Wednesday, April 22, 2020

संसार में अधिकांश लड़ाई-झगड़ो का, अशांति का कारण क्रोध है। यद्यपि यह माया का एक सूक्ष्म विकार है लेकिन जब यह किसी के भीतर प्रकट होता है तो फिर सामने हम उस व्यक्ति के नहीं उसके रूप में साक्षात क्रोध के ही दर्शन करते हैं। कई लोग अपने जीवन में बात-बात पर क्रोध का प्रदर्शन करके स्वयं को बड़ा ताकतवर समझते हैं लेकिन वास्तव में यह क्रोध मनुष्य की ताकत नहीं, एक कमजोरी है, बहुत बड़ा दुर्गुण हैं। इसलिए किसी भी प्रकार हमें इसे नियंत्रण में रखने का प्रयास करना चाहिए।
इसे नियंत्रित करने के लिए हमें यह बात गंभीरता से समझनी होगी कि इससे सबसे अधिक नुकसान स्वयं को ही होता है। इसे कालकूट विष से भी अधिक घातक कहा गया है -
कालकूट अरु क्रोध में, बड़ौ अंतरो आहि,
क्रोध स्व आश्रय को दहत, विष नहिं स्वाश्रय दाहि।
अर्थात् विष तो केवल पान करने वाले व्यक्ति को नुकसान पहुँचाता है लेकिन जिस पात्र में वह रखा होता है उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचाता। किन्तु क्रोध रूपी विष तो स्वाश्रय को अर्थात् क्रोध करने वाले व्यक्ति को ही जला देता है। जिस पर हम क्रोध करते हैं उसे तो कष्ट होता ही है, हम स्वयं भी उस क्रोधाग्नि में जलते रहते हैं, अशांत हो जाते हैं। इसीलिए तुलसीदास जी ने कहा -
क्रोध पित्त नित छाती जारा
क्रोध रूपी पित्त रोग निरंतर हमारे हृदय को भी जलाता रहता है। इसे सबसे बड़ी अग्नि कहा गया है -
आन अग्नि नहिं क्रोध सम
क्रोध से समस्यायें हल होने के बजाय और अधिक बढ़ जाती हैं। जब हम क्रोधित होते हैं तो सामने वाला भी उत्तेजित होकर गाली गलौज करने लगता है। इसीलिए कबीरदास जी ने कहा -
आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक ।
कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक ॥
अगर कोई और भी हम पर क्रोध कर रहा हो तो -
मौनिन: कलह नास्ति
मौन हो जाने पर कलह शांत हो जाता है। क्रोध करने से मानसिक अशांति तो बढ़ती ही है साथ ही यह हमारे शरीर को भी रोगग्रस्त कर देता है और हम मृत्यु के और निकट पहुँच जाते हैं । रक्तचाप, हृदयाघात इत्यादि जैसे प्राणघातक रोगों की चपेट में आ जाते हैं इसलिए इसे भी काल कहा गया -
क्रोधो वैवस्वतो राजा
यह क्रोध साक्षात यमराज के समान है। क्रोधित होने पर व्यक्ति की बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है और सही निर्णय न ले पाने के कारण अंततः उसका पतन हो जाता है इसलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा -
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।
(गीता : 2-63)
क्रोधित व्यक्ति अन्य सभी की घृणा का भी पात्र बन जाता है। हम ऐसे व्यक्ति का चेहरा देखना भी पसंद नहीं करते। कई स्थितियों में क्रोध करने वाला व्यक्ति क्रोध करने के पश्चात पाश्चाताप की ज्वाला में भी जलता रहता है। तात्पर्य यही है कि क्रोधी और मूर्ख दोनों समान माने गए हैं। क्योंकि क्रोध से व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आध्यात्मिक हर प्रकार का ह्रास होता है। ऐसे हानिकारक क्रोध का आचरण करने वाला बड़े से बड़ा विद्वान भी मूर्ख ही है।
इससे बचने के लिए हमें बारम्बार इन परिणामों पर विचार करते हुए क्रोध पर संयम रखना चाहिए। हमें स्वयं को सदा वही आचरण करने के लिए प्रेरित करना चाहिए जिसकी अपेक्षा हम अपने लिए औरों से करते हैं। क्षमाशीलता, सहनशीलता इत्यादि सद्गुण हैं, कायरता नहीं। इसलिए इन्हें धारण करना चाहिए -
अक्रोधन: क्रोधनेभ्य: विशिष्ट:
(महाभारत)
अर्थात् क्रोध न करने वाला क्रोधी व्यक्ति से श्रेष्ठतर होता है। मनुष्य से गलती होना स्वाभाविक है। कोई भी मनुष्य संसार में पूर्ण नहीं होता। गलतियाँ हमसे भी होती हैं यह सोचकर उदारवृत्ति को अपनाना चाहिए। क्षमा कर देना भूषण है, महानता है। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य को धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। जहाँ आवश्यकतानुसार क्रोध करना भी पड़े तो केवल ऊपर से क्रोध का अभिनय मात्र हो, उसे हम भीतर न ले जायें। सबके अंदर अपने इष्टदेव को देखने का भी अभ्यास करें। अगर क्रोध आये भी तो सदा हमें उस क्रोध पर क्रोध करना चाहिए कि यह दुश्मन क्यों आ गया, मैं इसे स्वयं पर हावी नहीं होने दूँगा। किसी अन्य पर क्रोध न करें -
क्रोधे क्रोध: कथं नु ते
इस प्रकार निरंतर अभ्यास से हम इस पर नियंत्रण कर सकते हैं। पूर्णरूपेण तो ये दोष भगवत्प्राप्ति पर ही समाप्त होते हैं।
मनुष्य की सारी आयु सारहीन चीजों के अहंकार में ही व्यतीत हो जाती है और इसी निरर्थक अहंकार के कारण ही अनादिकाल से आजतक हम न किसी भगवान के अवतार के आगे शरणागत हो सके न महापुरुषों के। अनंत जन्मों में अनंत बार भगवान ने स्वयं भी अवतार लेकर एवं अनेकानेक महापुरुषों को भेजकर हमारे कल्याण के लिए प्रयत्न किया लेकिन इसी मिथ्या अहंकार वश हमने सबको ठुकरा दिया और परिणामस्वरूप आज भी उसी अहंकार के नशे में डूबे हुए माया के थपेड़े सहते जा रहे हैं। इतने मूर्ख होने के बाद भी हम तुर्रा यह रखते हैं कि हम भी कुछ हैं। हमारी दुर्बुद्धि का यह हाल है कि निरंतर अपना पतन करते हुए काल, कर्म, गुण, स्वभाव इत्यादि के आधीन होकर निरंतर दुःख भोगते हुए भी हम न तो इस अहंकार का त्याग कर पाते हैं और न महापुरुषों के बताने पर स्वयं को अहंकारी मान पाते हैं।
केवल स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमान मानकर अब भी धोखे में जिये जा रहे हैं। लेकिन अगर हमें अपने कल्याण की ज़रा भी चिंता है तो हमें बार-बार इस चीज़ पर विचार करना चाहिए कि आखिर हमें किस बात का अहंकार है ? क्या हमारे पास अहंकार के योग्य वाकई कुछ सामान है ?
अगर हम गंभीरतापूर्वक विचार करें, सत्य को हृदय से स्वीकार करें तो यही पायेंगे कि हमारे पास अहंकार करने के लायक कुछ भी नहीं है। तन, यौवन, धन जिन-जिन चीजों का हम अहंकार करते हैं ये तो सब चार दिन के हैं। इसीलिए #जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज_स्वरचित_ग्रन्थ_राधा_गोविंद_गीत में कहते हैं :
बड़े बड़े आये गये गोविंद राधे,
तन धन आदि अभिमान मिटा दे।
अरे इस नश्वर जगत में बड़े बड़े अहंकारी आये लेकिन तन, धन इत्यादि सबकुछ छोड़कर काल के गाल में समा गए फ़िर क्यों अहंकार करते हो ? तुम किस खेत की मूली हो ? तुम्हारे पास है ही क्या ? तुम न तो धन में कुबेर हो, न मान में गणेश के समान हो, न वैभव में इंद्र की बराबरी कर सकते हो, न कामदेव सरीखा रूप है, न सरस्वती बृहस्पति जैसी बुद्धि है, न काल के समान बल है, न ब्रह्मा जैसी प्रभुता है फिर कैसे अभिमान ? अरे इस मृत्यु लोक में ही तुमसे आगे एक से बढ़कर एक कई लोग हैं जिनको देखकर तुम पिचक जाते हो फिर इन तुच्छ चीज़ों के गुमान में क्यों फूले फिरते हो ? ये सारी चीज़ें कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाने वाली हैं, वृद्धावस्था आने पर ही व्यक्ति जर्जर होकर दूसरों के आधीन हो जाता है, दिन रात परिवारी जनों की ही प्रताड़ना सहता रहता है। उस समय रूप, बल, बुद्धि इत्यादि सभी समाप्त हो जाते हैं। लेकिन मनुष्य इन सब बातों के विषय में कभी कुछ विचार ही नहीं करता। अरे और तो और सारी चीज़ों के अहंकार का जो आधार है हमारा शरीर वही एक सैकंड में समाप्त हो सकता है। इसीलिए कबीरदास जी ने कहा -
आखिर ये तन खाक मिलेगा, काहे फिरत मगरूरी में,
कहत कबीर सुनो भई साधो, साहिब मिले सबूरी में।
जैसे रुई में अगर आग लग जाय तो वह कितनी देर स्थिर रह सकती है, बस ऐसा ही अस्तित्व इस निरर्थक अभिमान का है -
मैं मैं बड़ी बलाई है, सके निकल तो भाग,
कहे कबीर कब लग रहे, रुई लपेटी आग।
तो आत्मकल्याण के लिए इस सत्यता पर विचार करके हमें अहंकार का त्याग करके दैन्य भाव को धारण करना है। भगवान को केवल दीनता पसंद है -
ईश्वरस्याभिमानद्वेषित्वात् दैन्यप्रियत्वात् च।
(नारद भक्ति सूत्र)
उन्होंने यह मानव शरीर हमें केवल ईश्वर को प्राप्त करने के लिये दिया है इसलिए हमें यह गंभीरता से समझना है -
ईश्वर ने यह तन दिया, करने को दो काम,
तन धन से सेवा करें, मन से सुमरैं राम।
अहंकार करने का शौक ही है तो प्रभु की भक्ति करते हुए केवल यह अहंकार हो कि -
अस अभिमान जाइ जनि भोरे,
मैं सेवक रघुपति पति मोरे ।
(रामचरित मानस)
सदैव यह अभिमान रहे कि वे अनंतकोटि ब्रह्माण्ड नायक भगवान मेरे स्वामी हैं और मैं उनका दास हूँ। केवल ऐसे वंदनीय अभिमान से हमारा कल्याण संभव है बाकी सभी अहंकार पतनकारक हैं।
ईश्वर चिन्तन होता नहीं है, करना पड़ता है। जो कुछ होता है वह पहले का किया हुआ चिन्तन ही हो रहा है। जगत् का चिन्तन इसलिये भी होता है क्योंकि बुद्धि में बैठा हुआ है कि जगत् में सुख है। अब अगर भगवत् चिन्तन करना चाहते हो तो पहले बुद्धि में बैठाना पड़ेगा कि जगत् में सुख नहीं है,भगवान् में सुख है,तब भगवान् के चिन्तन की भूख लगेगी।
साथ में यह भी निश्चय हो जाय कि मृत्यु कभी भी हो सकती है। ऐसा निश्चय होने से चिन्तन का अभ्यास तेज हो जायेगा।
तुम व्यर्थ का चिन्तन करके समय नष्ट करते हो।संसारी काम कोई भी हो। मान लो, लड़का-लड़की की शादी करना है। जब प्रसंग आये, तब सोच कर तय कर डालो। शेष समय में सोचना बंद। जब तय हो गयी, कर डालो। उसको निरन्तर सोचते रहना ही खतरनाक है। निरन्तर सोचना तो ईश्वरीय होना चाहिये। समय आने पर संसार का काम तो प्रारब्ध जबरदस्ती करा लेगा।तुम नहीं करना चाहोगे,तब भी।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
"गुरु" दो अक्षर के इस छोटे से शब्द में सम्पूर्ण आध्यात्मिक जगत समाहित है। गुरु तत्त्व की शरणागति के बिना आध्यात्मिक जगत में किसी जीव का प्रवेश ही नहीं हो सकता। गुरु की महिमा यद्यपि समस्त वेदों-शास्त्रों में गाई गई है लेकिन फिर भी गुरु का पूर्णरूपेण गुणगान करने में सभी असमर्थ हैं। और हों भी क्यों न? क्योंकि वेद तो भगवान की ही महिमा का गान करते समय मौन हो जाते हैं, 'नेति-नेति' कहकर अपनी असमर्थता सिद्ध करते हैं फिर वह 'गुरु तत्त्व ' जिसके पीछे-पीछे भगवान स्वयं चलते हैं उनकी चरण-रज से पावन बनने के लिए -
अनुब्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः
(भागवत)
ऐसे गुरु तत्त्व की महिमा का बखान करने में भला कौन समर्थ हो सकता है?
इसलिए कबीरदास जी ने कहा :
सब धरती कागज करूँ, लेखनी सब वनराय,
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरुगुण लिखा न जाय।
अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी को कागज बना लिया जाए और विश्व के सभी वृक्षों की कलम बना ली जाए, सातों समुद्रों के बराबर स्याही हो तब भी गुरु के गुणों को लिखना संभव नहीं है क्योंकि गुरु की महिमा अनंत है, अपरंपार है इसलिए स्वयं शेषनाग भी अपने सहस्त्रों मुखों से अनंतकाल तक भी गुरु महिमा गाते रहें तो भी पार नहीं पा सकते।
अब प्रश्न उठता है आखिर क्यों गुरु का इतना अधिक माहात्म्य बताया गया है? क्योंकि बिना गुरु की सहायता के कोई भी जीव कभी अपने परम चरम लक्ष्य आनंद तक अर्थात् भगवान तक नहीं पहुँच सकता। ये ईश्वरीय जगत का अकाट्य कानून है।
जीवात्मा को परमात्मा से मिलाने वाली बीच की कड़ी का ही नाम महात्मा या गुरु है।
गुरु है महात्मा गोविंद राधे,
आत्मा को परमात्मा ते मिला दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
गुरु शब्द का अर्थ ही यह है -
गुशब्दस्त्वन्धकारः स्यात् रुशब्दस्तन्निरोधकः।
अन्धकारनिरोधित्वात् गुरुरित्यभिधीयते ।।
(वेद)
अर्थात् 'गु' का अर्थ है माया रूपी अंधकार और 'रु' का अर्थ है उस अंधकार को मिटाने वाला, समाप्त करने वाला। तो माया रूपी अंधकार को मिटाकर जो जीव को ईश्वर रूपी प्रकाश से मिला दे वही गुरु तत्व है और केवल श्रोतिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष ही ऐसा करने में समर्थ है, इसीलिए वेद में कहा गया -
परीक्ष्य लोकान्‌ कर्मचितान्‌ ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्‌ समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्‌ ।।
अर्थात् भगवान का ज्ञान प्राप्त करने के लिए,भगवान को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम किसी वास्तविक महापुरुष (श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ) की अर्थात् सद्गुरु की शरणागति अनिवार्य है। आध्यात्मिक जगत की प्रारंभिक कक्षा से लेकर अंतिम कक्षा तक का ज्ञान कराने में, भगवान से मिलाने में केवल गुरु ही समर्थ है। जीव को तत्वज्ञान कराना, साधना का स्वरूप समझाना, बीच-बीच में शरणागति के अनुसार उसके कुसंस्कारों से लड़ना, अंतःकरण की पूर्ण शुद्धि पर दिव्य प्रेम का दान करना इत्यादि सारे कार्य गुरु द्वारा ही सम्पादित होते हैं। इसलिए हमारे परम पूज्य गुरुवर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं -
प्रेम सम साध्य नहीं गोविंद राधे,
सद्गुरु सम न हितैषी बता दे।
(राधा गोविंद गीत)
ऐसे परम हितैषी सदगुरु की शरणागति करना ही जीवन का सार है।
जीव का असली स्वार्थ (भगवत्प्राप्ति) गुरु कृपा से ही सिद्ध होता है, वही हमारी अनादिकालीन बिगड़ी बात बनाने में समर्थ है इसलिए यहाँ तक कहा गया -
गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूँ पाँय,
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।
(कबीरदास जी)
इसी एक दोहे से गुरु की महिमा को हृदयंगम किया जा सकता है। सद्गुरु का स्थान भगवान से भी बड़ा है क्योंकि गुरु रूपी मार्ग के बिना भगवान रूपी मंजिल तक पहुँचना त्रिकाल में भी असंभव है।
इसीलिए श्री महाराज जी कहते हैं -
गुरु चरण कमल बलिहार,
गुरु पर तन मन धन वार,
गुरु चरण-धूलि सिर धार,
गुरु महिमा अपरंपार।
हमारा पूरा जीवन कितना खोखला है, हम स्वयं अनंत दोषों के भंडार हैं लेकिन फिर भी हमारा पूरा जीवन दूसरों के दोषदर्शन में यानि उनके अवगुण देखने में, कथन करने इत्यादि में ही व्यतीत हो जाता है। हमें गंभीरतापूर्वक इस विषय में विचार करना चाहिए कि दूसरों के दोष देखने या उनकी निंदा इत्यादि करने में हमारा कोई लाभ नहीं है अपितु हानि ही हानि है। इसलिए ऐसे निरर्थक कार्यों में प्रवृत्त होना समझदारी नहीं बल्कि हमारी नासमझी है। मनुष्य को सदैव कल्याणप्रद कार्यों में ही प्रवृत्त होना चाहिए। परदोषदर्शन घोर कुसंग है जिससे हमारा अंतःकरण और मलिन हो जाता है इसलिए यह सर्वथा त्याज्य है।
संसार में कोई भी समझदार मनुष्य ऐसे काजल का प्रयोग नहीं करता जो उसकी आँख को ही नुकसान पहुँचाए -
वह अंजन कैसा गोविंद राधे,
आँख ही जाते फूटे बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
इसी प्रकार जिस परदोषषदर्शन रूपी कुसंग से हमारी ही निरंतर हानि हो, ऐसे कार्य से सदैव परहेज करना चाहिए अर्थात् बचना चाहिए। हमारे शास्त्रों में यहाँ तक कहा गया -
परस्य निंदां पैशुन्यम् धिक्कारं च करोति यः।
तत्कृतं पातकं प्राप्य स्वपुण्यं प्रददाति स: ।।
(पद्म-पुराण)
अर्थात् जो व्यक्ति दूसरे की निंदा चुगली इत्यादि जैसे कार्य करता है तो उसके सारे पुण्य उस व्यक्ति के पास चले जाते हैं जिसकी वह बुराई करता है और उस व्यक्ति के सारे पाप बुराई करने वाले के पास आ जाते हैं। भला इससे अधिक स्वयं की हानि और क्या हो सकती है।
वास्तव में परदोष देखना स्वयं के ही सदोष होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। इसलिए जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज स्वरचित ग्रंथ राधा गोविंद-गीत में कहते हैं -
परदोष जो भी देखे गोविंद राधे।
वह है सदोष प्रमाण बता दे।।
क्योंकि यह हम पर निर्भर करता है कि हम क्या देखना चाहते हैं। जिस मनुष्य को सदैव दूसरों के अवगुण देखने में ही आनंद आता है उसने ऐसा ही अपने स्वभाव को बना लिया है, आत्मकल्याण पर उसका ध्यान ही नहीं है। ऐसा मनुष्य फिर सदा सर्वत्र दोष ही दोष देखता है, परदोष चिंतन में ही अपना अमूल्य समय निरर्थक गँवा देता है -
दोषदर्शी को तो गोविंद राधे,
सर्वत्र दोष ही दीखे बता दे।
(राधा गोविंद गीत)
लेकिन अगर कोई व्यक्ति नेक दिल इंसान है, उदारमना व्यक्ति है तो वह दूसरों के अवगुणों को भी गुणों के रूप में देखता है -
गुणदर्शी को तो गोविंद राधे,
सर्वत्र गुण ही दीखे बता दे।
(राधा गोविंद गीत)
इस पतनकारक कुसंग से बचने के लिए सदैव इसकी हानियों पर विचार करना चाहिए। यह दोष मनुष्य के मिथ्याभिमान को बढ़ा देता है, क्योंकि दूसरे में अवगुण देखने से पूर्व स्वयं में गुणवान होने की, दोषरहित होने की भावना उत्पन्न होती है कि अमुक व्यक्ति बुरा है, उसमें यह-यह दोष है लेकिन मैं तो बहुत अच्छा हूँ, मुझमें तो कोई दोष नहीं है। स्वयं में यह दोषराहित्य की भावना ही हमारे अभिमान को निरंतर पुष्ट करती रहती है और यही अहंकार व्यक्ति का पतन कर देता है। वास्तव में दूसरों के दोष चिंतन करते हुए धीरे-धीरे स्वयं की बुद्धि भी दोषमय हो जाती है और उन्हीं सदोष विषयों में मनुष्य की प्रवृत्ति होने लगती है।
परदोष देखो जनि गोविंद राधे ।
यह दोष मन को सदोष बना दे।।
( राधा गोविंद गीत)
फिर त्रिगुण के आधीन होने के कारण जब सारा संसार ही दोषयुक्त है तो आप कहाँ तक दोषचिंतन करेंगे। और सबसे बड़ी बात जब हम स्वयं भी माया के आधीन हैं, त्रिगुण से युक्त हैं, अनंत दोषों की खान हैं तो दूसरे में दोष देखने का हमें अधिकार ही क्या है। और न हम अन्तर्यामी हैं कि किसी भी व्यक्ति के बारे में कोई सही निर्णय दे सकें।
इसीलिए महापुरुषों ने कहा है कि दोष देखने का अगर शौक ही है, स्वभाव ही है तो सदैव अपने दोषों को देखो, स्वदोषदर्शी बनो ताकि तुम्हारा कल्याण हो -
जाने ते छीजहिं कछु पापी
तुलसीदास जी कहते हैं दोष जान लेने पर कुछ-कुछ बचाव हो जाता है क्योंकि वह जीव उनसे बचने का कुछ न कुछ प्रयत्न अवश्य करता है।
सभी शास्त्र कहते हैं प्रत्येक मायाबद्ध मनुष्य अनंत दोषों की खान है, ये दोष पूर्णरूपेण मायानिवृति पर ही समाप्त होते हैं इसलिए हमारे अपने ही दोष क्या कम हैं जो हम दूसरों के दोष देखें -
दोष देखना ही हो तो गोविंद राधे,
अपने अनंत दोष मन को दिखा दे।
(राधा गोविंद गीत)
इसीलिए कबीरदास जी ने भी कहा -
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।
अस्तु! तात्पर्य यही है कि स्वयं के अंदर झाँकने से, अपने दोष टटोलने से ही हमारा सुधार होता है और परदोष दर्शन से पतन होता है इसलिए मनुष्य को 'परदोषदर्शी नहीं स्वदोषदर्शी' बनना चाहिए।
मनुष्य के पास एक ऐसी शक्ति है जिसके आधार पर वह जैसा चाहे बन सकता है और जो प्राप्त करना चाहे प्राप्त कर सकता है। वह शक्ति है, चिंतन की शक्ति, जो संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। इस शक्ति का अवलम्ब लेकर चाहे तो मनुष्य सही चिंतन करके महापुरुष बन जाए अथवा गलत चिंतन करके राक्षस बन सकता है।
ये चिंतन करना मन का कार्य है। हमारा मन जैसा चिंतन करता है वैसी ही हमारी प्रतिक्रिया होती है, उसी के अनुसार हमारा कर्म होता है। चिंतन का ही ये परिणाम है कि मनुष्य आत्महत्या तक कर लेता है, दूसरे की हत्या भी कर देता है। जब किसी व्यक्ति का गलत चिंतन परिपक्व होकर अनियंत्रित हो जाता है तभी इस प्रकार के कार्य होते हैं। चिंतन का अर्थ है किसी भी विचार को बार-बार मन में लाना। अगर हमारे विचार गलत हैं और उनका निरन्तर चिंतन हम करते हैं तभी ये हत्या, आत्महत्या जैसे गलत कार्य भी होते हैं।
अगर ये चिंतन सही दिशा में हो, ईश्वरीय क्षेत्र में हो तो यही परम कल्याणकारी सत्चिंतन कहलाता है, जिससे मनुष्य भगवान को भी प्राप्त कर लेता है। तुलसीदास जी जैसे संतों ने इसी शक्ति के आधार पर भगवान को पाया है। जब तुलसीदास अत्यंत व्याकुल होकर पत्नी से मिलने के लिए छिपकर उसके मायके में पहुँचे तो उनकी पत्नी रत्नावती ने खिन्न होकर केवल एक स्वरचित दोहे के माध्यम से उनके प्रेम का तिरस्कार किया -
अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीत,
नेकु जो होती राम से, तो काहे भव भीत?
यह दोहा सुनते ही तुलसीदास का चिंतन परिवर्तित हो गया। उन्होंने विचार किया कि जिस पत्नी के लिए मैं इस प्रकार विरहातुर होकर यहाँ तक आया हूँ, वही इस प्रकार मेरा अपमान कर रही है। संत महात्मा ठीक कहते हैं, इस जगत में कोई अपना नहीं है, सब स्वार्थ के मीत हैं। अब तो मुझे श्री राम को ही पाना है और बस इसी विचार का बार बार चिंतन किया और इस सत्विचार के सत्चिंतन से ही उन्होंने राम को पा लिया। महापुरुष बन गए। इसीलिए वेदव्यास ने भी भागवत में कहा -
विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते
मामनुस्मरतश्चित्तम् मय्येवप्रविलीयते
(भागवत : 11-14-27)
श्री कृष्ण कहते हैं, विषयों का चिंतन करने से मन विषयों में फँस जाता है, विषयी हो जाता है और मेरा स्मरण करने से मन मुझ में विलीन हो जाता है। मुझसे प्रेम करने लगता है।
अर्थात् भगवत्प्राप्ति की कुँजी भी यही चिंतन है और संसार की आसक्ति का कारण भी विषयों का चिंतन है।
अतएव इस शक्ति का महत्त्व समझकर हमें गुरु की बुद्धि में अपनी बुद्धि को जोड़कर उस सद्बुद्धि से मन को संचालित करते हुए सत्चिंतन का आश्रय लेकर परमार्थ पथ पर आगे बढ़ना होगा। तब धीरे धीरे इसी सत्चिंतन की परिपक्वता से एक दिन अपने परम चरम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...