Sunday, September 23, 2018

जग राग छूटे नहीं, कृपा करु राधे,
माया ने सताया अति, कृपा करु राधे |
O Radhey! Please destroy my worldly attachments by showering Your Divine grace upon me. Your Maya has troubled me extensively; please bless me with Your grace.


हमें #कभी भी #मन मे #निराशा नहीं लाना है, #दृढ़ #विश्वास #जमाना है, ये नहीं सोचना है की #साधना करते हुये इतने #दिन हो गये, इतने #साल बीत गये लेकिन #हमारा काम अब तक नहीं बना । ये #सोचिये की अब तो उनके हो गये, उनके #हाथों #बिक गये सब कुछ दे दिया अब time से क्या #मतलब । आज मिले कल मिले #हजार #जन्म बाद मिले या न मिले । हमारा काम उनको अपना मान कर उनकी सेवा की याचना करना । उनकी #विरह में #तड़पते रहना बस हमारी इतनी #ड्यूटि है । इसके आगे सोचना नहीं है, #सोचना #विचारना#बुद्धि लगाना ये #शरणागत का #काम नहीं है ।

Tuesday, August 14, 2018

पहले #नदी पार हो जाओ ,तब #नाव को चैलेंज करो। अगर 10 फीट भी अभी नदी पार करना शेष है ,जहाँ #अगाध पानी है सिर के ऊपर और आपने कहा - अब क्या है, कूद पड़ो। न, न अभी #ख़तरा है, #संकट अभी टला नहीं है। #नामापराध यानि #संत के प्रति #अपराधकर देने पर ,#भावभक्ति पर जाकर (जब #भगवतदर्शन होने वाला होता है) वह उच्च कोटि का #साधक भी #अभाव भक्ति यानि भक्ति में #शून्यता को प्राप्त हो जाता है, #साधारण_जीव की क्या #हैसियत?

अरे मन! अस तृष्णा बलवान।
बड़े बड़े भूपति भये भूतल, उदय अस्त लौं भान।
तिनहुँन की सोइ दशा रही जो, एक भिखारिहिं जान।
यह तृष्णा नहिं छोड़ति इंद्रहुँ, जेहि सुरपति सब मान।
जब लौ नहिं सुमिरहु मन निशिदिन, सुंदर श्याम सुजान।
तब लौ सुख ‘कृपालु’ नहिं पैहौं, वेद पुरान प्रमान।।
भावार्थ:- अरे मन! यह तृष्णा इतनी बलवती है कि इस पृथ्वी पर बड़े-बड़े राजा हुए जिनका सम्पूर्ण धरातल पर राज्य था किंतु उनकी दशा भी ठीक एक भिखारी के समान थी। कहाँ तक कहें यह तृष्णा देवराज इन्द्र को भी नहीं छोड़ती जिसे सब देवताओं का स्वामी मानते हैं। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं, हे मन! वेद पुराण चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि जब तक तू श्यामसुन्दर का निरन्तर स्मरण नहीं करेगा तब तक सुख न पा सकेगा।
(प्रेम रस मदिरा:-सिद्धान्त-माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।


भक्ति की #अविरल_धारा प्रवाहित करके #असंख्य_जीवों का #कल्याण करने वाले #सदगुरुदेव को कोटि कोटि प्रणाम।
भक्ति महादेवी को जन जन के हृदय में स्थापित करके भक्तियोग रसावतार स्वरुप को प्रमाणित करने वाले #भक्तिरस_सिंधु प्रिय गुरुवर को #सहस्त्रों #भक्तों का #भक्तियुक्तप्रणाम।
साधना का प्राण '#रूपध्यान' है, यह #बुद्धि में बैठा कर श्री #श्यामा_श्याम की #मनोमयी#मूर्ति सबके #हृदय में #प्रतिष्ठापित करने हेतु #असंख्य #कीर्तन,#पद,#दोहे लिखकर ,उनका #मधुर_गान कराने वाले #संकीर्तन_सम्राट ,#प्रेम #रस #रसिक प्रिय गुरुवर को कोटि कोटि प्रणाम।

यह तो #संसार है इसमे सब कुछ कहने वाले लोग हैं ,#सही भी,#गलत भी। फिर गलत कहने वाले तो 99 परसेंट(percent) हैं, #सत्वगुणी #बुद्धि हुई तो सत्वगुणी बात कहने लगे, #रजोगुणी बुद्धि हुई तो हमारा निर्णय रजोगुणी हो गया, #तमोगुणी बुद्धि हुई तो एक दम से तमोगुण बात बोलने लगे। इसलिये जब हमारी स्वयं की बुद्धि ही एक सी नहीं रहती तो दूसरों से हम क्यों आशा करते हैं कि वह हमारी बात का समर्थन ही करेगा। ये कभी #सतयुग में नहीं हुआ,#त्रेतायुग में नहीं हुआ,#द्वापर में नहीं हुआ,फ़िर आज क्यों होगा? सारे #संतों ने इसलिए लिखा "तुम किसी की और मत देखो न किसी की सुनों बस,अपना काम करो।"
If you listen to the lectures of such a person who is neither a God-realised soul nor well-versed in the scriptures, you will become confused and find fault with him. It will be disadvantageous to you to have malevolence against him. You will gain nothing from his muddle and harm yourself. Therefore, get rid of this constant running from one place to another, from one Guru to another. People practice this throughout their entire life. They attend and consult with all the pundits, babas and gurus with no result in hand through this jockeying. We have wasted innumerable lives in these false pursuits.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...