Thursday, May 21, 2020

आप केवल श्री महाराज जी की ज्येष्ठा पुत्री होने या 'जगद्गुरु कृपालु परिषत, श्री भक्ति धाम, मनगढ़' की अध्यक्षा होने के कारण ही बड़ी नहीं हैं अपितु अपनी आदर्श गुरुभक्ति, गुरुसेवा के कारण समस्त विश्व के लिए बड़ी हैं, वंदनीय हैं। और उतना ही बड़ा है आपका मातृस्वरूप हृदय जिससे आपने सभी पर अहैतुक अपार वात्सल्य प्रेम लुटाया है।
हम सदैव आपकी कृपा के ऋणी रहेंगें ।आपकी कृपादृष्टि हम सभी पर सदा ऐसे ही बनी रहे ।
'कु' का संग त्यागे बिनु गोविन्द राधे।
'सु' का संग होगा नहिं मन को बता दे।।
भावार्थ: मन से या तो भगवान व महापुरुष का सु-संग किया जा सकता है अथवा मायिक जनों का कु-संग। कोई भी उभय मार्गगामी नहीं हो सकता। एक की प्राप्ति हेतु दूसरे का सम्पूर्ण त्याग अनिवार्य है।
संसार मे तो हम सर्वत्र अभ्यास करके ही आगे बढ़ते हैं , तो हम भगवान के Area (एरिया) में निराश क्यों हों ?
नामी का न पाया रस गाया तेरा नामा।
पित्त रोगी को ज्यों मीठा खारा लगे बामा।।
भावार्थः- हे श्रीराधे! यद्यपि मैंने तुम्हारे नाम का अहर्निश गान किया किन्तु नाम में विराजमान नामी का आनन्द मुझे प्राप्त नहीं हुआ। जिस प्रकार पित्त के रोगी को मीठी वस्तु भी खारी प्रतीत होती है उसी प्रकार मुझे तुम्हारे मधुर नाम का रस प्राप्त नहीं हो सका।
(श्यामा श्याम गीत)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
सबै भिखारी जगत के , जेतिक नातेदार।
दिव्य प्रेम आनंद के,तुम इक साहूकार।।
संसार के सभी जीव आनंद के भिखारी हैं और हम अनादिकाल से अज्ञान के कारण उन्हीं को अपना नातेदार सम्बन्धी मान कर उन्हीं से आनंद की आशा करते रहे। किंतु हे नाथ! अब आपकी कृपा से मैं यह समझ गया कि एक मात्र 'आप ही' मेरे हैं और उस दिव्य प्रेमानंद के दाता एवं धनी भी एकमात्र आप ही हैं। अतः हे नाथ! इस भिक्षुक को भी प्रेमानंद देने की कृपा करें।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...