Saturday, June 1, 2019

जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराजजी से साधक का प्रश्न: जब हम अपने दोस्त,रिश्तेदार आदि को भगवद विषय समझाने का प्रयत्न करते हैं तब समझने के बजाय कभी-कभी वे और अकड़ जाते हैं। इससे हमे बहुत दुख होता है। ऐसे में हम क्या करें?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर: अश्रद्धालु एवं अनाधिकारी से अपने मार्ग अथवा साधना आदि के विषय में वाद-विवाद करना भी कुसंग है,क्योंकि जब अनाधिकारी को सर्वसमर्थ महापुरुष भी आसानी के साथ बोध नहीं करा पाता,तब साधक भला किस खेत की मूली है। यदि कोई परहित की भावना से भी समझाना चाहता है,तब भी उसे ऐसे नहीं करना चाहिए,क्योंकि अश्रद्धालु होने के कारण उसका विपरीत ही परिणाम होगा। साथ ही अश्रद्धालु के न मानने पर साधक का चित्त अशांत हो जाता है।
शास्त्रानुसार भी भक्तिमार्ग को लेकर वाद-विवाद करना घोर पाप है। अतएव न तो वादविवाद सुनना चाहिए,न तो स्वयं करना चाहिए। यदि अनाधिकारी जीव इन विषयों को नहीं समझता ,तो इसमें आश्चर्य या दुख भी नहीं होना चाहिए,क्योंकि कभी तुम भी तो नहीं समझते थे। यह तो परम सौभाग्य महापुरुष एवं भगवान की कृपा से प्राप्त होता है कि जीव भगवदविषय को समझकर उसकी और उन्मुख हो।
अनाधिकारी को भगवदविषयक कोई अंतरंग रहस्य भी न बताना चाहिए,क्योंकि वर्तमान अवस्था में अनुभवहीन होने के कारण अनाधिकारी उन अचिंत्य विषयों को नहीं समझ सकता। उलटे अपराध कमाकर अपनी रही सही अस्मिता को भी खो बैठेगा। साथ ही अंतरंग रहस्य बताने वाले साधक को भी अशांत करेगा।
Avoid Spiritual discussions with an unqualified person. In his present state, he cannot comprehend those incomprehensible subjects as he is devoid of spiritual experience. He will only transgress, losing whatever little faith he has. In addition, his faithlessness will disturb the mind of the person revealing those Divine Secrets.
#Jagadguru_shri_kripalu_ji_maharaj.
वास्तविक साधना गुरु आज्ञापालन ही है। जो कुछ प्राप्त होना है वह तो गुरु कृपा पर ही निर्भर है।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
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जितनी शक्ति भगवान में है उतनी शक्ति माया में भी है इसलिए माया को जीत नही सकते लेकिन भगवान की ओर मोड़ सकते हैं । कामना हो तो भगवान की लोभ हो तो भजन कैसे बढ़े, क्रोध आए तो इसलिए की आज भजन नहीं हो पाया। यही काम क्रोध लोभ संसारी लोगों से हुआ तो नाश कर देगा। दुखी कर देगा।
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अहंकार से बचना और अपमान न फील करना,यह साधना की आधारशिला है। यह चीज साधना करने वाले जीवों के लिये श्रीगणेश है। इस चीज को भगवत्प्राप्ति तक समझना है। पांचो इन्द्रियों को जीतना और स्त्री,पति,बाप बेटे किसी में अनुराग न करना संभव है अगर यह चीजें आपके मार्ग में बाधक नहीं हैं, किन्तु मान अपमान की फीलिंग जब तक ठीक नहीं बैठती, आप में अहंकार सदा रहेगा, एवं बढ़ता ही जायेगा। संकीर्तन में आपके आंसू नहीं आते यह अहंकार के कारण है और अगर आंसू आते है और सोचता है मेरे आंसू आते है यह सूक्ष्म अहंकार है।
हमें निरन्तर हरि गुरु का स्मरण करने का अभ्यास करना है । निरन्तर मन को मनमोहन में ही रखना है । यदि कभी मन संसार में चला भी जाय तो यह नहीं सोचना है कि हमसे साधना नहीं होगी । हमारे वश का यह साधना नहीं है आदि । अरे सोचो तो जब और कोई चारा ही नहीं है । और दुःख निवृत्ति एवं आनन्दप्राप्ति का स्वभाव बदल ही नहीं सकता तो निराशा महान् भूल है।
देवदुर्लभ मानव देह पाना ही भगवत्कृपा है। फिर श्रीकृष्ण भक्त्ति का तत्वज्ञ गुरु मिल जाय और वह बोध करा दे (स्वयं शास्त्रों को पढ कर तो अनंत युगों में भी तत्वज्ञान असंभव है) तो फ़िर अब कौन सी हरि गुरु कृपा शेष है । अब तो साधक की ही कृपा ( साधना करने की) अपेक्षित है । देखो जब नवजात शिशु बैठना सीखता है, खडा होना, चलना आदि सीखता है तो हजारों बार गिरता है । किंतु पुनः चलने का अभ्यास करता है। वह अबोध होकर भी अभ्यास द्वारा चलने लगता है। और तुम बोधयुक्त (गुरु ने बोध करा दिया) होकर भी अभ्यास से कतराते हो। आश्चर्य की बात है!

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...