Tuesday, January 7, 2020

O stubborn and foolish mind! Besides spoiling yourself, you are spoiling me as well. You have wasted countless lives wandering around in the material world, but have refused time and time again to surrender to the merciful Radha Rani, who is waiting with open arms to embrace you. It is not too late. Go to Radhe Rani. She will forgive you and accept you as Her own.
.........SHRI MAHARAJJI.
तत्वज्ञान की सबसे पहली सीढ़ी है इस बात का चिंतन करना "मैं नित्य चेतन आत्मा हूँ, शरीर नहीं हूँ" । आपने अपने को देह मान लिया है। बस यहीं से सारी गड़बड़ शुरू होती
है। जैसे गणित में यदि पहले कदम पे ही गलती हो जाये तो फिर आगे गलती होती ही जाती है। इसी प्रकार स्वयं को शरीर मान लेने से हम गलत दिशा में चलते जाते हैं।
------जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज।
We should attribute our good deeds to the God's grace and the Grace of the Guru; and for all the wrongs we may have done,we should hold ourselves responsible.
तुम्हारा श्यामसुंदर के बने बिना जीना निरर्थक है। अरे! पेट तो शूकर भी भर लेते हैं। क्या केवल पेट भरना ही जीवन का उद्देश्य है?
..........श्री महाराजजी।
हे जीव ! गुरु की पूर्ण शरणागति ग्रहण कर। अपने मन की डोर को गुरुदेव के हाथों में सौंप दे।
------श्री महाराजजी।
अरे मनुष्यों ....!!!
ये देव दुर्लभ शरीर है। देवता लोग याचना करते हैं इसकी। वह पा चुके हो। इसकी कीमत समझो और तुरंत महापुरुष के बताए मार्ग पर चलकर अपना कल्याण करो।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
तुम 'कृपालु' को क्या दोगे? 'कृपालु' तुमसे कुछ लेने नहीं,तुम्हें कुछ देने आया है।
.........श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...