Wednesday, October 3, 2018

सुनी इन, कानन जब ते तान।
तब ते बिसरि गई सुधि सिगरी, कान करैं सखि! का न?।
अब सो तान सुरीली मुरलिहिं, छुटत न कैसेहुँ ध्यान।
अब सो ध्यान जरावत हमरो, सिगरो तन, मन, प्रान।
अब सो प्रान पयान करन चह, रह्यो न कछु मोहिं भान।
अब ‘कृपालु’ सोइ भान रहत इक, सुनहुँ तान नहिं आन।।
भावार्थ:– एक विरहिणी कहती है कि अरी सखी! जब से इन कानों ने श्यामसुन्दर की सुरीली तान सुनी है तब से मुझे कोई सुधि नहीं है। ये कान जो न करें वह थोड़ा है। अरी सखी! अब तो उस मुरली की तान का ध्यान एक क्षण के लिए भी नहीं हटता एवं तान का ध्यान रहने के कारण विरह में मेरा तन, मन, प्रान सभी जल रहा है और कहाँ तक कहूँ अब मेरा प्राण निकलना चाहता है। मुझे कुछ भी होश नहीं है। ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में मुझे एक ही होश है कि वह तान फिर कब सुनूँ।
(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
#अनादिकाल से हम #संसार की जेल में दण्ड भोग रहे हैं। इसका एक कारण है कि हमने #भगवान् के साथ ' ही ' नहीं लगाया , केवल ' भी ' लगाया। एक शब्द में इतना बड़ा दण्ड । भगवान् #भागवत में कहते हैं " मैं सब कुछ हूँ तेरा #जीव ! क्यों भूल गया तू मुझे ? '' ये #माया जो तेरे ऊपर अधिकार किये है केवल मुझे भूलने के कारण। लेकिन मैं नहीं भूला तुझे । मैं तेरे #हृदय में बैठ कर तेरे एक एक आइडियाज ( IDEAS ) को नोट करता हूँ , चुपचाप, तुझे डिस्टर्ब ( DISTURB ) नहीं करता। इसलिये जीव ! तू निरंतर मेरा #स्मरण करते हुये मेरे नाम के साथ ' ही ' लगा ' भी ' नहीं। जिस दिन तू ' ही ' लगा देगा उस दिन #भगवतप्राप्तितेरे लिये करतलगत है।'

Sunday, September 23, 2018

भगवान् के नाम में भगवान् का निवास है और वह भगवान् से अधिक इम्पोर्टेन्ट है। क्यों ? अगर भगवान् नन्द के यहाँ अवतार लेंगे और वह गोकुल या नंदगाँव में हैं। और बरसाने से कोई भक्त दर्शन करना चाहे अभी तुरंत। कैसे करेगा वह ? वह जायेगा नन्दगाँव फिर वहाँ कहाँ है श्रीकृष्ण देखेगा। और नाम सब जगह है। आप लेट्रीन बाथरूम में जहाँ कहीं आप बैठे हों भगवन्नाम ले सकते हैं। डरें नहीं कि ये गन्दी जगह में भगवान् का नाम कैसे लें ? भगवान् का नाम गंदे को शुद्ध कर देता है , भगवान् अशुद्ध नहीं होते। अनंत पाप तो भरा है मन में। उसी को तो शुद्ध करने के लिये प्रयत्न करना है। अगर हम यह कहें कि गन्दगी में भगवान् का निवास कराना बड़ी बुरी बात है तो हमारा मन कभी शुद्ध ही न होगा। कहाँ से हम मन को शुद्ध करके लायेंगे ? तो भगवान् का नाम लेंगे। इसलिये आप हर जगह ,हमेशा भगवान् को अपने साथ माने। हरि गुरु हमारी हर हरकत को देख रहें हैं। नोट कर रहें हैं। ये विश्वास बढ़ावें , यह रियलाइज़ (realize) करेंगे उतना ही जल्दी आगे बढ़ेंगे। देखो हमारे यहाँ धन्ना जाट वगैरह तमाम इतिहास भरा पड़ा है। सब लट्ठ गँवार , बेपढ़े लिखे। विश्वास कर लिया बस विश्वास मात्र से भगवत्प्राप्ति होती है।
---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
श्री राम पूर्णब्रह्म सुखधाम,श्री राम कोटि काम अभिराम।
दशरथ अजिर बिहारी राम,कोटि मदन मनहारी राम।
राम नाम गुन लीला धाम, सुमिरिय छिन छिन आठों याम।
रामहिं गाइय सुमिरिय राम,भाव रहे उर महँ निष्काम।।
राग और द्वेष दो ही एरिया हैं सारे संसार में,बाँधे हुए है हम सबको। तो राग करना है तो बस हरि से और द्वेष करना है तो काम से क्रोध से लोभ से ईर्ष्या से द्वेष से करो। ये आने न पावें, हमारे हृदय को गंदा न करने पांवे। हमारी वह पूँजी है। हम जो कमाते हैं ,एक बार भी जो भगवान् का नाम लेते हैं,ये हमारी कमाई है। इसमें गड़बड़ न करे कोई।
संसारी #दोष कितने कम हुए, हमे इस पर हर समय दृष्टि रखनी है । हमारे स्वभाव में #अहमता#ममता कितनी कम हुई ,इस और ध्यान देना है । #स्वाभिमान कितना कम हुआ,अपने #अपमान का अनुभव होना कितना कम हुआ,#आत्मप्रशंसा कितनी अच्छी लगती है । संसारी विषयों के अभाव मेँ कितना #दुख होता है,उनके मिलने में कितना #सुख मिलता है, यह सब अपनी #आध्यात्मिक उन्नति को नापने का सबसे बढ़िया पैमाना है।
युगलवर, निरतत कुंज मझार।
देखति ललितादिक सखियन सब, पुनि–पुनि कहि बलिहार।
आजु होड़ परि गई निरत महँ, युगल नवल सरकार।
विविध अंग बहु भेद संग दोउ, हाव–भाव–विस्तार।
निरतत गति अविराम गौर–हरि, हार–जीत उर धार।
तब ललिता सखि उठि कह ‘बस करु, नाचत दोउ इकसार’।
दोउ ‘कृपालु’ कह ‘पक्षपात यह, ये गईं, ये गये हार’ ।।
भावार्थ:–युगल सरकार कुंज में नृत्य कर रहे हैं। ललितादिक सखियाँ बार–बार बलिहार! बलिहार! कह–कहकर विभोर हो रही हैं। आज नृत्य में श्यामा–श्याम में परस्पर होड़ पड़ गयी है। दोनों ही अनेक अंगों के अनेक भेदों द्वारा अनेक हाव–भाव दिखा रहे हैं। अपनी–अपनी विजय कामना से श्यामा श्याम अविराम गति से नृत्य कर रहे हैं। तब ललिता सखि ने कहा–अब युगल सरकार नृत्य बन्द कर दें, दोनों ही एक समान नाचते हैं। ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में दोनों ने ही ललिता के न्याय को पक्षपातपूर्ण बताया और एक दूसरे के प्रति यह कहा–“हम जीत गये, ये हार गयीं”। “हम जीत गयीं, ये हार गये।”

(प्रेम रस मदिरा:-निकुंज–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...