Monday, September 26, 2011



भला तुम कैसे हो भगवान |
प्रीति करत नित पर नारिन सों, लंपट नर उनमान |
पतिव्रत-धर्म मिटावत आपुहिं, आपुहिं करत बखान |
वेद वेध जब वेद न मानत, और कौन पुनि मान |
हरि कह ‘दैहिक धर्म पतिव्रत, ता फल स्वर्गहिं जान |
...
यह ‘कृपालु’ परधर्म मोरि-रति, ता फल दिव्य महान’ ||

भावार्थ- एक भोली भाली सखी कहती है कि हे श्यामसुन्दर ! तुम भला भगवान् कैसे हो सकते हो ? तुम विषयासक्त मनुष्य की भाँति पर स्त्रियों से प्यार करते हो तथा स्वयं ही पतिव्रत धर्म की वेदों में प्रशंसा करते हुए स्वयं ही उसे नष्ट भी करते हो | वेदों से जानने योग्य भगवान् ही जब वेद को नहीं मानता तो फिर भला और कौन मानेगा | श्यामसुन्दर ने कहा सांसारिक पतियों से अनन्य प्रेम होना ही पतिव्रत धर्म है, जिसे दैहिक धर्म भी कहते हैं | इसका फल क्षणभंगुर स्वर्ग ही है एवं ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में परम पति परमेश्वर में अनन्य प्रेम होना ही परधर्म है, इसका फल अनन्त काल के लिए दिव्य पमानन्द प्राप्ति अथवा गोलोक प्राप्ति है |


(प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण-बाल लीला- माधुरी)
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित- राधा गोविन्द समिति.

श्रीकृष्ण को रोकर पुकारो तो वो कृपा करके किसी वास्तविक महापुरुष से मिला देंगे। क्योंकि: 'बिनु हरि कृपा मिलहईं नहिं सन्ता'।
ज़ीरो में गुणा करो चाहे ज़ीरो से, चाहे करोड़ से ,जवाब ज़ीरो ही आयेगा। ऐसे ही बिना मन के कोई भी इंद्रिय की कोई भी साधना लिखी नहीं जायेगी साधना मानी नहीं जायेगी। उसको एक्टिंग कहते हैं और भगवान से एक्टिंग करना, यह सबसे बुरी बात है। संसार में करो ठीक है। वह तो एक्टिंग की जगह है ही। वहाँ तो फ़ैक्ट करते हो और जहां फ़ैक्ट करना है वहाँ एक्टिंग करते हो ,लापरवाही करते हो,ये अच्छा नहीं है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु.
श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
एक बात बड़ी इंपोर्टेंट| हरि, गुरु को अपने साथ ,सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट| अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।




 
 

हे श्यामसुंदर! संसार में भटकते भटकते थक गया। हे करुणा वरूनालय! तुमने अकारण करुणा के परिणाम स्वरूप मानव देह दिया ,गुरु के द्वारा तत्वज्ञान कराया कि किसी तरह तुम्हारे सन्मुख हो जाऊँ तथा अनंत दिव्यानन्द प्राप्त करके सदा सदा के लिए मेरी दुख निव्रत्ति हो जाये लकीन यह मन इतना हठी है कि तुम्हारे शरणागत नहीं होता।
खूब तरसाया है तेरी ख़्वाहिशों ने ही तुझे।
तू भी अब इन ख़्वाहिशों को कुछ तरसती छोड़ दे।।


Sunday, September 25, 2011

बार बार सोचो कि भगवान में सुख है , भगवान में ही सुख है. हरि गुरु ही मेरे है. यह बार बार सोचोगे तो भगवान से प्यार हो जायेगा. सीधा सा इलाज है . सोचना , बस बोलना नहीं .सोचना. बोलना बहुत हो चूका. बार बार सोचने से डिसीजन होगा और वह डिसीजन ही साधना करायेगा.


क्षण क्षण हरि गुरु स्मरण में ही व्यतीत करो. पल पल मृत्यु की और बढ़ रहे हो और संसार में बेहोश हो. 

-------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.



JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ KI JAI HO.........



 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...