Monday, November 5, 2018

माधो! मोहिं लूटीं ब्रजनार।
पोथी पत्रा छोरि छारि मम, दियो बनाय लबार।
लै निरुपाधि समाधि बहायो, प्रेम पयोधि मझार।
निर्गुन ध्यान भुलाय, दियो मोहिं, ध्यान सगुन साकार।
छोरि जोग मोहिं भोग सिखायो, तुम सँग नंदकुमार।
जब ‘कृपालु’ लिय लूटि सबै तब, कस न बहे जलधार।।
भावार्थ:– प्रेमरस विभोर उद्धव श्यामसुन्दर से कहते हैं कि ब्रज गोपियों ने मुझे लूट लिया। मेरे ज्ञान सम्बन्धी पोथी पत्रा को छीन कर मुझे लबरा सिद्ध कर दिया। मेरी निरुपाधि समाधि को लेकर प्रेम समुद्र में बहा दिया। मेरे निर्गुण ज्ञान को भुलाकर सगुण साकार भगवान का ध्यान दे दिया। मेरे योग को छीन कर तुम्हारे साथ दिव्य विहार करने की शिक्षा दे दी। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि जब तुम्हारा सर्वस्व लुट गया तब भला आँखों से अश्रुधारा क्यों न निकले।
(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
भगवान ने दया करके मानव देह दिया और आप लोग जब गर्भ में थे तब वादा किया था की महाराज बहुत दु:ख मिल रहा है माँ के पेट में, गंदगी में, सिर नीचे पैर ऊपर कितना कोमल शरीर, हमको निकालो, आपका ही भजन करेंगे आपको पाने का उपाय खोजेंगे अबकी बार मुझे निकालो । और बाहर आया मम्मी ने कहा ए मेरा भजन कर, पापा ने कहा ए मैं तेरा हूँ । यह सब लोगों ने धोखा देकर बेचारे को बेवकूफ बना दिया, भगवान को दिया हुआ वादा भूल गया और भगवान को छोड़ इन लोगों को भजने लगा । और अगर जागा भी, कोई संत मिल गया और जगा दिया तो कल से करेंगे, अवश्य करेंगे अवश्य । आज जरा काम आ गया कल से करेंगे अवश्य।
तन का भरोसा नहीं गोविंद राधे ।
जाने कब काल तेरा तन छिनवा दे ॥
All Glories to Our Divine Master Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
मान ले उनको तू सिर्फ़ अपना.......सीख़ ले याद में बस तड़पना.........वे लगा लेंगे सीने से तुझको.......वे लगा लेंगे सीने से तुझको.........वे 'कृपालु' हैं, तंगदिल नहीं हैं...........!!
जय श्री राधे।
The true love is unlimited and ever increasing. It is a divine power of God.
On the other hand, material love is merely a temporary attachment of mind which eventually becomes a reason for unhappiness.
Rectify your choices.
भगवान जरा अटपटे स्वभाव के हैं । छिप-छिप कर देखते हैं एवं अब तुम जरा सा असावधान होकर संसारी वस्तु की आसक्ति मे बह जाते हो तब श्यामसुंदर को वेदना होती है कि यह मुझे अपना मान कर भी गलत काम कर रहा है । मन श्यामसुंदर को दे देने के पश्चात ! उसमें संसारिक चाह न लाना चाहिए । यह श्यामसुंदर के लिए कष्टप्रद है ।
जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण-क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगों से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।
गलती न मानने का सबसे बड़ा कारण यह है कि लोग अपने को बुद्धिमान कहलाना चाहते हैं । किसी को अगर कोई मूर्ख कहे , यह किसी को बर्दाश्त नहीं होता । अगर कोई विवेक पूर्वक सोचे तो सब अल्पज्ञ ही तो हैं । सब लोगों के पास जो बुद्धि है वह काम चलाऊ ही तो है । गुरु ने भी दोष बताया तो उलटा सोचने लगा । यह प्रमुख गलती है । चाहिये तो शिष्य को यह कि अगर कोई दोष बताया जाय तो निरन्तर उसका चिन्तन करे और भविष्य में वह न होने पाये । कोशिश करने पर अवश्य ही दोष कम होते हैं , लेकिन कोशिश कम होती है अतः दोष भी कम ठीक होते हैं। बराबर वाले और बड़ों से व्यवहार करते समय अपनी वाणी पर कन्ट्रोल रखें , जवाब न दें । गुरु के प्रति तो यही सोचना काफी है कि गलती तो हमारी ही होगी ।
गुरु हरि का ही रूप गोविंद राधे।
जानो अरु मानो अरु औरों को जना दे।।
भावार्थ- ‘आचार्य मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्।’ सद्गुरु प्राप्त हो जाने पर ‘गुरु भी हरि का ही रूप है’ स्वयं ऐसा विश्वास हृदय में धारण कर लेना चाहिये एवं दूसरों को भी यह सिद्धांत भली भाँति समझा देना चाहिये जिससे जीव नामापराध से बच सके।
जाने का अर्थ माने गोविंद राधे।
माने का अर्थ क्रिया रूप दे बता दे।।
भावार्थ- जानने का वास्तविक तात्पर्य है मानना एवं मानने का वास्तविक अर्थ ज्ञान को क्रिया रूप में परिणत करना है।
जाना तो अनंत बार गोविंद राधे।
माना नहिं हेतु महापाप बता दे।।
भावार्थ- जीव ने न जाने कितनी बार संत व भगवान् का दर्शन, संग आदि किया पर उन पर विश्वास नहीं किया अत: पाप ही करता रहा।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...