Wednesday, December 19, 2018

आपकी जितनी #आयु #शेष है, यदि उसका एक-एक #श्वास आपने #भगवान् काे साैंप दिया ताे सारे पाप-तापों से #मुक्त हाेकर आप इसी #जन्म में भगवान काे पाकर #अनन्त #जीवनकी #साध पूरी कर सकते हैं। आशा है,आप मेरी #प्रार्थना पर #ध्यान देंगे।
कौन हरि! हमरो तुम्हरो नात।
तुम सोवत निज लोक चैन ते, हम रोवत दिन रात।
हम पल छिन तुम बिन नित तलफत, तुम नहिं पूछत बात।
नैन निगोरे बरजत मोरे, और और अकुलात।
रोम रोम नित याचत मोते, सुंदर श्यामल गात।
जानि ‘कृपालु’ कृपालु तोहिं हौं, प्रीति करी पछितात।|
भावार्थ:-हे श्यामसुन्दर! हमारा-तुम्हारा नाता ही क्या समझा जाय, जबकि तुम अपने गोलोक में चैन से सो रहे हो और हम तुम्हारे लिए निरन्तर रो रहे हैं। हम सदा एक-एक क्षण तुम्हारे मधुर-मिलन के लिए तड़पते रहते हैं फिर भी तुम बात नहीं पूछते। इन हठीले नेत्रों को मैं जितना अधिक समझाता हूँ उतने ही यह और व्याकुल होते हैं। कहाँ तक कहें, प्रत्येक रोम-रोम मुझ से सलोने श्यामसुन्दर को माँगता है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मैंने तुम से, कृपा करने वाला समझकर, प्रेम किया था, किन्तु अब तुम्हारी निष्ठुरता को देखकर मन ही मन पछता रहा हूँ।
(प्रेम रस मदिरा:-दैन्य–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।

#मनुष्य दूसरों को #सुधारने के लिये उनके #दोष देखता है और #आलोचना करता है, #परिणाम यह होता है कि दूसरों के #दोषों का #सुधार तो होता नहीं, दोषों का लगातार #चिन्तन करने से वे दोष #संस्कार #रूप से उसके अपने #अन्दर #घर कर लेते हैं, इससे पहले के रहे दोषों की #पुष्टि होती है, उन्हें #बल मिल जाता है। फिर अपने दोषों का दिखना #बन्द हो जाता है, बल्कि कहीं कहीं तो उसमें #अहंकार #बुद्धि हो जाती है, जिससे #पतनका #पथ #प्रशस्त हो जाता है।
जब मनुष्य दूसरे को सुधारने के लिए उसके दोष देखता है, तब #स्वाभाविक ही वह मानता है कि मुझ में दोष नहीं है, #गुण हैं। इससे #गुणों का #अभिमान बढ जाता है। और दोष बढते रहते हैं। जहां अपने दोष #देखने की #आदत छूटी कि फिर उसका #जीवन ही #दोषमय बन जाता है ।
कोई हो #पापात्मा हो, #पुण्यात्मा हो,स्त्री हो, पुरुष हो, नपुंसक हो,जो भी मुझसे #प्यार कर ले। कुछ भी मान के प्यार कर ले। फिर कोई #कर्म करे,उसको #पाप #पुण्य छू नहीं सकता।और #अर्जुन!अगर कोई ये सोचे कि मैंने तो #शास्त्र-#वेद पढ़ा नहीं, नहीं तो मैं जल्दी #भगवत्प्राप्ति कर लेता।
अरे—नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
मैं #वेदाध्ययन वगैरह से,पण्डिताई से नहीं मिलता। उससे तो और दूर हो जाता हूँ।क्योंकि उसमें #अहंकार हो जाता है।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
(११-५३, ११-५४)
केवल #भक्ति से मिलता हूँ।

व्यास ने प्रथम तो गोविंद राधे ।
गीता ग्रन्थ ही लिखा था बता दे ।। ३५९४ ।।
पुनि महाभारत गोविंद राधे ।
पश्चात् सत्रह पुराण बता दे ।। ३५९५ ।।
महाभारत में तो गोविंद राधे ।
सकाम कर्मों का निरुपण बता दे ।। ३६०३ ।।
महाभारत युद्ध गोविंद राधे ।
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को बता दे ।। ३६०४ ।।
गीता उपदेश भी गोविंद राधे ।
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को बता दे ।। ३६०५ ।।
गीता का सार यही गोविंद राधे ।
युद्ध कर्म कर मन हरि में लगा दे ।। २३६४ ।।
#रचना :- #राधा_गोविंद_गीत
#रचयिता :- #जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)
।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।।
📔भक्ति - शतक📔
कृष्ण - कृपा बिनु जाय नहिं , माया अति बलवान ।
शरणागत पर हो कृपा , यह गीता को ज्ञान ।। 29 ।।
भावार्थ :- यह माया शक्ति इतनी बलवती है कि शक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा के बिना नहीं जा सकती । और यह कृपा भी केवल शरणागत जीव पर ही होती है । यह संपूर्ण गीता का सारभूत ज्ञान है ।
व्याख्या :- माया , श्रीकृष्ण की जड़ , बहिरंगा शक्ति है एवं श्रीकृष्ण की ही शक्ति से चैतन्यवत् कार्य करती है । अतः मायाशक्ति भी श्रीकृष्ण के समान ही है । अतः महानतम ज्ञानी , योगी , तपस्वी भी साधना द्वारा माया को नहीं जीत पाते । गीता के प्रारम्भ से अंत तक केवल शरणागति पर ही जोर दिया और कहा है -
दैवी हृोषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।। ( गीता 7 - 14 )
अर्थात् मेरी शरण आने पर ही ( एव शब्द का अर्थ ' ही होता है ) कोई इस माया से उत्तीर्ण हो सकता है । अंत में भी कहा है यथा -
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । ( गीता 18 - 66 )
शंकर को छोड़कर शेष सभी गीता भाष्यकारों ने इस महामंत्र का शरणागति परक ही अर्थ किया है । यहाँ भी ' एक , शब्द दिया है । इसी अन्तिम गुह्यतम गीता ज्ञान को पाकर ही अर्जुन का मोह भंग हुआ एवं वह युद्ध के लिये तैयार हो गया । उस समय भी अर्जुन ने यही कहा था ।
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । ( गीता 18 - 73 )
अर्थात् मैं अज्ञान मुक्त हो गया और अब युद्ध अवश्य करूँगा ।
#रचना :- #भक्ति_शतक
#रचयिता :- #जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
पृष्ठ संख्या :- ८९ एवं ९०
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)
।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।।
पथिक तुम, इतनो कहियो जाय।
अब न कबहुँ कछु कहहुँ लाल सों, एक बार आ जाय।
ऊखल माहिं न कबहुँ बाँधिहौं, कितै उरहनो आय।
माखन–चोरी ते न रोकिहौं, करे जोइ मनभाय।
जो कोउ ब्रज में कान्हहिं छेड़े, वाको दऊँ बँधाय।
मोको माय न माने तबहूँ, नातो माने धाय।
इमि ‘कृपालु’ कहि यशुमति विलपति, दृग अँसुवन झरि लाय।।
भावार्थ:– (यशोदा जी अपने लाला के वियोग में एक पथिक से श्रीकृष्ण के लिए संदेश भेजती हैं।)
यशोदा जी कहती हैं कि हे राहगीर! तुम मेरे लाला से इतनी ही कह देना कि वह एक बार आकर और देख जाय। यदि उसे कोई कष्ट हो तो फिर चला जाय। मैं अब अपने लाला से कभी कुछ नहीं कहूँगी एवं गोपियों के कितने ही उलाहने क्यों न आयें मैं अपने लाला को कभी भी ऊखल में नहीं बाँधूंगी। मक्खन चुराने से भी मैं अब कभी नहीं रोकूँगी। उसकी जो इच्छा हो वही करे। जो कोई ब्रज में मेरे कन्हैया को छेड़ेगा उसे बँधा दूँगी। हे पथिक! मेरे लाला से कहना कि यदि वह मेरे पास मैया के नाते न आ सके तो भी कम–से-कम पालने वाली धाय के ही नाते आ जाय। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यशोदा जी पथिक से अपने लाला के लिए इस प्रकार सन्देश कहती हुई आँखों से आँसुओं की झड़ी लगाकर विविध प्रकार से विलाप करने लगीं।
(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।

Thursday, December 6, 2018

गुरु सेवा ही धर्म हमारो, दास न हम श्रुतिचारी के।।
गुरु की सेवा ही हमारा धर्म है । हम चार वेद के दास नहीं है । हम उनको नमस्कार करते हैं । तिरस्कार न करना । वेद भगवान् का स्वरुप है, लेकिन वो हमारे बस का नहीं है, हम तैरकर के गंगा को नहीं पार कर सकते इसलिये हमने दस रुपया देकर नाव कर लिया है । नाव में बैठ कर चले जायेंगे ठाठ से 'राधे राधे' करते हुये ... गुरु सँभालेगा । हम केवल शरणागत रहें ।
--------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...