Wednesday, July 9, 2014

पंच तत्व अरु अहं का, भेदन करि दे ज्ञान।
पै बिनु भक्ति न करि सके , भेदन प्रकृति महान।।६२।।

भावार्थ- ज्ञानी , ज्ञान से पृथिवी , जल , तेज , वायु एवं आकाश तथा उससे भी परे अहंकार आवरणों का भेदन कर देता है। किन्तु अहंकार से परे २ तत्व महान एवं प्रकृति अवशिष्ट रह जाते हैं। इन दोनों में भी प्रमुख प्रकृति या माया है। यह प्रकृति केवल भक्ति से ही समाप्त की जा सकती है।
भक्ति शतक (दोहा - 62)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)
खंभ - मणि विहरत सुंदर श्याम |
लखि प्रतिबिंब खंभ – मणि छिन – छिन, किलकत अति अभिराम |
कबहुँ दिखावत दशन मगन मन, रसनहिं कबहुँ ललाम |
कबहुँ दिखावत निज कर अँगुरिन, ‘गूँ गूँ’ करि सुखधाम |
कबहुँक खीझि मार कर ते हरि, कबहुँक मारत पाम |
इमि ‘कृपालु’ रीझत खीझत हरि, रिझवत यशुमति भाम ||

भावार्थ – श्यामसुन्दर मणिमण्डित खंभ के पास विहार कर रहे हैं | वे उन मणिमण्डित खंभों में अपनी परछाई देखकर बार – बार मधुर किलकारी मारते हैं | कभी तो अपनी ही परछाई को, दूसरा बालक समझकर, आनन्द में विभोर होकर, अपने दाँत दिखाते हुए चिढ़ाते हैं | कभी इसी प्रकार जिह्वा दिखाते हैं | कभी “गूँ गूँ” ऐसी मधुर ध्वनि करते हुए हाथों की अँगुलियाँ दिखाते हैं एवं कभी अपने ही समान सभी संकेत करते हुए देख कर, मणिखम्भ में हाथ से मारते हैं तथा कभी पैर से भी मारते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ के मतानुसार इस प्रकार रीझते – खीझते हुए, बड़भागिनी यशोदा मैया को रिझा रहे हैं |
( प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण – बाल लीला – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
प्रथम नमन गुरुवर पुनि गिरिधर, जोई श्री गुरुवर सोई श्री गिरिधर।
हरि गुरु कृपा सदा सब ही पर, अंत:करण पात्र पावन कर।
करहु 'कृपालु' कृपा मोहूँ पर, तन मन धन अर्पन चरनन पर।।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के श्री चरणों में कोटि-कोटि नमन।

Don’t be lazy and careless. You already know what is the goal of your life and How you can attain it? Why are you wasting your life by being so careless? You were more careful as a student to pass the material exam to get a material degree?
What about the soul and the exam of life? Why do you pay no heed to spiritual progress and Sadhana? Take the exam of life seriously at least in this life. You have been failing this exam since eternity, at least make a true attempt to pass in in this life time. Once you are God-realized you will be freed from all the other exams that you have been passing even though you may have to give it.
..........SHRI MAHARAJJI.

श्री महाराजजी से साधक का प्रश्न: बहुत से लोग कहते हैं कि यहाँ (गुरुधाम) में आने पर दिव्य अनुभव होते हैं। वह अनुभव अगर हमको देर से आते हैं तो क्या वह चिंता का विषय है?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर: अरे! अनुभव कुछ नहीं,कोई अनुभव खास important नहीं। सबका अनुभव बस यही होना चाहिए कि संसार से प्यार कम हो और गुरु के प्रति भगवान के प्रति प्यार बढ़े--बस यही अनुभव सबसे बड़ा पैमाना है। बाकी अनुभव की चिंता न करो कोई। वह अनुभव तो अंत में होगा,अभी अनुभव कहाँ धरा है?
संसारी मायिक विकार कम हो रहे हैं कि नहीं, हम छोटी-छोटी बात को बहुत फील करते थे,अब बड़ी बात को भी फील कम करते हैं----यह अहंकार कम हुआ इसका मतलब यह हुआ। यह सब हमारा पैमाना है,इससे हम अपने को परखते रहें,और जहां fail हो जाएँ,वहाँ हम फील करें कि भविष्य में fail नहीं होंगे,हम मुक़ाबला करेंगे। हर समय सावधान रहना चाहिए और daily reading चाहिए अपने daily work की, कि आज हमने कहाँ-कहाँ क्रोध किया,क्यों किया? बिना क्रोध के भी तो काम चल सकता था। acting में क्रोध कर देते fact में क्यों किया? इस प्रकार reading होनी चाहिए daily ताकि दूसरे दिन फिर गड़बड़ी कम हो।

जिन जीवों ने 'गुरु एवं भगवान' के श्री चरणों में अपना सर्वस्व आत्मसमर्पण कर दिया बस उन्ही का जीवन 'जीवन है' और शेष सब 'मृतक' हैं।
............श्री महाराजजी।

अचंभो वीर ! अहीर निहार |
बह अनुकूल धार सब पै हौं, बहि गइ उलटी धार |
जाति रही पनघट सिर धरि घट, घूँघट – पट मुख डार |
मंजुल – कुंज – लतान छेड़ दइ, तान मुरलि रिझवार |
मुरलि – तान सुनि कान, बही हौं, गइ ढिंग नंदकुमार |
मुरलिहिं धार ‘कृपालु’ शिवहुँ बहि, आये रास मझार ||

भावार्थ – अरी सखी ! अहीर के छोरा नन्दकुमार का आश्चर्यमय कार्य देख | संसार में कोई भी वस्तु नदी की अनुकूल – धारा में ही बहती है किन्तु मैं तो उल्टी धार में बह गयी | अरी सखी ! घूँघट – पट से मुख ढाँक कर, सिर पर घड़ा रखकर, बड़ी सावधानी से नटखट की आँखों से बचकर, पनघट जा रही थी | इतने में ही उस छलिया ने लताओं की ओट में छिपकर मुरली की तान छेड़ दी | मुरली की तान की धारा कान में पड़ते ही मैं परवश होकर मुरली मनोहर के पास जा पहुँची, और बंटाढार हो गया | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – अरी सखी ! तू तो थोड़ी ही दूर बहकर गयी किन्तु इस मुरली की धारा में बह कर भगवान् शंकर कैलाश – पर्वत से रास – मण्डल में आ गये थे |
( प्रेम रस मदिर श्रीकृष्ण – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...