Friday, March 21, 2014


"No one can really know God. He is not perceivable to the physical senses. Yet, many souls have attained Him. He has a very important quality of being causelessly merciful. It is only with His grace that the souls can know Him or attain Him. But, we have to do devotion to obtain this grace. Do not procrastinate, life is short and death can knock on our door any time."

भक्त जैसा चाहे गोविन्द राधे। भगवान् वैसा ही रूप बना दे ।।
राम कृष्ण हरि एक गोविन्द राधे। जामें लगे मन वामें लगा दे।।
.........श्री महाराज जी।

( भक्ति का वास्तविक स्वरुप )
भक्ति में अनन्यता परमावश्यक है । केवल श्रीक्रुष्ण एवं उनके नाम, रुप, गुण, लीला,धाम तथा गुरु में ही मन का लगाव रहे । अन्य देव, मानव या मायिक पदार्थ में मन का लगाव न हो । इसका तात्पर्य यह न समझ लो कि संसार से भागना है ।वास्तव में संसार का सेवन करते समय उसमें सुख नहीं मानना है । श्रीक्रुष्ण का प्रसाद मान कर खाना पानी एवं व्यवहार करना है । यह समस्त ज्ञान सदा साथ रखकर सावधान होकर साधना भक्ति करने पर शीघ्र ही मन अपने स्वामी से मिलने को अत्यन्त व्याकुल उठेगा । बस यही व्याकुलता ही भक्ति का वास्तविक स्वरुप है.
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.

जब तक तुम्हें श्यामा श्याम नहीं मिल जाते उनसे मिलने की निरन्तर व्याकुलता बढ़ाते जाओ।
******श्री महाराज जी।

Shyama says, “All glories to Shyam!” Shyam says, “All glories to Shyama!” Shyama, Shyam and the Braj Gopis are all equally glorious. None is less than any of the others.
.......SHRI MAHARAJ JI.

मन कि निर्मलता कि कसौटी है – भगवत विषय में मन का लगाव. यह कसौटी श्रेष्ठ हैं। इश्वरीय तत्व को पाने के लिये हमारे मन मे कितनी छ्टपटाहट है, यहि मन की निर्मलता कि सबसे बडी कसौटी है।
-------श्री महाराज जी।

Wednesday, March 19, 2014

"श्री महाराजजी के मुखारविंद से:
टाइम बरबाद न करो। जितना समय पेट भरने के लिए जरूरी है उतना समय संसार को दो,बाकी टाइम का उपयोग करो। भगवदविषय में लगाओगे तो बहुत जल्दी आगे बढ़ जाओगे अंत:करण की शुद्धि की और। और अगर मर गए बीच में तो जो साधना की है हमारी है वो तुमको फिर मनुष्य बना देगी और फिर कोई गुरु मिल जायेगा या तुम्हारा वही पुराना गुरु दूसरा रूप धारण करके आ जायेगा और तुमको फिर आगे बढ़ाएगा। अँधेर नहीं है भगवान के यहाँ कि बीच में छोड़ दिया गुरुजी ने। ऐसा नहीं होता। वो सदा के लिए हमारा साथ देता है भगवद प्राप्ति तक। इसलिए टाइम का उपयोग करो,समय नष्ट न करो, साधना करते रहो।"

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...