Wednesday, April 22, 2020

प्रिय भारतवासियों...भारत माता की जय ।
वेदों में भगवान को ही प्रकाशस्वरूप बताया गया है -
'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णम् तमस:परस्तात्'
आज सम्पूर्ण मानव जाति जिस 'कोरोना रूपी अंधकार' से भयभीत है उस अंधकार की समाप्ति के लिए हम सभी 'ईश्वर रूपी प्रकाश' की शरण ग्रहण करें । आज का दीप प्रज्ज्वलन कार्यक्रम उसी महाप्रकाश की ओर संकेत कर रहा है कि हम सब एकजुट होकर अपने भीतर व्याप्त उस महाप्रकाशस्वरूप ईश्वर का अनुभव करके उस पर विश्वास रखकर मिलकर उससे ये प्रार्थना करें -
'तमसो मा ज्योतिर्गमय'
हे नाथ! आज इस महासंकट से लड़ने में आप ही हमारी सहायता कीजिये और ऐसी कृपा कीजिये कि इस विकट समय से शिक्षा लेकर अपना शेष समय हम आपकी भक्ति करके सार्थक कर सकें। हम अज्ञान रूपी अंधकार को भी जीत कर आपको प्राप्त कर सकें।
पुरुषार्थ के साथ ही उस महाप्रकाश रूपी भगवान की कृपा से ही हम अवश्य विजयी होंगें यही दृढ़ विश्वास बनाये रखें। उसी महाप्रकाश की किरणें होने से हम सभी एक हैं हमेशा एक दूसरे के साथ हैं ।
हमारी सेवा में दिन-रात लगे हुए देशवासियों का हृदय से बहुत बहुत आभार व नमन।
आप सभी सुरक्षित रहें , स्वस्थ रहें इसी शुभकामना के साथ-
आपकी दीदी:
#सुश्री_श्रीधरी_दीदी_प्रचारिका_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
समस्त भगवत्प्रेमियों को जय श्री राधे !
अनंतानंत जन्मों से हम अनवरत भगवान को खोज रहे हैं लेकिन उसे प्राप्त नहीं कर सके। इसका एकमात्र कारण है अविश्वास। हर जन्म में हमें संतों ने समझाया कि ईश्वर तो तुम्हारे हृदय में ही बसे हैं , तुम्हारे पास ही हैं , तुम बाहर कहाँ उसे ढूंढते फिर रहे हो ? लेकिन हमने कभी संतवाणी, वेदवाणी पर विश्वास नहीं किया । सारे संसार में आनंद ढूंढते रहे लेकिन हृदय में स्थित आनंदसिन्धु की ओर कभी देखा ही नहीं । इसीलिए तो कबीरदास जी ने हँसते हुए कहा -
धोबिया जल बिच मरत पियासा ।
जल बिच ठाढ़ पियत नहिं मूरख,अच्छा जल है खासा।।
हमारी स्थिति उस धोबी की भाँति है जो जल के बीच में खड़ा होकर भी प्यासा होने की बात करता है , उस जल को ग्रहण नहीं करता ।
हमें उस ईश्वर को प्राप्त करने के लिए कुछ और नहीं करना है केवल हृदय में विराजित ईश्वर का अनुभव करना है , इसी के लिए साधना बताई जाती है।
बाहर ढूंढे क्यों मना,उर में है तेरा सजना।
तेरे मध्य बैठा सजना, मानो यह श्रुतिवचना ।
हमारे परम पूज्य गुरुवर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं तुम्हारे प्रियतम, तुम्हारे जीवन सर्वस्व तुम्हारे ही भीतर बैठे हैं इस वेदवाणी को शत-प्रतिशत मान लो तो तुम्हारा काम बन जाये ।
हम सभी गुरु अनुकम्पा से अज्ञान तिमिर को भगाकर हृदय सिंहासन पर विराजित प्रभु के दर्शन कर सकें इसी शुभकामना के साथ-
तत्त्व जिज्ञासु भक्तवृन्द ! सप्रेम राधे राधे ।
यद्यपि ये मानव देह हर प्रकार से निंदनीय है , क्षणभंगुर है लेकिन केवल पुरुषार्थ की शक्ति के कारण ही इसे वंदनीय कहा गया है । भक्ति रूपी पुरुषार्थ करके हम इसी मरणशील देह द्वारा अमरत्व को प्राप्त कर सकते हैं-
देह तो मरणशील गोविंद राधे ।
किन्तु दिव्य प्रेम अमरत्व दिला दे ।।
(राधा गोविंद गीत )
जैसे हीरे को काटने के लिए हीरे की ही आवश्यकता होती है इसी प्रकार इस क्षणभंगुर मानव देह से ही देह से मुक्ति ( संसार में आवागमन के चक्र से मुक्ति ) प्राप्त की जा सकती है । इसी नश्वर देह से ही अविनाशी हरि को प्राप्त किया जा सकता है ।
इसी कर्मप्रधानता के कारण ही इस मल मूत्र के पिटारे रूपी देह की याचना स्वर्ग के देवता भी करते हैं।
इस मनुष्य देह की सार्थकता केवल भगवद्भक्ति में ही है अन्यथा जीवन धारण तो वृक्ष भी करते हैं। हरि भक्ति रहित मनुष्य जीवन पशु तुल्य है -
कृष्ण भक्ति बिनु नर गोविंद राधे ।
कूकर शूकर सम हैं बता दे ।।
(राधा गोविंद गीत )
इसलिए इस अमूल्य देह का महत्त्व समझकर इसके एक-एक क्षण का सदुपयोग करने वाला ही विवेकी है।
भगवान् का कोई स्वरूप हो, किसी भी प्रकार से उपासना की जाय, लक्ष्य एक ही है- श्रीकृष्ण प्रेम। अज्ञानता के कारण प्रचलित विभिन्न वाद-विवादों का कितनी सरलता से समाधान करते हैं गुरुवर, समस्त शंकायें दूर हो जाती हैं । केवल श्री राधाकृष्ण निष्काम प्रेम की कामना शेष रह जाती है । दुर्गा जी, हनुमान जी, शंकर जी, सभी का सम्मान करते हुये, सबसे श्रीकृष्ण प्रेम की भिक्षा माँगना- यही उनका दिव्य संदेश है।
प्रिय साधकवृन्द ! सप्रेम राधे राधे ।
ये जगत एक रंगमंच है जहाँ प्रत्येक जीव को केवल अभिनय करने के लिए भेजा गया है , ये हमारा वास्तविक घर नहीं है ।इसे अपना वास्तविक घर मानने के कारण ही आसक्ति करके हमने अपने अनंतानंत जन्म व्यर्थ गँवा दिए । अगर हम अपना कल्याण चाहते हैं तो हमें यहाँ सर्वत्र अनासक्त भाव से केवल कर्त्तव्यपालन करते हुए रहना होगा ।इसी को स्पष्ट करते हुए श्री महाराज जी ' 'राधा गोविंद गीत 'में कहते हैं -
जग में रहो ऐसे गोविंद राधे ।
पद्म दल पै जल रहे ज्यों बता दे।।
जग में रहो ऐसे गोविंद राधे ।
नाटक में ज्यों कोई पात्र बता दे।।
जैसे कमल के पत्ते पर जल की बूँद रहती है 'पद्मपत्रमिवाम्भसा' और जैसे नाटक में कोई पात्र रहता है निर्लिप्त भाव से ठीक इसी प्रकार सर्वत्र राग द्वेष रहित होकर ही अनासक्त भाव से कर्म करते हुए मन को निरंतर हरि गुरु में ही लगाकर साधक को जीवन व्यतीत करना चाहिए ।
हम सभी एक योग्य कलाकार की भाँति इस जगत रूपी रंगमंच पर भलीभाँति अभिनय करते हुए शीघ्र ही अपने वास्तविक घर ( भगवद्धाम ) पहुँच सकें इसी शुभकामना के साथ-
सद्गुरु कृपाकांक्षी भक्तवृन्द !
जय श्री राधे !
इस अगाध भवसिंधु में डूबते हुए, अकुलाते हुए जीवों के लिए सद्गुरु ही एकमात्र आश्रय हैं । जो जीव सद्गुरु के चरण - कमल रूपी जहाज का आश्रय ले लेते हैं वे बड़ी ही आसानी से इस अथाह भवसागर को पार कर लेते हैं। कोई भी जीव सद्गुरु की अनंत कृपाओं की कभी थाह नहीं पा सकता और न ही उनके ऋण से कभी उऋण हो सकता है -
सारा विश्व दान करो गोविंद राधे।
तो भी गुरु ऋण ते ना उऋण करा दे ।। ( राधा गोविंद गीत )
गुरु की महिमा अपरंपार है , स्वयं भगवान भी गुरु की महिमा का गान करने में समर्थ नहीं हैं , वे स्वयं भी गुरु पदरज से पावन बनने के लिए सदा उनके पीछे पीछे चलते हैं - अनुब्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यंघृ रेणुभि : (भागवत )
जिस जीव ने गुरुआज्ञापालन रूपी सेवा करके गुरु को प्रसन्न कर लिया भगवान तो उससे अपने आप प्रसन्न हो जाते हैं -
गुरु जो प्रसन्न हो तो गोविंद राधे ।
हरि हों प्रसन्न बिनु भक्ति बता दे ।। ( राधा गोविंद गीत )
इसलिए समस्त वेद शास्त्र जीवों को गुरु भक्ति के लिए ही प्रेरित करते हैं, भगवद्भक्ति से भी श्रेष्ठ गुरुभक्ति को बताते हैं -
आराधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परं।
तस्मात्परतरं देवि ! तदीयानां समर्चनम् ।। ( पद्म पुराण )
सद्गुरु के विषय में ही समस्त वेद शास्त्र व स्वयं भगवान मौन हो जाते हैं फिर जिन्हें जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज जैसे सद्गुरु शिरोमणि प्राप्त हो जायें उन जीवों के सौभाग्य की सराहना शब्दों में नहीं हो सकती ।
जो अपार कृपा हम सभी पर हुई हमें उसका मूल्य समझकर , अपने सद्गुरु का महत्त्व समझकर प्रतिक्षण श्री महाराज जी का स्मरण करते हुए अश्रु बहाने का प्रयास करना चाहिए । सद्गुरु की कृपाओं का प्रतिक्षण चिंतन करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना ही सबसे बड़ी साधना है ।
हे जगदगुरूत्तम ! हम अधम जीवों पर ऐसी कृपा कीजिये कि सदा आपकी मंजुल मनोहर मूर्ति हमारे हृदय में बसी रहे और आपकी अनंत अहैतुकी कृपाओं का स्मरण करके अपने अश्रुओं से हम आपके श्री चरणों का प्रक्षालन करते रहें। इसी कृपा याचना के साथ-
समस्त भगवत्प्रेमीजनों को जय श्री राधे !
भक्तिमार्गीय साधक को भगवत्पथ पर तीव्र गति से आगे बढ़ने के लिए सबसे अधिक ध्यान दीनता पर देना चाहिए । जितना अधिक दैन्य भाव हमारे हृदय में उत्पन्न होगा , उतना हृदय निर्मल होगा, आंखों से अश्रुधारा प्रवाहित होगी और भगवत्प्रेम निरंतर बढ़ता जायेगा । दीनता को ही भक्ति की आधारशिला कहा गया है -
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना ।
अमानिना मानदेन कीर्तनीय: सदा हरि:।।
गौरांग महाप्रभु ने कहा साधक को तृण से भी अधिक दीन और वृक्ष से भी अधिक सहनशील होना चाहिये , सदा दूसरों का सम्मान करे और स्वयं के लिए मान कभी न चाहे , स्वयं को सबसे अधिक निंदनीय माने।
इसी सिद्धांत को राधा गोविंद गीत में स्पष्ट करते हुए श्री महाराज जी कहते हैं -
साधक सिद्ध दोनों गोविंद राधे।
अपने को महापापी बता दे ।।
जो है महापापी गोविंद राधे ।
आपु को आपु निष्पाप बता दे ।।
अर्थात् जो सच्चे साधक और सिद्ध होते हैं वे तो सदा स्वयं को महापतित ही बताते हैं , मानते हैं लेकिन जो घोर पापात्मा हैं वही स्वयं को निष्पाप मानकर दूसरों में दोष देखा करते हैं । वे स्वयं को ही सबसे बड़ा साधक समझते हैं और यही अहंकार उन्हें साधना में आगे बढ़ने नहीं देता ।
इसलिए जिसे भगवत्पथ पर तीव्र गति से आगे बढ़ना हो उसे सबसे पहले परम दैन्य भाव ही हृदय में उत्पन्न करना होगा । स्वयं को सबसे बड़ा पतित मानना होगा।
हे दीनबंधु ! तुम्हें तो केवल दीनता प्रिय है और मुझ अधम के हृदय में तो दीनता का लवलेश भी नहीं है । हे नाथ ! कृपा करके वह दैन्य भाव भी तुम ही प्रदान कर दो ।इसी कृपायाचना के साथ-

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...