Saturday, June 1, 2019

जितनी शक्ति भगवान में है उतनी शक्ति माया में भी है इसलिए माया को जीत नही सकते लेकिन भगवान की ओर मोड़ सकते हैं । कामना हो तो भगवान की लोभ हो तो भजन कैसे बढ़े, क्रोध आए तो इसलिए की आज भजन नहीं हो पाया। यही काम क्रोध लोभ संसारी लोगों से हुआ तो नाश कर देगा। दुखी कर देगा।
#जगदगुरूत्तम_श्री_कृपालु_जी_महाराज
अहंकार से बचना और अपमान न फील करना,यह साधना की आधारशिला है। यह चीज साधना करने वाले जीवों के लिये श्रीगणेश है। इस चीज को भगवत्प्राप्ति तक समझना है। पांचो इन्द्रियों को जीतना और स्त्री,पति,बाप बेटे किसी में अनुराग न करना संभव है अगर यह चीजें आपके मार्ग में बाधक नहीं हैं, किन्तु मान अपमान की फीलिंग जब तक ठीक नहीं बैठती, आप में अहंकार सदा रहेगा, एवं बढ़ता ही जायेगा। संकीर्तन में आपके आंसू नहीं आते यह अहंकार के कारण है और अगर आंसू आते है और सोचता है मेरे आंसू आते है यह सूक्ष्म अहंकार है।
हमें निरन्तर हरि गुरु का स्मरण करने का अभ्यास करना है । निरन्तर मन को मनमोहन में ही रखना है । यदि कभी मन संसार में चला भी जाय तो यह नहीं सोचना है कि हमसे साधना नहीं होगी । हमारे वश का यह साधना नहीं है आदि । अरे सोचो तो जब और कोई चारा ही नहीं है । और दुःख निवृत्ति एवं आनन्दप्राप्ति का स्वभाव बदल ही नहीं सकता तो निराशा महान् भूल है।
देवदुर्लभ मानव देह पाना ही भगवत्कृपा है। फिर श्रीकृष्ण भक्त्ति का तत्वज्ञ गुरु मिल जाय और वह बोध करा दे (स्वयं शास्त्रों को पढ कर तो अनंत युगों में भी तत्वज्ञान असंभव है) तो फ़िर अब कौन सी हरि गुरु कृपा शेष है । अब तो साधक की ही कृपा ( साधना करने की) अपेक्षित है । देखो जब नवजात शिशु बैठना सीखता है, खडा होना, चलना आदि सीखता है तो हजारों बार गिरता है । किंतु पुनः चलने का अभ्यास करता है। वह अबोध होकर भी अभ्यास द्वारा चलने लगता है। और तुम बोधयुक्त (गुरु ने बोध करा दिया) होकर भी अभ्यास से कतराते हो। आश्चर्य की बात है!
बार-बार सोचो , बार-बार सोचो, बस वो मिल जायेंगे। हम इंद्रियों से तो बहुत साधना करतें हैं , जबान से राम राम , श्याम श्याम, राधे राधे । तीर्थो में जाते हैं,मंन्दिरों में जाते है ,पैर से मार्चिंग करते हैं। पूजा करते है हाथ से, आँख से देखते है मूर्ति को, कान से सुनते है भागवत पुराण , गर्ग पुराण , गरुड़ पूराण वगैरह ये इन्द्रियों का वर्क है। भगवान कहते हैं ये सब हम नहीं चाहते, न नोट करते है इसको हम। तुम्हारे मन का अटैचमेंट कितने परसेंट हुआ भगवान मे बस इसको ही प्यार, भक्ति, साधना कहते हैं ।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
किशोरी मोरी, करहु कृपा की कोर।
बहुविधि नाच नचावति स्वामिनि!, यह माया बरजोर।
काम क्रोध अरु लोभ मोह मद, घेरे चहुँ दिशि चोर।
जानतहूँ नहिं मानत ठानत, हठहिँ हठी मन मोर।
सुत वित नारि पियारि लगति अति, यदपि कहावत तोर।
ताते दै निज प्रेम ‘कृपालुहिं, हेरहु हमरिहुँ ओर।।
भावार्थ:- हे किशोरी जी! मुझ पर कृपा दृष्टि करो। यह प्रबल माया मुझे अनेक प्रकार के नाच नचा रही है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह ये बड़े-बड़े शत्रु चारों ओर से घेरे हुए हैं। सब कुछ जानते हुए भी यह हठीला मन दुराग्रह के कारण नहीं मानता, संसार की ओर ही जाता है। यधपि मैं तुम्हारा कहलाता हूँ फिर भी धन, पुत्र, स्त्री आदि से प्यार करता हूँ। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं इसलिए एक बार हमारी ओर भी देखकर, अपना विशुद्ध प्रेम देकर कृतार्थ करो।
(प्रेम रस मदिरा:-दैन्य-माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
यह सत्य है कि मन अत्यंत चंचल है किन्तु यदि मन को बार बार समझाया जाय कि श्रीराधा ही तेरी हैं , सांसारिक नातेदार तो केवल शरीर के हैं और उन नातों का आधार केवल स्वार्थ ही है तो धीरे धीरे मन संसार से विरक्त होकर श्री राधा में अनुरक्त हो जाएगा ।
-------श्री महाराजजी।
भगवान् के निमित्त किया हुआ पाप भी धर्म हो जाता है जाता है एवं भगवान् को छोड़कर किया हुआ धर्म भी पाप हो जाता है।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...