करना शेष है ,जहाँ #अगाध पानी है सिर के ऊपर और आपने कहा - अब क्या है, कूद पड़ो। न, न अभी #ख़तरा है, #संकट अभी टला नहीं है। #नामापराध यानि #संत के प्रति #अपराधकर देने पर ,#भावभक्ति पर जाकर (जब #भगवतदर्शन होने वाला होता है) वह उच्च कोटि का #साधक भी #अभाव भक्ति यानि भक्ति में #शून्यता को प्राप्त हो जाता है, #साधारण_जीव की क्या #हैसियत?
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






