Saturday, March 30, 2019

Practise of Devotion involves replacing Desires for the world with Desires for God.
संसार की कामना के स्थान पर भगवान् की कामना बनानी है। बड़ी सीधी सी बात है उसी का नाम भक्ति है।
मनुष्य का शरीर' 'श्रद्धा' और 'महापुरुष की प्राप्ति' इन तीन चीजों का मिलना अत्यंत दुर्लभ है।
'मनुष्य शरीर' और 'महापुरुष' मिल भी जाये तो तीसरी चीज 'श्रद्धा' मिलना अत्यधिक दुर्लभ है। अनादिकाल से इसी में गड़बड़ी हुई है। अनंत संत हमें मिलें लेकिन हमारी उनके प्रति श्रद्धा नहीं हुई इसलिए हमारा लक्ष्य हमें प्राप्त नहीं हुआ।
पहले श्रद्धा, उसके बाद साधु संग, फिर भक्ति करो - ये नियम है।
हरि- गुरु चरणानुरागी भक्तवृन्द !
आप सभी भगवत्प्रेमियों का सहज-स्नेह (क्योंकि ईश्वरीय अनुराग के अतिरिक्त आपका मुझसे कोई और स्वार्थ नहीं है, और ये आध्यात्मिक स्वार्थ ही हर प्रकार से वंदनीय है) व हमारे जगद्वन्द्य गुरुवर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के अद्वितीय दिव्य सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार की सेवा में आपका प्रशंसनीय सहयोग हमें निरंतर प्राप्त हो रहा है । इस भगवदीय प्रीति व सहयोग के लिए मैं हृदय से आपकी आभारी हूँ और बारम्बार साधुवाद के साथ आगे भी और अधिक सहयोग की आशा करती हूँ।
और इतने दिनों से Social Media के माध्यम से मैं भी आपकी स्नेह रज्जु में बँधी हुई हूँ इसलिए अपना मानकर ही आप सभी से एक और सहयोग की अपेक्षा करते हुए कुछ निवेदन करना चाहती हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप मेरी किसी भी बात को अन्यथा न लेते हुए इस वास्तविक स्थिति को समझकर अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करेंगें।
आप में से अधिकांश लोग जानते ही हैं कि मैं पिछले लगभग 15 वर्षों से राजस्थान की राजधानी जयपुर व आस पास के क्षेत्रों में श्री महाराज जी की आज्ञा से प्रचार की सेवा कर रही हूँ। लेकिन प्रतिवर्ष यहाँ श्री महाराज जी के प्रवचन, जगद्गुरु कृपालु परिषत(JKP) की तीनों अध्यक्षाओं के सान्निध्य में साधना शिविरों का आयोजन, अन्य प्रचार कार्यों की व्यस्तता के कारण यहाँ अब तक कभी स्थायी सत्संग केंद्र के विषय में अधिक विचार नहीं किया।
लेकिन अब चूंकि बदलते समय के साथ ही यहाँ पर संकीर्तन, अन्य पर्वों इत्यादि के आयोजन के दौरान सत्संग कार्यक्रमों में अस्थायी हॉल में प्रैक्टिकल प्रॉब्लम्स दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रहीं हैं , आर्थिक अपव्यय भी होता है, इसीलिए इसके स्थायी समाधान पर विचार करते हुए,आगे भी सभी के पारमार्थिक लाभ के लिए , एक स्थायी सत्संग केंद्र इस एरिया में बनवाना चाहती हूँ जिसमें समय-समय पर हमारी ट्रस्ट के द्वारा आयोजित अन्य चैरिटेबल एक्टिविटीज़ भी सुविधापूर्वक सम्पन्न होती रहें।
अभी हाल ही में जयपुर के निकट ही 'दौसा जिले' में भगवदिच्छा से ही एक धार्मिक सज्जन ने बिना मांगे ही लगभग 6500 गज ज़मीन हमारी 'राधागोविंद पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट' को दान में दी है। और उनकी यही इच्छा है कि अब शीघ्र ही जनसहयोग से हम इसका सदुपयोग एक सत्संग केंद्र, गोशाला , व निर्धन बच्चों की नि:शुल्क शिक्षा के रूप में करें। अतएव इस लोकोपकारी प्रोजेक्ट के लिए मुझे आप सभी का उदार सहयोग चाहिए। क्योंकि ये दूरगामी योजनायें आप सभी के लाभ के लिए ही हैं और बिना आपके सहयोग के क्योंकि बजट इतना ज़्यादा है कि पूर्ण भी नहीं हो सकतीं।
आप सभी जानते ही हैं श्री महाराज जी ने जीवों के आध्यात्मिक विकास के साथ ही उनके भौतिक विकास पर भी सदैव ध्यान दिया है ताकि उनका सर्वांगीण विकास हो सके । शिक्षा हमारे जीवन में इतनी अधिक महत्त्वपूर्ण है कि उसके बिना व्यक्ति की तुलना पशु से की गई है- 'विद्या विहीन: पशु: ' ( भर्तिहरि ) । लेकिन आज भी हमारे समाज में लाखों लोग ऐसे हैं जो धन के अभाव में जीवन की इस मूलभूत आवश्यकता की भी पूर्ति नहीं कर पाते और अशिक्षित ही रह जाते हैं। इसलिए समाज के समर्थ लोगों का ये परम कर्तव्य है कि वे इन सेवाओं के लिए भी अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करें विशेषकर तब जब ये निःशुल्क विद्यालय बिना किसी स्वार्थ के किसी आध्यात्मिक संस्था के द्वारा चलाये जायें , जिनमें उनके आध्यात्मिक विकास का भी प्रयत्न किया जाए जैसे श्री महाराज जी द्वारा कुंडा में निर्मित निःशुल्क शिक्षण संस्थानों में किया जा रहा है। बच्चे ही समाज का भविष्य हैं, और सही शिक्षा व आध्यात्मिकता के विकास से ही इन्हें भावी समाज का जिम्मेदार नागरिक बनाया जा सकता है इसमें इनका भी कल्याण निहित है, और सम्पूर्ण समाज का, देश का, मानवजाति का भी।
और गौशाला का जो प्रस्ताव मेरे पास आया है वो भी सराहनीय है क्योंकि आज हमारे ठाकुर जी की प्रिय गोमाता की दयनीय स्थिति से आप सभी परिचित हैं। भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं नंगे चरण वन में गोचारण किया, उनकी सेवा की , अपने अद्भुत गो प्रेम के कारण ही वे अनंत कोटि ब्रह्मांड पाल होकर भी 'गोपाल' कहलाये। जिस गोमाता का गोबर, मूत्र इत्यादि भी पवित्रता का सूचक हो, बड़े बड़े धार्मिक अनुष्ठानों में स्थान की शुद्धि इत्यादि हेतु प्रयोग में लाया जाता हो, अनेक रोगों के निवारण के काम आता हो वो गौ वास्तव में सबकी माता ही है जो अपने दुग्ध के दान से समस्त मानवजाति को पुष्ट करती है। उसे मात्र पशु समझने वाले और निर्दयता का आचरण करने वाले सभी मनुष्य स्वयं अपने लिए नरक जाने का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। ऐसे निर्मम मनुष्यों से उनकी रक्षा करना और गोमाता की सेवा करना सभी के लिए सौभाग्य की बात है। इसीलिए सरकार के द्वारा भी और समाज के कई वर्गों के द्वारा भी गोसेवा का प्रशंसनीय कार्य किया जा रहा है। आप सब भी हमारे साथ इस सेवा में सहयोगी बनकर गोसेवा का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।
वैसे तो 'वसुधैव कुटुम्बकं' के अनुसार ये समस्त विश्व हमारा है क्योंकि हम सभी उस एक परम पिता की ही संतान हैं इसलिए इस ईश्वरीय कार्य में सभी का सहयोग अपेक्षित है लेकिन चूँकि उस ईश्वर को सभी अपना पिता मानते नहीं , सभी व्यक्ति धार्मिक नहीं इसलिए धर्म में, ईश्वर में, गुरु चरणों में प्रीति रखने वाले आप जैसे भगवद्भक्तों से ही सहयोग की अपील की जा सकती है, जो वास्तव में सत्संग का महत्त्व समझते हैं और ये भी समझते हैं कि बिना अर्थ के आज के युग में धार्मिक कार्य भी सम्पन्न नहीं हो सकते।
श्री महाराज जी सत्संग की महिमा बताते हुए 'राधा गोविंद गीत' में कहते हैं -
स्वर्ग अपवर्ग सुख गोविंद राधे।
मिलि सत्संग सुख सम ना बता दे।।
सत्संग सम सुख गोविंद राधे।
भुक्ति - मुक्ति वैकुंठ का ना बता दे।।
अर्थात् सत्संग का सुख भुक्ति, मुक्ति, वैकुंठ के सुख से भी बढ़कर है, फिर श्री महाराज जी के अद्वितीय सत्संग के विषय में क्या कहा जाये ? उनके सत्संग के व्यापक प्रचार - प्रसार हेतु धन का दान करना तो सर्वश्रेष्ठ दान है, धन का वास्तविक सदुपयोग है जिससे आपके साथ साथ अन्य जीवों का भी पारमार्थिक कल्याण होता है।
इतने दिनों से आप हमारे संपर्क में हैं इसलिये पारमार्थिक दान की महिमा भी समझते ही हैं, और श्री महाराज जी के अद्वितीय सत्संग की भी ( जिसकी इस समय विश्व को सबसे अधिक आवश्यकता है ) । अतएव संक्षेप में बस इतना ही निवेदन करना चाहती हूँ कि हरि-गुरु के होने के नाते हम केवल एक दूसरे को अपना मान लें, और श्री महाराज जी के सत्संग संबंधी कार्यों को अपना कार्य, तो सभी कार्य चुटकियों में सम्पन्न हो सकते हैं। इनमें सहभागी बनकर हम अपना भी कल्याण करें व दूसरों के कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करें जिस सेवा से हमारे हरि गुरु सर्वाधिक प्रसन्न होते हैं।
इन सभी सेवाओं से जुड़ने का आध्यात्मिक फल , आत्मतुष्टि आपको प्रत्यक्ष अनुभव में आएगी, हरि गुरु चरणों में प्रीति भी निरन्तर बढ़ती जाएगी।
एक कदम बढ़ाकर विश्वास करके तो देखें।
नोट: आप विश्व के किसी भी कोने से अपना आर्थिक सहयोग मेरी वेबसाइट(website) Shreedharididi.in के 'Support us' पेज पर जाकर विभिन्न Payment Gateways जैसे Payumoney, Razorpay के माध्यम से एवं अन्य माध्यम Paypal,Paytm, या सीधे ifsc code के माध्यम से account में भेज सकते हैं। आपके पास Donation भेजने के विभिन्न विकल्प उपलब्ध कराए गए हैं, जिसको जैसी सुविधा हो, वो उसी अनुसार इनका उपयोग करके भेजे।
आपकी सुविधा के लिए लिंक नीचे दिया जा रहा है।
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और अधिक जानकारी के लिए sharadgupta40@gmail.com इस mail id पर सम्पर्क करें।
धन्यवाद।
राधे-राधे।

Tuesday, December 25, 2018

हमारो, कान्ह प्रान को प्रान।
आजु सखी! हौं करन गई रहि, यमुना महँ असनान।
तहँ दुर्वासा मरम बतायो, दै वेदादि प्रमान।
मुनि इमि कह इंद्रिय मन बुधि कहँ, जिमि प्रिय प्रान बखान।
तिमि इन प्रानन प्रान जान उन, सुंदर श्याम सुजान।
कह ‘कृपालु’ तबही सखि! लागत, प्रानन प्यारो कान्ह||
भावार्थ:– हमारे श्यामसुन्दर आत्मा की भी आत्मा हैं। अरी सखी! आज मैं यमुना–स्नान करने गयी थी, वहाँ दुर्वासा मुनि ने वेदादिकों के प्रमाण द्वारा यह रहस्य बताया। उन्होंने कहा जिस प्रकार इन्द्रिय, मन, बुद्धि को प्राण अर्थात् आत्मा, अपने से भी अधिक प्रिय है, उसी प्रकार आत्मा को भी, आत्मा की आत्मा–परमात्मा अर्थात श्यामसुंदर अधिक प्रिय हैं। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं–अरि सखी! इसी कारण से श्यामसुन्दर प्राणों से भी अधिक प्यारे लगते हैं। यह रहस्य आज समझी।
(प्रेम रस मदिरा:-श्रीकृष्ण–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
अलबेली मम सरकार , जो महाभाव साकार।
जेहि सेवत नंदकुमार , जेहि महिमा अपरंपार ।।
तनु दिव्य गौर सरकार , बह रोम रोम रस धार ।
रस पियत सबै ब्रजनार , जेहि छवि लखि छवि बलिहार।।
सब जग भज नंदकुमार , सोइ भज स्वामिनी सुकुमार ।
पग चापत जेहि रिझवार , सोइ मम 'कृपालु' सरकार ।।
सहनशीलता बढ़ानी है। किसी के भी निंदनीय शब्द से अथवा व्यवहार से मन में अशांति न हो । बस यही साधना एवं दीनता है। किसी की निरर्थक बात को न सुनना है, न सोचना है। यदि कोई दुराग्रह करके या अन्य कुसंग द्वारा अपना पतन करना ही चाहता है तो भगवान और महापुरुष क्या कर सकते हैं। घोर संसारासक्त लोगों से सदा सर्वदा अपने को दूर रखने का प्रयत्न करो। भक्तों का संग करो। कुसंग से बचो।
#जगदगुरूत्तम_श्री_कृपालु_जी_महाराज

Realise the importance of the human birth and do not waste it in merely eating, drinking and making merry. This human body is inaccessible even to celestial gods. Having attained this precious birth, if we still fail to attain our ultimate aim in life, we will later regret our foolishness, because there is no other form of life in which we will be able to do anything towards the attainment of our ultimate goal. It is necessary therefore to think about what we are looking for in life.
#JAGADGURU_SHRI_KRIPALUJI_MAHARAJ.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...