यदि
कभी कोई जीव हमारे प्यारे श्री महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज)
से गुरुमंत्र के लिए प्रेमाग्रह करता है तो मुसकुराते हुए जवाब देते हैं।
हमारे विषय में तो सब जानते ही हैं कि ना चेला बनाता है, और ना बनाने देता
हैं। हमारे खिलाफ़ है सारे बाबा लोग, चाहे वो कोई भी हो। इसलिए मेरे पास कोई
मंत्र लेने के लिये सोचना भी नहीं। मुझे अपना बनाना है तो- सदा सर्वत्र हर
श्वास के साथ 'राधा' नाम का जप करो।
This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Thursday, September 11, 2014
यह
तो संसार है इसमे सब कुछ कहने वाले लोग हैं ,सही भी,गलत भी। फिर गलत कहने
वाले तो 99 परसेंट(percent) हैं, सत्वगुणी बुद्धि हुई तो सत्व गुणी बात
कहने लगे, रजोगुणी बुद्धि हुई तो हमारा निर्णय रजोगुणी हो गया, तमोगुणी
बुद्धि हुई तो एक दम से तमोगुण बात बोलने लगे। इसलिये जब हमारी स्वयं की
बुद्धि ही एक सी नहीं रहती तो दूसरों से हम क्यों आशा करते हैं कि वह हमारी
बात का समर्थन ही करेगा। ये कभी सतयुग में नहीं हुआ,त्रेतायुग में नहीं
हुआ,द्वापर में नहीं हुआ,फ़िर आज क्यों होगा? सारे संतों ने इसलिए लिखा "तुम
किसी की और मत देखो न किसी की सुनों बस,अपना काम करो।"
............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
श्री महाराजजी से प्रश्न:
संसार में और भगवत क्षेत्र में हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर:
भगवान से प्यार न करने के कारण आत्मशक्ति गिर गयी है इसलिए हृदय कठोर नहीं रह सकता संसार में,पिघल जाता है। यह दोष है। तो जितना भगवान की और पिघले उतना इधर कठोर हो। ऐसा balance होना चाहिए। संसार अलग है भगवान अलग है। दोनों में अलग-अलग हिसाब किताब है। चालाकी होनी चाहिए; संसार में कोई सिर काट के चरणों में रख दे तो भी यह न समझो कि यह हमारे सुख के लिए ऐसा कर रहा है। संसार में अपने स्वार्थ के लिए ही सब लोग काम करते हैं,यह सिद्धान्त को सदा याद रखो और जब भगवान के area में जा रहे हो तो वहाँ complete surrender करो। वहाँ बुद्धि लगाया कि बरबाद हुए। बड़े बड़े सरस्वती व्रहस्पति का सर्वनाश हो गया,साधारण जीव कि क्या गिनती है? तो दोनों एरिया अलग अलग हैं,अलग अलग सिद्धान्त है,अलग अलग प्रक्रियाएँ हैं।
संसार में और भगवत क्षेत्र में हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर:
भगवान से प्यार न करने के कारण आत्मशक्ति गिर गयी है इसलिए हृदय कठोर नहीं रह सकता संसार में,पिघल जाता है। यह दोष है। तो जितना भगवान की और पिघले उतना इधर कठोर हो। ऐसा balance होना चाहिए। संसार अलग है भगवान अलग है। दोनों में अलग-अलग हिसाब किताब है। चालाकी होनी चाहिए; संसार में कोई सिर काट के चरणों में रख दे तो भी यह न समझो कि यह हमारे सुख के लिए ऐसा कर रहा है। संसार में अपने स्वार्थ के लिए ही सब लोग काम करते हैं,यह सिद्धान्त को सदा याद रखो और जब भगवान के area में जा रहे हो तो वहाँ complete surrender करो। वहाँ बुद्धि लगाया कि बरबाद हुए। बड़े बड़े सरस्वती व्रहस्पति का सर्वनाश हो गया,साधारण जीव कि क्या गिनती है? तो दोनों एरिया अलग अलग हैं,अलग अलग सिद्धान्त है,अलग अलग प्रक्रियाएँ हैं।
Monday, August 11, 2014
Out
of 8,400,000 varieties of living beings, humans are the only children
of God who have been granted the privilege of performing fruit-bearing
actions. Since you cannot undo what you have done already, stop crying
over destiny and focus instead on the actions you are free to perform in
this life, for they will be called your destiny in the future.
You have tremendous power. All other creatures, including heavenly gods, envy what you have: the power to create your own destiny.
..........SHRI MAHARAJJI.
You have tremendous power. All other creatures, including heavenly gods, envy what you have: the power to create your own destiny.
..........SHRI MAHARAJJI.
लगी री मोहिं, श्याम – दृगन की चोट |
पलक न हाय ! पलक – दृग लागत, भये पलक ते ओट |
व्याकुल बिनु अपराध प्रान भये, कीन दृगन ने खोट |
मिल्यो जाय अब मनहुँ दृगन सों, तोरि कानि – कुल – कोट |
अब हौं विलपति प्रति कुंजन, उर, धरे विरह की पोट |
तितनोइ खोट ‘कृपालु’ नंद को, ढोटा, जितनोइ छोट ||
पलक न हाय ! पलक – दृग लागत, भये पलक ते ओट |
व्याकुल बिनु अपराध प्रान भये, कीन दृगन ने खोट |
मिल्यो जाय अब मनहुँ दृगन सों, तोरि कानि – कुल – कोट |
अब हौं विलपति प्रति कुंजन, उर, धरे विरह की पोट |
तितनोइ खोट ‘कृपालु’ नंद को, ढोटा, जितनोइ छोट ||
भावार्थ – एक विरहिणी कहती है कि मुझे श्यामसुन्दर की आँखों की चोट
ने घायल कर दिया है | अब उनके पलकों से ओट होते ही एक क्षण को भी चैन नहीं
पड़ता एवं आँखों की नींद भी चली गयी | यद्यपि लड़कपन या उद्दण्डता मेरी
आँखों ने ही की थी, मेरे प्राणों का कोई भी दोष नहीं था | फिर भी ‘और करे
अपराध कोउ और पाव फलभोग’ के अनुसार अब प्राण भी अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं
| मन ने भी प्राणों से विश्वासघात किया एवं वंश परम्परा के मर्यादा – रूपी
किले को तोड़कर आँखों से जा मिला | अब मैं हृदय में विरह का बोझ लिए हुए
एवं प्रत्येक कुंज में प्यारे श्यामसुन्दर से मिलन के लिए विलाप करती हुई
भटक रही हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हाय ! हाय !! यह नन्द ढोटा
जितना ही छोटा है उतना ही खोटा भी है |
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






