Sunday, November 25, 2018

हम साधकों को सदा यही समझना चाहिए कि हमसे जो अच्छा काम हो रहा है, वह गुरु एवं भगवान की कृपा से ही हो रहा है क्योंकि हम तो अनादिकाल से मायाबद्ध घोर संसारी, घोर निकृष्ट, गंदे आइडियास(ideas) वाले बिलकुल गंदगी से भरे पड़े हैं। हमसे कोई अच्छा काम हो जाये, भगवान के लिए एक आँसू निकल जाय, महापुरुष के लिए एक नाम निकल जाये मुख से, अच्छी भावना पैदा हो जाये उसके प्रति हमारी यह सब उनकी ही कृपा से हुआ ऐसा ही मानना चाहिये। अगर वे सिद्धान्त न बताते , हमको अपना प्यार न देते तो हमारी प्रवर्ति हीक्यों होती, कभी यह न सोचो की हमारा कमाल है, अन्यथा अहंकार पैदा होगा , अहंकार आया की दीनता गयी, दीनता गयी तो भक्ति का महल ढह गया। सारे दोष भर जाएंगे एक सेकंड में इसलिए कोई भी भगवत संबंधी कार्य हो जाये तो उसको यही समझना चाहिये कि गुरु कृपा है, उसी से हो रहा है ताकि अहंकार न होने पाये। अगर गुरु हमको न मिला होता, उसने हमको न समझाया होता ,उसने अपना प्यार दुलार न दिया होता, आत्मीयता न दी होती तो हम ईश्वर की ओर प्रव्रत्त ही न होतें। अत: उन्ही की कृपा से सब अच्छे कार्य हो रहें है ऐसा सदा मान के चलो।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

Monday, November 5, 2018

अरे मूर्ख मन ! इस परम अन्तरंग तत्वज्ञान को समझ ले। तीन तत्व नित्य हैं – पहला ईश्वर, दूसरा जीव, एवं तीसरा तत्व माया । इनमें माया चिदानन्दमय ईश्वर की जड़ शक्ति है एवं जीव चिदानन्दमय ईश्वर का सनातन दास है, जिसे वेदादिकों में अंश शब्द से विहित किया गया है। जीवात्मा देही है तू उसको देह मान रहा है, बस यही अनादिकालीन तेरा अज्ञान है । जो इस बात को जितना जान लेता है, उतना ही उस पर विश्वास भी कर लेता है, उसके जानने की यही पहिचान है। पुन: जो जितनी मात्रा में उपर्युक्त बात पर विश्वास कर लेता है, उतनी ही मात्रा में अपने आप उसका श्यामसुन्दर के चरणों में अनुराग हो जाता है।‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं :- अरे मन ! अब मनमानी छोड़ दे, एवं मनमोहन में रूपध्यान द्वारा अपने आप को अनुरक्त कर ।
#प्रेम_रस_मदिरा: सिद्धान्त–माधुरी )
---#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
--- सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति।
माधो! मोहिं लूटीं ब्रजनार।
पोथी पत्रा छोरि छारि मम, दियो बनाय लबार।
लै निरुपाधि समाधि बहायो, प्रेम पयोधि मझार।
निर्गुन ध्यान भुलाय, दियो मोहिं, ध्यान सगुन साकार।
छोरि जोग मोहिं भोग सिखायो, तुम सँग नंदकुमार।
जब ‘कृपालु’ लिय लूटि सबै तब, कस न बहे जलधार।।
भावार्थ:– प्रेमरस विभोर उद्धव श्यामसुन्दर से कहते हैं कि ब्रज गोपियों ने मुझे लूट लिया। मेरे ज्ञान सम्बन्धी पोथी पत्रा को छीन कर मुझे लबरा सिद्ध कर दिया। मेरी निरुपाधि समाधि को लेकर प्रेम समुद्र में बहा दिया। मेरे निर्गुण ज्ञान को भुलाकर सगुण साकार भगवान का ध्यान दे दिया। मेरे योग को छीन कर तुम्हारे साथ दिव्य विहार करने की शिक्षा दे दी। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि जब तुम्हारा सर्वस्व लुट गया तब भला आँखों से अश्रुधारा क्यों न निकले।
(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
भगवान ने दया करके मानव देह दिया और आप लोग जब गर्भ में थे तब वादा किया था की महाराज बहुत दु:ख मिल रहा है माँ के पेट में, गंदगी में, सिर नीचे पैर ऊपर कितना कोमल शरीर, हमको निकालो, आपका ही भजन करेंगे आपको पाने का उपाय खोजेंगे अबकी बार मुझे निकालो । और बाहर आया मम्मी ने कहा ए मेरा भजन कर, पापा ने कहा ए मैं तेरा हूँ । यह सब लोगों ने धोखा देकर बेचारे को बेवकूफ बना दिया, भगवान को दिया हुआ वादा भूल गया और भगवान को छोड़ इन लोगों को भजने लगा । और अगर जागा भी, कोई संत मिल गया और जगा दिया तो कल से करेंगे, अवश्य करेंगे अवश्य । आज जरा काम आ गया कल से करेंगे अवश्य।
तन का भरोसा नहीं गोविंद राधे ।
जाने कब काल तेरा तन छिनवा दे ॥
All Glories to Our Divine Master Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
मान ले उनको तू सिर्फ़ अपना.......सीख़ ले याद में बस तड़पना.........वे लगा लेंगे सीने से तुझको.......वे लगा लेंगे सीने से तुझको.........वे 'कृपालु' हैं, तंगदिल नहीं हैं...........!!
जय श्री राधे।
The true love is unlimited and ever increasing. It is a divine power of God.
On the other hand, material love is merely a temporary attachment of mind which eventually becomes a reason for unhappiness.
Rectify your choices.
भगवान जरा अटपटे स्वभाव के हैं । छिप-छिप कर देखते हैं एवं अब तुम जरा सा असावधान होकर संसारी वस्तु की आसक्ति मे बह जाते हो तब श्यामसुंदर को वेदना होती है कि यह मुझे अपना मान कर भी गलत काम कर रहा है । मन श्यामसुंदर को दे देने के पश्चात ! उसमें संसारिक चाह न लाना चाहिए । यह श्यामसुंदर के लिए कष्टप्रद है ।
जीवन क्षणभंगुर है, अपने जीवन का क्षण-क्षण हरि-गुरु के स्मरण में ही व्यतीत करो, अनावश्यक बातें करके समय बरबाद न करो। कुसंग से बचो, कम से कम लोगों से संबंध रखो, काम जितना जरूरी हो बस उतना बोलो।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...