Wednesday, April 22, 2020

हरि गुरु कृपाभिलाषी भक्तवृन्द !
जय श्री राधे ।
संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं। एक कहलाते हैं कृतज्ञ और दूसरे होते हैं कृतघ्नी। कृतज्ञ अर्थात् किसी के द्वारा किये गए उपकार का एहसान मानने वाला ,आभार मानने वाला, इस प्रकार के लोग उत्तम होते हैं। और कृतघ्नी वो हैं जो किसी के उपकार का कोई एहसान नहीं मानते अर्थात् एहसान फ़रामोश। इस प्रकार के लोग निकृष्ट माने जाते हैं।
इनमें से हमारी स्थिति एक कृतघ्नी जैसी है। हरि गुरु की अनंत कृपायें होते हुए भी हम उनकी कृपा का आभार नहीं मानते , उनकी कृपाओं का चिंतन नहीं करते अपितु नित नवीन कामनायें करके सदा उन्हें दोष ही दिया करते हैं। स्वयं में कमी न मानकर उनकी कृपा में कमी मानते हैं।
इसी वास्तविकता को 'राधा गोविंद गीत' में स्पष्ट करते हुए श्री महाराज जी कहते हैं -
तुझ सा कृपालु नहिं गोविंद राधे ।
मुझ सा कृतघ्नी कोई हो तो बता दे ।।
तेरे उपकारों का गोविंद राधे ।
आभार माना नहिं मानना सिखा दे।।
हे नाथ! जिस प्रकार तुम जैसा कोई #कृपालु नहीं हो सकता उसी प्रकार मुझसे बड़ा कोई कृतघ्नी नहीं हो सकता। मैंने कभी तुम्हारी कृपाओं का आभार नहीं माना।
अब ऐसी कृपा कर दो उन अनंत अकारण कृपाओं का ही निरंतर चिंतन करके दिन रात अश्रु बहाता रहूँ । इसी कृपायाचना के साथ-
आपकी दीदी:
#सुश्री_श्रीधरी_दीदी_प्रचारिका_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
श्री राधाकृपाभिलाषी भक्तवृन्द !
जय श्री राधे ।
पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति श्री राधा समस्त श्रुतियों की सारस्वरूपा हैं। समस्त श्रुतियाँ एकांत में श्री राधा की स्तुति करती हैं। किशोरी जी की पूर्ण महिमा का ज्ञान उनकी कृपा से ही जीवों को प्राप्त हो सकता है। श्री राधा की भक्ति के बिना श्री कृष्ण की भक्ति अधूरी है, अपूर्ण है ।
राधा-तत्त्व न होता तो श्रीकृष्ण भी केवल नीरस ब्रह्मस्वरूप ही होते, रसिक शिरोमणि न बन पाते। परमात्मा श्री कृष्ण की भी आत्मा हैं श्री राधा। श्री कृष्ण स्वयं भी उनकी आराधना करते हैं। उमा, रमा, ब्रह्माणी, वाणी इत्यादि सभी महाशक्तियाँ जिनकी दासियाँ हैं वो गौरवर्णी राधा श्यामसुंदर के रस को भी बौना कर देती हैं-
गौर रूप रस ऐसा गोविंद राधे ।
श्याम रूप रस को भी बौना बना दे ।। ( राधा गोविंद गीत )
स्वयं श्यामसुंदर भी किशोरी जी के रूप रस सिंधु में नित्य अवगाहन किया करते हैं। कभी गौर सरकार की आरती करके तो कभी चरण सेवा द्वारा, कभी उनका श्रृंगार करके तो कभी जयजयकार करते हुए अगवानी करके उन्हें रिझाया करते हैं , उनके कृपाकटाक्ष के सदा भिक्षुक बने रहते हैं और उन्हीं से कृपा प्राप्त करके जीवों पर कृपा लुटाया करते हैं ।
ऐसी हमारी सनातन स्वामिनी श्री राधा हम जैसे परम पातकी जीवों के लिए करुणामणि के समान हैं -
परम पातकी की गोविंद राधे ।
करुणामणि राधारानी बता दे ।।
( राधा गोविंद गीत )
हमारी करुणामयी माँ श्यामा वात्सल्य की अगाध सिंधु हैं, महाभावस्वरूपिणी हैं, दिव्य प्रेम रस की सारस्वरूपा हैं, आनंदकंद श्यामसुंदर को भी आनंद प्रदान करने वाली हैं।
वे अत्यंत सुकुमार एवं भोरी भारी हैं, सरलता की साक्षात मूर्ति हैं।
भगवान की सर्वश्रेष्ठ कृपाशक्ति का ही दूसरा नाम हैं राधा जिनके आधीन स्वयं श्यामसुंदर रहते हैं।
ऐसी कृपास्वरूपिणी श्री राधारानी का कृपाकटाक्ष हम सभी को शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त हो इसी मंगल कामना के साथ-
★★★★कृपासिंधु भगवान★★★★
वेदों में भगवान को अनंत भी कहा गया है यथा -
अनंतश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता
क्योंकि उनकी हर चीज़ अनंत है। नाम अनंत, रूप अनंत, धाम अनंत, जन अनंत, शक्तियाँ अनंत। उनकी कोई भी चीज़ सीमित है ही नहीं। इसी प्रकार उनके गुण भी अनंत हैं। पृथ्वी के धूलिकणों को भले ही कोई गिन ले, सूर्य की किरणों को गिन ले लेकिन भगवान के अनंत दिव्य गुणों की गणना कथमपि नहीं हो सकती।
भूमि के परमाणु गोविंद राधे,
गिन भी लो हरि गुन अमित बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-पात्रे
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति
अर्थात् यदि नीले पर्वत को समुद्र में मिलाकर स्याही तैयार की जाए, देवताओं के उद्यान के वृक्ष की शाखाओं को लेखनी बनाया जाए और पृथ्वी को कागज बनाकर भगवती शारदा (सरस्वती देवी) अनंतकाल तक लिखती रहें तब भी भगवान के गुणों का पार नहीं पाया जा सकता, वर्णन नहीं हो सकता। क्योंकि वर्णन तो सीमित का हो सकता है, अनंत का तो कहीं अंत ही नहीं इसलिए कथन अनंतकाल तक होता रहेगा। इसलिए भगवान की महिमा अपरंपार है। वे अचिन्त्य अनंतकल्याणगुणगणनिलय हैं।
अगनित गुन गन गोविंद राधे
सुनि शुक ब्रह्म समाधि भुला दे।
(राधा गोविंद गीत)
अर्थात् भगवान के ऐसे अनंत दिव्य गुणों के विषय में सुनकर शुकदेव सरीखे आत्माराम पूर्णकाम परम निष्काम निर्ग्रन्थ अमलात्मा परमहंस भी अपने निर्गुण-निर्विशेष-निराकार ब्रह्म की समाधि को भूल जाते हैं।
भगवान के अनंत गुण हैं जैसे वे अनंत सौंदर्य-माधुर्य-सुधासिंधु हैं, अनंत बलशाली हैं, नित्य किशोर हैं, भक्तवत्सल, भक्तवश्य हैं इत्यादि। लेकिन उनका सबसे बड़ा गुण है कृपा का जिससे जीवों का कल्याण होता है। वे अकारण कृपा के अनंत सिंधु हैं, कृपा सागर हैं, दयालु हैं। उनके हृदय में करुणा का पारावार सदा हिलोरें मारता रहता हैं। वे तो जीवों पर कृपा करने के लिए सदा लालायित रहते हैं, कृपा करने के बहाने ढूँढते रहते हैं। उनकी इसी अकारण कृपा का ज्वलंत उदाहरण है - पूतना उद्धार।
अहोवकीयं स्तनकालकूटं जिघांसया पाययदप्य साध्वी
लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम।
(भागवत)
शुकदेव परमहंस भगवान के इसी अकारण करुणा के गुण को सुनकर श्री कृष्ण के दीवाने हो गए कि जिन्होंने अपने वक्षस्थल में विष लगाकर मार डालने की मंशा से आई हुई राक्षसी पूतना को भी अपनी माता का स्थान देकर सद्गति प्रदान की, अपने लोक भेज दिया ऐसे दयालु श्री कृष्ण को छोड़कर भला हम किसकी शरण में जायें।
नहिं मान्यो अपराध पूतनहिं,
गरल पिवावनहारी के,
दै 'कृपालु' निज लोक मातु सम,
को पटतर बनवारी के।
हमारे परमपूज्य गुरुवर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं श्री कृष्ण इतने दयालु हैं कि उन्होंने विषपान कराने वाली पूतना के अपराध को भी अपराध न मानकर उसपर कृपावृष्टि करते हुए उसे अपना लोक दे दिया, उनसे बढ़कर कृपालु विश्व में और कौन हो सकता है।
अनंत कृपासिंधु भगवान के ऐसे दिव्य गुणों के विषय में सुनकर पामर से पामर जीवों के हृदय में भी भगवत्क्षेत्र में चलने का उत्साह होता है, भगवान की कृपा का भरोसा होता है कि जब उन्होंने इस प्रकार अनंत जीवों को अपनाया है तो वे हमें भी अवश्य अपनायेंगे। एक दिन हम भी उनकी कृपा के अधिकारी अवश्य बन सकेंगे।
अस्तु! बारम्बार भगवान के दिव्य गुणानुवाद करते हुए हमें उनके पतितपावन इत्यादि गुणों पर अपने विश्वास को दृढ़ करना चाहिए और अश्रु बहाकर अकारण करुणावरुणालय श्री कृष्णचन्द्र की कृपा की बाट जोहते हुए उनका निरंतर स्मरण करना चाहिए।
संसार में अधिकांश लड़ाई-झगड़ो का, अशांति का कारण क्रोध है। यद्यपि यह माया का एक सूक्ष्म विकार है लेकिन जब यह किसी के भीतर प्रकट होता है तो फिर सामने हम उस व्यक्ति के नहीं उसके रूप में साक्षात क्रोध के ही दर्शन करते हैं। कई लोग अपने जीवन में बात-बात पर क्रोध का प्रदर्शन करके स्वयं को बड़ा ताकतवर समझते हैं लेकिन वास्तव में यह क्रोध मनुष्य की ताकत नहीं, एक कमजोरी है, बहुत बड़ा दुर्गुण हैं। इसलिए किसी भी प्रकार हमें इसे नियंत्रण में रखने का प्रयास करना चाहिए।
इसे नियंत्रित करने के लिए हमें यह बात गंभीरता से समझनी होगी कि इससे सबसे अधिक नुकसान स्वयं को ही होता है। इसे कालकूट विष से भी अधिक घातक कहा गया है -
कालकूट अरु क्रोध में, बड़ौ अंतरो आहि,
क्रोध स्व आश्रय को दहत, विष नहिं स्वाश्रय दाहि।
अर्थात् विष तो केवल पान करने वाले व्यक्ति को नुकसान पहुँचाता है लेकिन जिस पात्र में वह रखा होता है उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचाता। किन्तु क्रोध रूपी विष तो स्वाश्रय को अर्थात् क्रोध करने वाले व्यक्ति को ही जला देता है। जिस पर हम क्रोध करते हैं उसे तो कष्ट होता ही है, हम स्वयं भी उस क्रोधाग्नि में जलते रहते हैं, अशांत हो जाते हैं। इसीलिए तुलसीदास जी ने कहा -
क्रोध पित्त नित छाती जारा
क्रोध रूपी पित्त रोग निरंतर हमारे हृदय को भी जलाता रहता है। इसे सबसे बड़ी अग्नि कहा गया है -
आन अग्नि नहिं क्रोध सम
क्रोध से समस्यायें हल होने के बजाय और अधिक बढ़ जाती हैं। जब हम क्रोधित होते हैं तो सामने वाला भी उत्तेजित होकर गाली गलौज करने लगता है। इसीलिए कबीरदास जी ने कहा -
आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक ।
कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक ॥
अगर कोई और भी हम पर क्रोध कर रहा हो तो -
मौनिन: कलह नास्ति
मौन हो जाने पर कलह शांत हो जाता है। क्रोध करने से मानसिक अशांति तो बढ़ती ही है साथ ही यह हमारे शरीर को भी रोगग्रस्त कर देता है और हम मृत्यु के और निकट पहुँच जाते हैं । रक्तचाप, हृदयाघात इत्यादि जैसे प्राणघातक रोगों की चपेट में आ जाते हैं इसलिए इसे भी काल कहा गया -
क्रोधो वैवस्वतो राजा
यह क्रोध साक्षात यमराज के समान है। क्रोधित होने पर व्यक्ति की बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है और सही निर्णय न ले पाने के कारण अंततः उसका पतन हो जाता है इसलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा -
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।
(गीता : 2-63)
क्रोधित व्यक्ति अन्य सभी की घृणा का भी पात्र बन जाता है। हम ऐसे व्यक्ति का चेहरा देखना भी पसंद नहीं करते। कई स्थितियों में क्रोध करने वाला व्यक्ति क्रोध करने के पश्चात पाश्चाताप की ज्वाला में भी जलता रहता है। तात्पर्य यही है कि क्रोधी और मूर्ख दोनों समान माने गए हैं। क्योंकि क्रोध से व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आध्यात्मिक हर प्रकार का ह्रास होता है। ऐसे हानिकारक क्रोध का आचरण करने वाला बड़े से बड़ा विद्वान भी मूर्ख ही है।
इससे बचने के लिए हमें बारम्बार इन परिणामों पर विचार करते हुए क्रोध पर संयम रखना चाहिए। हमें स्वयं को सदा वही आचरण करने के लिए प्रेरित करना चाहिए जिसकी अपेक्षा हम अपने लिए औरों से करते हैं। क्षमाशीलता, सहनशीलता इत्यादि सद्गुण हैं, कायरता नहीं। इसलिए इन्हें धारण करना चाहिए -
अक्रोधन: क्रोधनेभ्य: विशिष्ट:
(महाभारत)
अर्थात् क्रोध न करने वाला क्रोधी व्यक्ति से श्रेष्ठतर होता है। मनुष्य से गलती होना स्वाभाविक है। कोई भी मनुष्य संसार में पूर्ण नहीं होता। गलतियाँ हमसे भी होती हैं यह सोचकर उदारवृत्ति को अपनाना चाहिए। क्षमा कर देना भूषण है, महानता है। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य को धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। जहाँ आवश्यकतानुसार क्रोध करना भी पड़े तो केवल ऊपर से क्रोध का अभिनय मात्र हो, उसे हम भीतर न ले जायें। सबके अंदर अपने इष्टदेव को देखने का भी अभ्यास करें। अगर क्रोध आये भी तो सदा हमें उस क्रोध पर क्रोध करना चाहिए कि यह दुश्मन क्यों आ गया, मैं इसे स्वयं पर हावी नहीं होने दूँगा। किसी अन्य पर क्रोध न करें -
क्रोधे क्रोध: कथं नु ते
इस प्रकार निरंतर अभ्यास से हम इस पर नियंत्रण कर सकते हैं। पूर्णरूपेण तो ये दोष भगवत्प्राप्ति पर ही समाप्त होते हैं।
मनुष्य की सारी आयु सारहीन चीजों के अहंकार में ही व्यतीत हो जाती है और इसी निरर्थक अहंकार के कारण ही अनादिकाल से आजतक हम न किसी भगवान के अवतार के आगे शरणागत हो सके न महापुरुषों के। अनंत जन्मों में अनंत बार भगवान ने स्वयं भी अवतार लेकर एवं अनेकानेक महापुरुषों को भेजकर हमारे कल्याण के लिए प्रयत्न किया लेकिन इसी मिथ्या अहंकार वश हमने सबको ठुकरा दिया और परिणामस्वरूप आज भी उसी अहंकार के नशे में डूबे हुए माया के थपेड़े सहते जा रहे हैं। इतने मूर्ख होने के बाद भी हम तुर्रा यह रखते हैं कि हम भी कुछ हैं। हमारी दुर्बुद्धि का यह हाल है कि निरंतर अपना पतन करते हुए काल, कर्म, गुण, स्वभाव इत्यादि के आधीन होकर निरंतर दुःख भोगते हुए भी हम न तो इस अहंकार का त्याग कर पाते हैं और न महापुरुषों के बताने पर स्वयं को अहंकारी मान पाते हैं।
केवल स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमान मानकर अब भी धोखे में जिये जा रहे हैं। लेकिन अगर हमें अपने कल्याण की ज़रा भी चिंता है तो हमें बार-बार इस चीज़ पर विचार करना चाहिए कि आखिर हमें किस बात का अहंकार है ? क्या हमारे पास अहंकार के योग्य वाकई कुछ सामान है ?
अगर हम गंभीरतापूर्वक विचार करें, सत्य को हृदय से स्वीकार करें तो यही पायेंगे कि हमारे पास अहंकार करने के लायक कुछ भी नहीं है। तन, यौवन, धन जिन-जिन चीजों का हम अहंकार करते हैं ये तो सब चार दिन के हैं। इसीलिए #जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज_स्वरचित_ग्रन्थ_राधा_गोविंद_गीत में कहते हैं :
बड़े बड़े आये गये गोविंद राधे,
तन धन आदि अभिमान मिटा दे।
अरे इस नश्वर जगत में बड़े बड़े अहंकारी आये लेकिन तन, धन इत्यादि सबकुछ छोड़कर काल के गाल में समा गए फ़िर क्यों अहंकार करते हो ? तुम किस खेत की मूली हो ? तुम्हारे पास है ही क्या ? तुम न तो धन में कुबेर हो, न मान में गणेश के समान हो, न वैभव में इंद्र की बराबरी कर सकते हो, न कामदेव सरीखा रूप है, न सरस्वती बृहस्पति जैसी बुद्धि है, न काल के समान बल है, न ब्रह्मा जैसी प्रभुता है फिर कैसे अभिमान ? अरे इस मृत्यु लोक में ही तुमसे आगे एक से बढ़कर एक कई लोग हैं जिनको देखकर तुम पिचक जाते हो फिर इन तुच्छ चीज़ों के गुमान में क्यों फूले फिरते हो ? ये सारी चीज़ें कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाने वाली हैं, वृद्धावस्था आने पर ही व्यक्ति जर्जर होकर दूसरों के आधीन हो जाता है, दिन रात परिवारी जनों की ही प्रताड़ना सहता रहता है। उस समय रूप, बल, बुद्धि इत्यादि सभी समाप्त हो जाते हैं। लेकिन मनुष्य इन सब बातों के विषय में कभी कुछ विचार ही नहीं करता। अरे और तो और सारी चीज़ों के अहंकार का जो आधार है हमारा शरीर वही एक सैकंड में समाप्त हो सकता है। इसीलिए कबीरदास जी ने कहा -
आखिर ये तन खाक मिलेगा, काहे फिरत मगरूरी में,
कहत कबीर सुनो भई साधो, साहिब मिले सबूरी में।
जैसे रुई में अगर आग लग जाय तो वह कितनी देर स्थिर रह सकती है, बस ऐसा ही अस्तित्व इस निरर्थक अभिमान का है -
मैं मैं बड़ी बलाई है, सके निकल तो भाग,
कहे कबीर कब लग रहे, रुई लपेटी आग।
तो आत्मकल्याण के लिए इस सत्यता पर विचार करके हमें अहंकार का त्याग करके दैन्य भाव को धारण करना है। भगवान को केवल दीनता पसंद है -
ईश्वरस्याभिमानद्वेषित्वात् दैन्यप्रियत्वात् च।
(नारद भक्ति सूत्र)
उन्होंने यह मानव शरीर हमें केवल ईश्वर को प्राप्त करने के लिये दिया है इसलिए हमें यह गंभीरता से समझना है -
ईश्वर ने यह तन दिया, करने को दो काम,
तन धन से सेवा करें, मन से सुमरैं राम।
अहंकार करने का शौक ही है तो प्रभु की भक्ति करते हुए केवल यह अहंकार हो कि -
अस अभिमान जाइ जनि भोरे,
मैं सेवक रघुपति पति मोरे ।
(रामचरित मानस)
सदैव यह अभिमान रहे कि वे अनंतकोटि ब्रह्माण्ड नायक भगवान मेरे स्वामी हैं और मैं उनका दास हूँ। केवल ऐसे वंदनीय अभिमान से हमारा कल्याण संभव है बाकी सभी अहंकार पतनकारक हैं।
ईश्वर चिन्तन होता नहीं है, करना पड़ता है। जो कुछ होता है वह पहले का किया हुआ चिन्तन ही हो रहा है। जगत् का चिन्तन इसलिये भी होता है क्योंकि बुद्धि में बैठा हुआ है कि जगत् में सुख है। अब अगर भगवत् चिन्तन करना चाहते हो तो पहले बुद्धि में बैठाना पड़ेगा कि जगत् में सुख नहीं है,भगवान् में सुख है,तब भगवान् के चिन्तन की भूख लगेगी।
साथ में यह भी निश्चय हो जाय कि मृत्यु कभी भी हो सकती है। ऐसा निश्चय होने से चिन्तन का अभ्यास तेज हो जायेगा।
तुम व्यर्थ का चिन्तन करके समय नष्ट करते हो।संसारी काम कोई भी हो। मान लो, लड़का-लड़की की शादी करना है। जब प्रसंग आये, तब सोच कर तय कर डालो। शेष समय में सोचना बंद। जब तय हो गयी, कर डालो। उसको निरन्तर सोचते रहना ही खतरनाक है। निरन्तर सोचना तो ईश्वरीय होना चाहिये। समय आने पर संसार का काम तो प्रारब्ध जबरदस्ती करा लेगा।तुम नहीं करना चाहोगे,तब भी।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
"गुरु" दो अक्षर के इस छोटे से शब्द में सम्पूर्ण आध्यात्मिक जगत समाहित है। गुरु तत्त्व की शरणागति के बिना आध्यात्मिक जगत में किसी जीव का प्रवेश ही नहीं हो सकता। गुरु की महिमा यद्यपि समस्त वेदों-शास्त्रों में गाई गई है लेकिन फिर भी गुरु का पूर्णरूपेण गुणगान करने में सभी असमर्थ हैं। और हों भी क्यों न? क्योंकि वेद तो भगवान की ही महिमा का गान करते समय मौन हो जाते हैं, 'नेति-नेति' कहकर अपनी असमर्थता सिद्ध करते हैं फिर वह 'गुरु तत्त्व ' जिसके पीछे-पीछे भगवान स्वयं चलते हैं उनकी चरण-रज से पावन बनने के लिए -
अनुब्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः
(भागवत)
ऐसे गुरु तत्त्व की महिमा का बखान करने में भला कौन समर्थ हो सकता है?
इसलिए कबीरदास जी ने कहा :
सब धरती कागज करूँ, लेखनी सब वनराय,
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरुगुण लिखा न जाय।
अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी को कागज बना लिया जाए और विश्व के सभी वृक्षों की कलम बना ली जाए, सातों समुद्रों के बराबर स्याही हो तब भी गुरु के गुणों को लिखना संभव नहीं है क्योंकि गुरु की महिमा अनंत है, अपरंपार है इसलिए स्वयं शेषनाग भी अपने सहस्त्रों मुखों से अनंतकाल तक भी गुरु महिमा गाते रहें तो भी पार नहीं पा सकते।
अब प्रश्न उठता है आखिर क्यों गुरु का इतना अधिक माहात्म्य बताया गया है? क्योंकि बिना गुरु की सहायता के कोई भी जीव कभी अपने परम चरम लक्ष्य आनंद तक अर्थात् भगवान तक नहीं पहुँच सकता। ये ईश्वरीय जगत का अकाट्य कानून है।
जीवात्मा को परमात्मा से मिलाने वाली बीच की कड़ी का ही नाम महात्मा या गुरु है।
गुरु है महात्मा गोविंद राधे,
आत्मा को परमात्मा ते मिला दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
गुरु शब्द का अर्थ ही यह है -
गुशब्दस्त्वन्धकारः स्यात् रुशब्दस्तन्निरोधकः।
अन्धकारनिरोधित्वात् गुरुरित्यभिधीयते ।।
(वेद)
अर्थात् 'गु' का अर्थ है माया रूपी अंधकार और 'रु' का अर्थ है उस अंधकार को मिटाने वाला, समाप्त करने वाला। तो माया रूपी अंधकार को मिटाकर जो जीव को ईश्वर रूपी प्रकाश से मिला दे वही गुरु तत्व है और केवल श्रोतिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष ही ऐसा करने में समर्थ है, इसीलिए वेद में कहा गया -
परीक्ष्य लोकान्‌ कर्मचितान्‌ ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्‌ समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्‌ ।।
अर्थात् भगवान का ज्ञान प्राप्त करने के लिए,भगवान को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम किसी वास्तविक महापुरुष (श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ) की अर्थात् सद्गुरु की शरणागति अनिवार्य है। आध्यात्मिक जगत की प्रारंभिक कक्षा से लेकर अंतिम कक्षा तक का ज्ञान कराने में, भगवान से मिलाने में केवल गुरु ही समर्थ है। जीव को तत्वज्ञान कराना, साधना का स्वरूप समझाना, बीच-बीच में शरणागति के अनुसार उसके कुसंस्कारों से लड़ना, अंतःकरण की पूर्ण शुद्धि पर दिव्य प्रेम का दान करना इत्यादि सारे कार्य गुरु द्वारा ही सम्पादित होते हैं। इसलिए हमारे परम पूज्य गुरुवर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं -
प्रेम सम साध्य नहीं गोविंद राधे,
सद्गुरु सम न हितैषी बता दे।
(राधा गोविंद गीत)
ऐसे परम हितैषी सदगुरु की शरणागति करना ही जीवन का सार है।
जीव का असली स्वार्थ (भगवत्प्राप्ति) गुरु कृपा से ही सिद्ध होता है, वही हमारी अनादिकालीन बिगड़ी बात बनाने में समर्थ है इसलिए यहाँ तक कहा गया -
गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूँ पाँय,
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।
(कबीरदास जी)
इसी एक दोहे से गुरु की महिमा को हृदयंगम किया जा सकता है। सद्गुरु का स्थान भगवान से भी बड़ा है क्योंकि गुरु रूपी मार्ग के बिना भगवान रूपी मंजिल तक पहुँचना त्रिकाल में भी असंभव है।
इसीलिए श्री महाराज जी कहते हैं -
गुरु चरण कमल बलिहार,
गुरु पर तन मन धन वार,
गुरु चरण-धूलि सिर धार,
गुरु महिमा अपरंपार।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...