Monday, May 12, 2014

अनादिकाल से साधना की असफलता के पीछे एक ही अवगुण रहा है.......
हरि गुरु का स्मरण त्याग कर मन संसार में लगाना।
.......श्री महाराज जी।

जैसे किसी वास्तविक महापुरुष का संग करने से अनंत जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। उसी प्रकार हरि गुरु से विमुख व्यक्ति का संग जीव से अनंत पाप करा देता है। इसीलिए हरि - गुरु से विमुख व्यक्तियों का संग नहीं करना चाहिये।
......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु ।

कोई चले, चले न चले , हम तो चल पड़े........!
मंजिल की जिसको धुन हो उसे कारवां से क्या........!!
राधे-राधे।

सखी ! तोय, काउ की दीठि लगी |
अरुणारे अति नैन तिहारे, जनु कहुँ रैन जगी |
लोक वेद कुल कानि न मानति, नैनन लाज भगी |
कबहुँक रीझति खीझति कबहुँक, जनु कोउ ठगन ठगी |
कबहुँक अट्टहास करि आपुहिं, प्रेमसिंधु उमगी |
हौं ‘कृपालु’ अब जानि गई तू, मोहन – प्रेम पगी ||

भावार्थ – ( एक सखी का प्रियतम से मधुर मिलन एवं दूसरी सखी के द्वारा रहस्योद्घाटन | )
अरी सखी ! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तुझे किसी की नज़र लग गयी है | संकेत यह है कि तेरी आँखें किसी की आँखों से मिल गयी हैं | अरी सखी ! तेरी आँखें अत्यन्त ही मद से युक्त लाल – लाल दिखाई पड़ रही हैं, जैसे तू कहीं सारी रात जागी हुई हो | तू लोक, वेद और वंश की मर्यादाओं को भी छोड़ बैठी है एवं तेरी आँखों में अब लज्जा का भी निवास नहीं है | अरी सखी ! तू कभी अकारण ही प्रसन्न दिखाई देती है एवं कभी अप्रसन्न दिखाई पड़ती है, जैसे कि तुझे किसी छलिया ने अपने प्रेम से छल लिया हो | कभी – कभी तो तू प्रेम – सिन्धु में डूबती – उतराती हुई अत्यन्त ही उन्मत्त की भाँति अपने - आप ही खिलखिलाकर हँसने भी लगती है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि इन लक्षणों को देखकर मैं अब भली – भाँति समझ गई कि तू प्यारे श्यामसुन्दर के प्रेम में दीवानी हो गई है |

( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति.

A genuine saint never indulges in the performance of miracles or revelation of supernatural power. Most people fall into the trap of so-called saint who perform miracles of a material nature. Even though these miracles lead to Hell or some lower place, they are readily accepted by ignorant material being.

Sunday, May 11, 2014

विपरीत चिन्तन हो, तुरन्त लाईन काट दो, - “नहीं मैं ही गलत हूँ, वो सही है, उनसे गलत काम हो ही नहीं सकता |” जैसे खाना खाते समय यदि एक चीज भी गलत आई, थोड़ी सी प्रतिकूल चीज आई, मुख से बाहर निकाल दिया | ऐसे ही आत्मा के प्रतिकूल पदार्थ यानी प्रतिकूल चिन्तन प्रारम्भ होते ही इलाज करो, अन्यथा द्रौपदी के चीर की भाँति बढ़ता ही जायेगा, फिर सँभल नहीं पायेगा | भगवान कहते हैं, “समस्त शास्त्रों का समस्त ज्ञान समस्त जीव प्राप्त नहीं कर सकते हैं |” यदि वह केवल इतना ही याद रखें कि विरक्त होकर वास्तविक गुरु के शरणागत हों और प्रतिक्षण गुरु के अनुकूल ही चिन्तन व संकल्प करें तो उनका काम बन जायेगा |
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

वेद से लेकर रामायण तक अनन्त कोटि कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान् एक ही हैं , अतः गुरु - सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...