संसार मे तो हम सर्वत्र अभ्यास करके ही आगे बढ़ते हैं , तो हम भगवान के Area (एरिया) में निराश क्यों हों ?
This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Thursday, May 21, 2020
नामी का न पाया रस गाया तेरा नामा।
पित्त रोगी को ज्यों मीठा खारा लगे बामा।।
पित्त रोगी को ज्यों मीठा खारा लगे बामा।।
भावार्थः- हे श्रीराधे! यद्यपि मैंने तुम्हारे नाम का अहर्निश गान किया किन्तु नाम में विराजमान नामी का आनन्द मुझे प्राप्त नहीं हुआ। जिस प्रकार पित्त के रोगी को मीठी वस्तु भी खारी प्रतीत होती है उसी प्रकार मुझे तुम्हारे मधुर नाम का रस प्राप्त नहीं हो सका।
सबै भिखारी जगत के , जेतिक नातेदार।
दिव्य प्रेम आनंद के,तुम इक साहूकार।।
दिव्य प्रेम आनंद के,तुम इक साहूकार।।
संसार के सभी जीव आनंद के भिखारी हैं और हम अनादिकाल से अज्ञान के कारण उन्हीं को अपना नातेदार सम्बन्धी मान कर उन्हीं से आनंद की आशा करते रहे। किंतु हे नाथ! अब आपकी कृपा से मैं यह समझ गया कि एक मात्र 'आप ही' मेरे हैं और उस दिव्य प्रेमानंद के दाता एवं धनी भी एकमात्र आप ही हैं। अतः हे नाथ! इस भिक्षुक को भी प्रेमानंद देने की कृपा करें।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
#श्रीधरी_दीदी_द्वारा_जगद्गुरु_कृपालु_परिषत_की_अध्यक्षा_डा. #विशाखा_त्रिपाठी (#बड़ी_दीदी) #के_विषय_में_प्रकटित_हृदयोद्गार :
श्री कृपालु महाप्रभु चरणानुरागी भक्तवृंद !
हमारे परम पूज्य गुरुवर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने अपनी तीनों भगवत्परायणा सुपुत्रियों के रूप में जो अनमोल त्रिरत्न हमें प्रदान किये हैं, उनकी इस कृपा के लिए समस्त साधक समुदाय श्री महाराज जी का ऋणी है।
क्योंकि आज श्री महाराज जी की प्रत्यक्ष अनुपस्थिति में गुरु भक्ति की आदर्श स्वरुपा, इन्हीं तीनों J.K.P. (जगद्गुरु कृपालु परिषत) की अध्यक्षाओं के संरक्षण में ही सभी साधक पूर्ववत् श्री महाराज जी की दिव्य उपस्थिति का, उनकी कृपाओं का अनुभव करते हुए, गुरुधाम इत्यादि में जाकर गुरुनिर्दिष्ट साधना का पूर्ण लाभ ले रहे हैं ।
और भक्ति त्रिवेणी रूपी तीनों दीदीयों में भी भगवती गंगा स्वरूपा सिरमौर हैं हमारी प्यारी बड़ी दीदी जो भक्तिधाम मनगढ़ की अध्यक्षा हैं, जिनकी प्रत्येक आज्ञा का पालन स्वयं मंझली दीदी ( सुश्री डा. श्यामा त्रिपाठी ) व छोटी दीदी ( सुश्री डा. कृष्णा त्रिपाठी ) भी परम आदरपूर्वक करती हैं ।
देवनदी के समान ही शुभ्रवर्णी बड़ी दीदी अपने उज्ज्वल स्वरुप से हटात् सभी का मन मोह लेती हैं । और सभी साधकों को अपने ममतामयी आँचल की छाया प्रदान करके, प्यार-दुलार देकर गंगा मैया के शीतल सुखद स्पर्श सा ही सुख प्रदान करती हैं । इनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य गुरु सेवा ही है ।
श्री महाराज जी के अधूरे प्रोजेक्ट्स को पूरा करना, उनकी महिमा को जगत में प्रकाशित करने के लिए नये प्रोजेक्ट्स का निर्माण, विभिन्न साधना शिविरों का आयोजन, येन केन प्रकारेण समस्त साधकों को श्री महाराज जी के सिद्धांतों के अनुकरण हेतु प्रेरित करना, विभिन्न लीलाओं के मंचन, ऑडियो-विडियो इत्यादि के माध्यम से श्री महाराज जी के सिद्धांत ज्ञान का प्रचार करना, हरि-गुरु के विभिन्न विग्रहों एवं झांकियों के निर्माण के माध्यम से साधकों की भगवद्भावना को द्विगुणित करना, विभिन्न पर्वों के माध्यम से श्री महाराज जी की दिव्य उपस्थिति का अनुभव करवाना, श्री महाराज जी द्वारा संचालित समस्त जनकल्याणकारी योजनाओं का विस्तार करना बस यही सब दैवीय कार्य उनकी दिनचर्या के प्रमुख अंग हैं ।
बड़ी दीदी के नाम के अनुरूप ही उनके समस्त कार्य भी बड़े-बड़े होते हैं ।
भगवती भागीरथी रूपी दीदी के भगीरथ प्रयत्नों के लिए अनेक अवार्ड्स भी उन्हें प्राप्त हुए हैं ।
हम सभी परम सौभाग्यशाली हैं जो ऐसी ममतामयी दीदी का सहज सान्निध्य हमें प्राप्त है ।
मैं समस्त साधकों की ओर से उनके चरण कमलों में बारम्बार प्रणाम करती हूँ ।
और समस्त साधकों से निवेदन करती हूँ कि गुरु सेवा का दृढ़ संकल्प लेकर उनके प्रयासों को सार्थक बनायें , यही उनकी अभिलाषा है कि हर साधक का जीवन एकमात्र गुरु सेवा में ही व्यतीत हो, इसी में उनकी सर्वाधिक प्रसन्नता है ।
अतएव आइये अपने मानव जीवन को सफल बनाने के लिए हम सभी श्री महाराज जी के चरणों में यही प्रार्थना करें –
भुक्ति ना दे मुक्ति ना दे वैकुण्ठ ना दे ।
गुरु सेवा में ही मेरा जन्म बिता दे ।।
क्योंकि आज श्री महाराज जी की प्रत्यक्ष अनुपस्थिति में गुरु भक्ति की आदर्श स्वरुपा, इन्हीं तीनों J.K.P. (जगद्गुरु कृपालु परिषत) की अध्यक्षाओं के संरक्षण में ही सभी साधक पूर्ववत् श्री महाराज जी की दिव्य उपस्थिति का, उनकी कृपाओं का अनुभव करते हुए, गुरुधाम इत्यादि में जाकर गुरुनिर्दिष्ट साधना का पूर्ण लाभ ले रहे हैं ।
और भक्ति त्रिवेणी रूपी तीनों दीदीयों में भी भगवती गंगा स्वरूपा सिरमौर हैं हमारी प्यारी बड़ी दीदी जो भक्तिधाम मनगढ़ की अध्यक्षा हैं, जिनकी प्रत्येक आज्ञा का पालन स्वयं मंझली दीदी ( सुश्री डा. श्यामा त्रिपाठी ) व छोटी दीदी ( सुश्री डा. कृष्णा त्रिपाठी ) भी परम आदरपूर्वक करती हैं ।
देवनदी के समान ही शुभ्रवर्णी बड़ी दीदी अपने उज्ज्वल स्वरुप से हटात् सभी का मन मोह लेती हैं । और सभी साधकों को अपने ममतामयी आँचल की छाया प्रदान करके, प्यार-दुलार देकर गंगा मैया के शीतल सुखद स्पर्श सा ही सुख प्रदान करती हैं । इनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य गुरु सेवा ही है ।
श्री महाराज जी के अधूरे प्रोजेक्ट्स को पूरा करना, उनकी महिमा को जगत में प्रकाशित करने के लिए नये प्रोजेक्ट्स का निर्माण, विभिन्न साधना शिविरों का आयोजन, येन केन प्रकारेण समस्त साधकों को श्री महाराज जी के सिद्धांतों के अनुकरण हेतु प्रेरित करना, विभिन्न लीलाओं के मंचन, ऑडियो-विडियो इत्यादि के माध्यम से श्री महाराज जी के सिद्धांत ज्ञान का प्रचार करना, हरि-गुरु के विभिन्न विग्रहों एवं झांकियों के निर्माण के माध्यम से साधकों की भगवद्भावना को द्विगुणित करना, विभिन्न पर्वों के माध्यम से श्री महाराज जी की दिव्य उपस्थिति का अनुभव करवाना, श्री महाराज जी द्वारा संचालित समस्त जनकल्याणकारी योजनाओं का विस्तार करना बस यही सब दैवीय कार्य उनकी दिनचर्या के प्रमुख अंग हैं ।
बड़ी दीदी के नाम के अनुरूप ही उनके समस्त कार्य भी बड़े-बड़े होते हैं ।
भगवती भागीरथी रूपी दीदी के भगीरथ प्रयत्नों के लिए अनेक अवार्ड्स भी उन्हें प्राप्त हुए हैं ।
हम सभी परम सौभाग्यशाली हैं जो ऐसी ममतामयी दीदी का सहज सान्निध्य हमें प्राप्त है ।
मैं समस्त साधकों की ओर से उनके चरण कमलों में बारम्बार प्रणाम करती हूँ ।
और समस्त साधकों से निवेदन करती हूँ कि गुरु सेवा का दृढ़ संकल्प लेकर उनके प्रयासों को सार्थक बनायें , यही उनकी अभिलाषा है कि हर साधक का जीवन एकमात्र गुरु सेवा में ही व्यतीत हो, इसी में उनकी सर्वाधिक प्रसन्नता है ।
अतएव आइये अपने मानव जीवन को सफल बनाने के लिए हम सभी श्री महाराज जी के चरणों में यही प्रार्थना करें –
भुक्ति ना दे मुक्ति ना दे वैकुण्ठ ना दे ।
गुरु सेवा में ही मेरा जन्म बिता दे ।।
Wednesday, April 29, 2020
गुरुशरणागति गोविंद राधे।
श्यामा श्याम भक्ति मन शुद्ध करा दे।।
श्यामा श्याम भक्ति मन शुद्ध करा दे।।
भावार्थ:- सद्गुरु की शरणागति में रह कर जो जीव श्यामा श्याम की भक्ति करते हैं, उनका अन्त:करण शुद्ध हो जाता है।
गंगा जल शुद्ध जल गोविंद राधे।
गंगा में मिले जो जल गंगा बना दे।।
गंगा में मिले जो जल गंगा बना दे।।
भावार्थ :- यदि गंगा में अपवित्र जल भी मिल जाता है तो गंगा उस अपवित्र जल को स्वयं में मिला कर गंगा जल ही बना देती है।
हरि गुरु गंगा सम गोविंद राधे।
उनमें ही एक हो जा गंगा बना दे।।
उनमें ही एक हो जा गंगा बना दे।।
भावार्थ:- हरि-गुरु गंगा जल के समान है। तू अपने मन को उनमें लगा दे। तू भी गंगा जल बन जायेगा।
#प्रश्न : महाराज जी! जब मृत्यु निश्चित है तो बीमार होने पर दवाई करें या न करें, उसे तो समय से जाना ही है?
#उत्तर : दो प्रकार का रोग होता है - एक को कहते हैं #कर्मज, एक को कहते हैं #दोषज, हमारे #आयुर्वेद में। आयुर्वेद का मैं आचार्य हूँ। तो आयुर्वेद में दो प्रकार की बीमारी बताई गई है। जो आपके आहार-विहार की गड़बड़ी से हुआ है, यानी आपकी गड़बड़ी से हुआ है, खानपान जो कुछ अण्ड-बण्ड आपने किया उसके कारण हो गया है, उसको #दोषज कहते हैं। अब जो प्रारब्ध का कर्मफल भोग है, उसके द्वारा जो रोग होता है वो #कर्मज कहलाता है। तो कर्मज रोग का तो इलाज करो, न करो, बराबर है। जब प्रारब्ध भोग समाप्त हो जाएगा तो अपनेआप ठीक हो जाएगा। फिर तो अण्ड-बण्ड दवा भी करो तो भी वो रोग चला जायेगा। नाम करते हैं लोग, अरे हमने ऐसा कर लिया, हम तो ठीक हो गए। वो कर्मज व्याधि थी इसलिए ठीक हो गया अपनेआप। वो बता रहा है ऊटपटाँग इलाज। उसने झाड़-फूँक कर दिया, उसने ये कर दिया।
दोषज बीमारी जो होगी, जो हमारी गड़बड़ी से हुई है, उसमें तो दवा काम करेगी, इलाज कराना होगा। अब चूँकि मालूम नहीं हो सकता कि ये कर्मज है कि दोषज है, इसलिए दवा सबको करनी पड़ती है।
◆◆#भक्ति_का_अधिकारी_कौन_है ?◆◆
समस्त वेदों-शास्त्रों में भक्ति को ही भगवत्प्राप्ति का एक मात्र मार्ग बताया गया है।
भक्तिरेवैनं नयति भक्तिरेवैनं पश्यति भक्तिरेवैनं दर्शयति
भक्तिवशः पुरुषः भक्तिरेव भूयसी
(माठर श्रुति)
भक्तिवशः पुरुषः भक्तिरेव भूयसी
(माठर श्रुति)
अर्थात् केवल भक्ति द्वारा ही भगवान को प्राप्त किया जा सकता है।
स्कन्द पुराण में वेदव्यास जी ने कहा -
स्कन्द पुराण में वेदव्यास जी ने कहा -
आलोड्य सर्व शास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणो हरि: ।।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणो हरि: ।।
अर्थात् 'मैंने समस्त शास्त्रों को मथकर, बारम्बार विचार करके एक ही निष्कर्ष निकाला है कि केवल भगवान की भक्ति ही वरणीय है। यही जीवन का सार है।'
सब कर मत खगनायक एहा,
करिअ राम पद पंकज नेहा ।
(रामचरित मानस)
सब कर मत खगनायक एहा,
करिअ राम पद पंकज नेहा ।
(रामचरित मानस)
तात्पर्य यही है कि भक्ति ही सर्वोपरि तत्त्व है। अपना परम कल्याण चाहने वाले मनुष्यों को एकमात्र इसी का अवलम्ब लेना चाहिए और भक्ति मार्ग के अधिकारी सभी जीव हैं -
सर्वेधिकारिणो ह्यत्र हरिभक्तौ यथा नृप
(पद्म पुराण)
(पद्म पुराण)
शास्त्रतः श्रूयते भक्तौ नृमात्रस्याधिकारिता
(भक्ति रसामृत सिंधु)
(भक्ति रसामृत सिंधु)
चराचर सब जीव गोविंद राधे,
भक्ति पथ के अधिकारी बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
भक्ति पथ के अधिकारी बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
ये भक्तिमार्ग सरलातिसरल मार्ग है और घोर से घोर पापात्मा से लेकर ब्रह्मा तक सभी भक्ति के अधिकारी हैं -
भक्ति के अधिकारी गोविंद राधे,
पतितों ते ब्रह्मा तक सब हैं बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
पतितों ते ब्रह्मा तक सब हैं बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
सदाचारी तो भक्ति कर ही सकता है लेकिन दुराचारी को भी इसमें प्रवेश पाने का अधिकार है -
अपिचेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यक् व्यवसितो हि सः।।
(गीता)
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यक् व्यवसितो हि सः।।
(गीता)
सदाचारी दुराचारी गोविंद राधे,
दोनों अधिकारी भक्ति पथ के बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
दोनों अधिकारी भक्ति पथ के बता दे।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
परम अपवित्र व्यक्ति भी भक्ति करके परम पवित्र बन जाता है। हमारे भक्तवत्सल भगवान केवल भाव के भूखे हैं, प्रेम के भूखे हैं, फिर भक्ति करने वाला कौन है, उसकी जाति, आचरण, रूप, गुण इत्यादि किसी भी बहिरंग चीज़ पर वे विचार नहीं करते। केवल उस जीव के प्रेम से,उसकी अनन्य भक्ति से ही रीझ जाते हैं, उसे सदा-सदा के लिए अपना बना लेते हैं -
व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च वयो विद्या गजेन्द्रस्य का
कुब्जाया: किमु नामरूपमधिकं किं तत्सुदाम्नो धनम् ।
वंशः को विदुरस्य यादवपतेरुग्रस्य किं पौरुषं
भक्त्या तुष्यति केवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधव: ।।
कुब्जाया: किमु नामरूपमधिकं किं तत्सुदाम्नो धनम् ।
वंशः को विदुरस्य यादवपतेरुग्रस्य किं पौरुषं
भक्त्या तुष्यति केवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधव: ।।
अर्थात् 'व्याध (रत्नाकर) का कोई पवित्र आचरण नहीं था लेकिन भक्ति द्वारा वह महापुरुष (वाल्मिकी) बन गया। ध्रुव ने इतनी अल्पायु में ही भक्ति द्वारा ध्रुव लोक प्राप्त कर लिया। गजराज के पास कोई ज्ञान नहीं था लेकिन भक्ति द्वारा वह भी वैकुण्ठ पहुँच गया। कुब्जा ने कुरूप होते हुए भी श्री कृष्ण को प्रियतम रूप में प्राप्त किया और सुदामा ने दरिद्र होकर भी भक्ति द्वारा द्वारिका जैसा ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया। विदुर के अकुलीन होने पर भी भगवान ने प्रेमपूर्वक उनके यहाँ केले के छिलके को ही विभोर होकर ग्रहण किया और उग्रसेन ने बलरहित होकर भी भक्ति द्वारा मथुरा का राज्य प्राप्त कर लिया।'
अस्तु, तात्पर्य यही है कि भगवान केवल भक्ति से ही रीझते हैं अन्य किसी गुण, योग्यता इत्यादि की अपेक्षा नहीं करते। इसलिए भक्ति मार्ग के अधिकारी सभी जीव हैं। हम किसी भी स्थिति में हों, किसी भी स्थान पर हों, सदा सर्वत्र एकनिष्ठ भक्ति करके भगवान तक पहुँच सकते हैं, उनकी कृपा के अधिकारी बन सकते हैं।
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गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






