Tuesday, May 28, 2013

Every major religion familiarizes its followers with the law of donating 10% of one’s earnings. Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj calls this spiritual income tax. You are required to pay tax on the money you earn, and failure to do so results in punishment. Sometimes you get away with not paying this obligatory tax. But God, who cannot be fooled or deceived, says in the Bhagavat, “He, who keeps more than his share, is a thief and will be punished.”
------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
Every major religion familiarizes its followers with the law of donating 10% of one’s earnings. Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj calls this spiritual income tax. You are required to pay tax on the money you earn, and failure to do so results in punishment. Sometimes you get away with not paying this obligatory tax. But God, who cannot be fooled or deceived, says in the Bhagavat, “He, who keeps more than his share, is a thief and will be punished.”
------jagadguru shri kripalu ji maharaj.


 


Both the person attached to the world, and the person completely detached from it, are eligible for the path of devotion.
----jagadguru shri kripalu ji maharaj.


 

साधक हेतु कतिपय स्मरनिये निर्देश
1- सतर्क होकर साधना करने के लिए बैठो ! यदि आलस्य आने लगे तो अपने आप खड़े हो जाओ ! लेकिन शर्त यह है,चिंतन श्यामसुंदर का ही हो !

2- अपने इष्टदेव का ही गुणगान करो ! ध्यान रखो ,किसी का मन किसी के गुण पर ही रीझता है !(सुन्दर रूप भी एक गुण है ),इसी प्रकार अधम -उधारंहार ,पतित -पवन ,भक्त -वत्सल आदि ठाकुर जी के अनंत गुण है ! इन गुणों का निरंतर चिंतन करें !

...
3- केवल गुणगान करने से भी काम नहीं चलेगा ! गन तो गवैये भी करते है , लेकिन उनको भगवत्प्राप्ति नहीं होती ! अतएव गुणगान करते समय तदनुसार भाव भी लाओ ! जैसे ,हम बहुत अधम है ,पतित है ,अनंत जन्मो के किये अनंत पापों की गठरी सर पैर लिए हैं और वे अकारण करुण,भक्त -वत्सल ,पतित -पावन ,अधम -उधारंहार आदि हैं !

4- हमें कीर्तन में नींद कु आती है ? क्योंकि हम अपने इस्टदेव का रूपध्यान नहीं करते , श्यामसुंदर को प्यार नहीं करते ! प्यार नहीं है , इसलिए गुणगान करते समय ह्रदये नहीं पिघलता व् हम ऊँघने लगते हैं !

5- नेत्र बंद करके रूपध्यान करो , क्योंकि प्राथमिक अवस्था में आँखे खोलकर कीर्तन करने से दुसरे लोग आते जाते दिखाई देते है , श्यामसुंदर नहीं ! रूपध्यान की अत्यंत आवश्यकता है ! रूपध्यान नहीं करेंगे तो शारीरिक क्रिया का कोई फल नहीं मिलेगा !

6- ठाकुर जी का जैसे भी चाहें , रूपध्यान बना लें ! बाल्यावस्था का ,किशोर रूप का , यूवावस्था का ! ठाकुर जी उसी रूप मे मिल जायेंगे ! लेकिन भगवान् को पहले देखकर फिर रूपध्यान करने वाले नास्तिक बन जायेंगे , क्योंकि हमारी प्राकृत आँखे 'प्राकृत राम ' को देखेंगी ,भगवान् राम को नहीं ! " चिदानंदमय देह तुम्हारी ,विगत विकार जान अधिकारी ''!

अतः अधिकारी बनने के पूर्व देखने की बात न करो !

7- रूपध्यान करते हुए प्रिया प्रियतम के साथ जिस लीला में जाना चाहो ,चले जाओ तथा उनके दिव्य मिलन व् दर्शन के लिए अत्यंत तड़पन पैदा करो !लाख आँसू बहाओ,लेकिन किसी भी आँसू को तब तक सच्चा न मनो, जब तक स्वंय श्यामसुन्दर आकर उसे अपने पीताम्बर से न पोंछ लें ! इतनी व्याकुलता पैदा करो की नेत्र और प्राणों में बाजी लग जाये ! एक -एक पल युग के समान लगने लगे ! लेकिन यदि प्राणवल्लभ न आयें तो निराशा न आने पाये ,प्रेमास्पद में दोष बुद्धि न आने पाये !

8- पूर्ण लाभ लेने हेतु साधना समय के अतिरिक्त समय में गुरु एवं ईश्वर को साक्षी व अन्तर्यामी रूप में नित्य अपने साथ अनुभव करते हुए ,मौन नियम का पूर्ण पालन करो !

*******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज********
साधक हेतु कतिपय स्मरनिये निर्देश 
1- सतर्क होकर साधना करने के लिए बैठो ! यदि आलस्य आने लगे तो अपने आप खड़े हो जाओ ! लेकिन शर्त यह है,चिंतन श्यामसुंदर का ही हो !

2- अपने इष्टदेव का ही गुणगान करो ! ध्यान रखो ,किसी का मन किसी के गुण पर ही रीझता है !(सुन्दर रूप भी एक गुण है ),इसी प्रकार अधम -उधारंहार ,पतित -पवन ,भक्त -वत्सल आदि ठाकुर जी के अनंत गुण है ! इन गुणों का निरंतर चिंतन करें !

3- केवल गुणगान करने से भी काम नहीं चलेगा ! गन तो गवैये भी करते है , लेकिन उनको भगवत्प्राप्ति नहीं होती ! अतएव गुणगान करते समय तदनुसार भाव भी लाओ ! जैसे ,हम बहुत अधम है ,पतित है ,अनंत जन्मो के किये अनंत पापों की गठरी सर पैर लिए हैं और वे अकारण करुण,भक्त -वत्सल ,पतित -पावन ,अधम -उधारंहार आदि हैं !

4- हमें कीर्तन में नींद कु आती है ? क्योंकि हम अपने इस्टदेव का रूपध्यान नहीं करते , श्यामसुंदर को प्यार नहीं करते ! प्यार नहीं है , इसलिए गुणगान करते समय ह्रदये नहीं पिघलता व् हम ऊँघने लगते हैं ! 

5- नेत्र बंद करके रूपध्यान करो , क्योंकि प्राथमिक अवस्था में आँखे खोलकर कीर्तन करने से दुसरे लोग आते जाते दिखाई देते है , श्यामसुंदर नहीं ! रूपध्यान की अत्यंत आवश्यकता है ! रूपध्यान नहीं करेंगे तो शारीरिक क्रिया का कोई फल नहीं मिलेगा !

6- ठाकुर जी का जैसे भी चाहें , रूपध्यान बना लें ! बाल्यावस्था का ,किशोर रूप का , यूवावस्था का ! ठाकुर जी उसी रूप मे मिल जायेंगे ! लेकिन भगवान् को पहले देखकर फिर रूपध्यान करने वाले नास्तिक बन जायेंगे , क्योंकि हमारी प्राकृत आँखे 'प्राकृत राम ' को देखेंगी ,भगवान् राम को नहीं ! " चिदानंदमय देह तुम्हारी ,विगत विकार जान अधिकारी ''!

अतः अधिकारी बनने के पूर्व देखने की बात न करो !

7- रूपध्यान करते हुए प्रिया प्रियतम के साथ जिस लीला में जाना चाहो ,चले जाओ तथा उनके दिव्य मिलन व् दर्शन के लिए अत्यंत तड़पन पैदा करो !लाख आँसू बहाओ,लेकिन किसी भी आँसू को तब तक सच्चा न मनो, जब तक स्वंय श्यामसुन्दर आकर उसे अपने पीताम्बर से न पोंछ लें ! इतनी व्याकुलता पैदा करो की नेत्र और प्राणों में बाजी लग जाये ! एक -एक पल युग के समान लगने लगे ! लेकिन यदि प्राणवल्लभ न आयें तो निराशा न आने पाये ,प्रेमास्पद में दोष बुद्धि न आने पाये !

8- पूर्ण लाभ लेने हेतु साधना समय के अतिरिक्त समय में गुरु एवं ईश्वर को साक्षी व अन्तर्यामी रूप में नित्य अपने साथ अनुभव करते हुए ,मौन नियम का पूर्ण पालन करो !

*******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज********



    जब तक माया के अधीन हो तब तक क्यों सोचते हो के मैं प्रशंसा के योग्य हूँ. जब तक तुम शरणागत नहीं हुए हो तब तक तुम्हे अहंकार किस बात का? किसी भी जीव का वास्तविक रूप दासत्व प्राप्त करना है. श्री कृष्ण के दास बन जाओ फिर खूब अहंकार करो, हम छूट देते हैं लेकिन उस समय तुम अहंकार कर ही नहीं सकते -यह वैसे ही है जैसे खरगोश के सींग नहीं लगाये जा सकते. इसलिए अहंकार से सदा सावधान रहो !
    *******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज********
    जब तक माया के अधीन हो तब तक क्यों सोचते हो के मैं प्रशंसा के योग्य हूँ. जब तक तुम शरणागत नहीं हुए हो तब तक तुम्हे अहंकार किस बात का? किसी भी जीव का वास्तविक रूप दासत्व प्राप्त करना है. श्री कृष्ण के दास बन जाओ फिर खूब अहंकार करो, हम छूट देते हैं लेकिन उस समय तुम अहंकार कर ही नहीं सकते -यह वैसे ही है जैसे खरगोश के सींग नहीं लगाये जा सकते. इसलिए अहंकार से सदा सावधान रहो !
*******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज********


     


    If the opportunity for physical service does not arise, engage in service mentally. It will give you exactly the same result.
    -----jagadguru shri kripalu ji maharaj.
    If the opportunity for physical service does not arise, engage in service mentally. It will give you exactly the same result.
-----jagadguru shri kripalu ji maharaj.



    As long as the individual soul is under the control of Maya, all faults like lust, anger, greed, etc., will remain with him.
    जब तक माया का अधिकार रहेगा तब तक काम क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि सब दोष रहेंगे।
    -----jagadguru shri kripalu ji maharaj.
    As long as the individual soul is under the control of Maya, all faults like lust, anger, greed, etc., will remain with him.
जब तक माया का अधिकार रहेगा तब तक काम क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि सब दोष रहेंगे।
-----jagadguru shri kripalu ji maharaj.


     


    At the time of death, wherever your mind is attached, you will attain that object. That is why the Vedas and Saints advice us to remember God constantly. You never know when your last moment will arrive. If you remember God at that moment, you will attain Golok.
    ******jagadguru shri kripalu ji maharaj*******
    At the time of death, wherever your mind is attached, you will attain that object. That is why the Vedas and Saints advice us to remember God constantly. You never know when your last moment will arrive. If you remember God at that moment, you will attain Golok.
******jagadguru shri kripalu ji maharaj*******


    मन का अटैचमेंट किसमें करें?

    एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...