व्यास ने प्रथम तो गोविंद राधे ।
गीता ग्रन्थ ही लिखा था बता दे ।। ३५९४ ।।
पुनि महाभारत गोविंद राधे ।
पश्चात् सत्रह पुराण बता दे ।। ३५९५ ।।
महाभारत में तो गोविंद राधे ।
सकाम कर्मों का निरुपण बता दे ।। ३६०३ ।।
महाभारत युद्ध गोविंद राधे ।
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को बता दे ।। ३६०४ ।।
गीता उपदेश भी गोविंद राधे ।
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को बता दे ।। ३६०५ ।।
गीता का सार यही गोविंद राधे ।
युद्ध कर्म कर मन हरि में लगा दे ।। २३६४ ।।
।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।।
☘📔भक्ति - शतक📔☘
कृष्ण - कृपा बिनु जाय नहिं , माया अति बलवान ।
शरणागत पर हो कृपा , यह गीता को ज्ञान ।। 29 ।।
भावार्थ :- यह माया शक्ति इतनी बलवती है कि शक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा के बिना नहीं जा सकती । और यह कृपा भी केवल शरणागत जीव पर ही होती है । यह संपूर्ण गीता का सारभूत ज्ञान है ।
व्याख्या :- माया , श्रीकृष्ण की जड़ , बहिरंगा शक्ति है एवं श्रीकृष्ण की ही शक्ति से चैतन्यवत् कार्य करती है । अतः मायाशक्ति भी श्रीकृष्ण के समान ही है । अतः महानतम ज्ञानी , योगी , तपस्वी भी साधना द्वारा माया को नहीं जीत पाते । गीता के प्रारम्भ से अंत तक केवल शरणागति पर ही जोर दिया और कहा है -
दैवी हृोषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।। ( गीता 7 - 14 )
अर्थात् मेरी शरण आने पर ही ( एव शब्द का अर्थ ' ही होता है ) कोई इस माया से उत्तीर्ण हो सकता है । अंत में भी कहा है यथा -
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । ( गीता 18 - 66 )
शंकर को छोड़कर शेष सभी गीता भाष्यकारों ने इस महामंत्र का शरणागति परक ही अर्थ किया है । यहाँ भी ' एक , शब्द दिया है । इसी अन्तिम गुह्यतम गीता ज्ञान को पाकर ही अर्जुन का मोह भंग हुआ एवं वह युद्ध के लिये तैयार हो गया । उस समय भी अर्जुन ने यही कहा था ।
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । ( गीता 18 - 73 )
अर्थात् मैं अज्ञान मुक्त हो गया और अब युद्ध अवश्य करूँगा ।
#रचना :-
#भक्ति_शतक#रचयिता :- #जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
पृष्ठ संख्या :- ८९ एवं ९०
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)
।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।। राधे ।।