Thursday, June 12, 2014

श्री महाराजजी के सभी सत्संगीयो के लिए हमारी प्यारी-प्यारी दीदियों(VSK) का सन्देश:
हमारी प्यारी-प्यारी दीदियों की आज्ञा है की सभी सत्संगी कुसंग से जितना हो सके उतना बचे,अधिक से अधिक संकीर्तन करें,आँसू बहाये,श्री महाराजजी ने हर एक जीव को बेहिसाब प्यार दिया है हम सबको पहचान ही श्री महाराजजी से मिली है,आज श्री महाराजजी अदृश्य जरूर हो गए हैं मगर क्या वो अपने बच्चों से उनके लिए दिन रात आँसू बहाने वालों से क्षण भर के लिए भी दूर रह सकते हैं????.....श्री महाराजजी का प्यार हमे अनंत जन्मों तक भी लगातार मिलता रहे तो भी हम उनकी असल महिमा उनकी करुणा उनके वात्सल्य को नहीं समझ पायेंगे। क्योंकि हमारा अंत:करण ही कीचड़ से भी अधिक मलिन है पर हमारे सिर्फ साधना और सिद्धान्त ही काम आना है इसलिए रोज़ नियमित रूप से श्री महाराजजी की स्पीच सुननी है और रूपध्यान करके आँसू बहाकर साधना करनी है ताकि हमारे प्रभु फिर हमें अपने दर्शन का सौभाग्य प्रदान करें।
राधे-राधे।

कोई महापुरुष हो , चाहे राक्षस हो। अपने मन में दूसरे के प्रति हमेशा अच्छी भावना होनी चाहिये। जिससे अच्छे विचार अंतःकरण में आवें। वो जो है, वो तो रहेगा ही। वो राक्षस होगा, तो राक्षस रहेगा। महापुरुष होगा तो महापुरुष रहेगा। हम अपने अंदर अगर दुर्भावना लाते हैं तो हमने तो अपना अंतःकरण बिगाड़ लिया। अब भगवान् जो थोड़ा पैर रखे आने के लिए, एबाउट टर्न चल दिये। वो कहते हैं - क्योंकि तुम तो औरों को बुलाते हो , इसलिये मैं नहीं रहता ऐसे घर में।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!

भगवान् से कोई जीव किसी प्रकार का लाभ नहीं उठा सकता। जैसे समुद्र का खारा जल किसी प्राणी की प्यास नहीं बुझाता परन्तु वही समुद्र का जल जब बादल बरसाता है तो सम्पूर्ण जगत तृप्त हो जाता है। इसी प्रकार संतों द्वारा ही भगवान् की दिव्य महिमा का ज्ञान प्राप्त करके जीव भगवान् का आनन्द प्राप्त कर लेता है।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

Hari and Guru alone are yours. O my mind! Surrender only to Them.
हरि गुरु दोइ अपना, गहू इनकेई शरणा।
.....श्री महाराज जी।

O RADHEY........!!!

COME TO ME AND BE WITH ME ALL THE TIME.

Wednesday, June 11, 2014

जो सौभाग्यशाली साधक उनके चरण कमलों को ह्रदय में धारण करते हैं ,
उनका अज्ञानांधकार सदा सदा को समाप्त हो जाता है।
सहज वैराग्य उत्पन्न होता है एवं दिव्य प्रेम का अंकुर प्रस्फुटित हो जाता है।
ऐसे प्रेम उदधि गुरूवर को कोटि कोटि प्रणाम।

हमेशा यह सोचते रहो कि तुम्हारी की गयी साधना सुरक्षित भी होती जा रही है,या तुम्हारे द्वारा किए कार्यों से नष्ट भी होती जा रही है।रात्रि मेँ एक बार अवश्य सोचो।
रात्रि मेँ सोते समय गुरु को अपने अंत:करण मेँ प्रवेश करके सोओ।

-----श्री महाराज जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...