This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Thursday, October 6, 2016
वारी – वारी छवि, वारी नथवारी की |
लखि श्रृंगार लजत श्रृंगारहुँ, छवि – छवि छवि अस प्यारी की |
मणिन – अलंकृत कनक मुकुट पर, लर – मुक्तन मनहारी की |
घूँघर – वारी अति अनियारी, छवि प्यारी लट कारी की |
अम्बर नील गौर – तनु छवि जनु, घन दामिनि अनुहारी की |
झुकि झूमति नासा नथ – बेसर, मुख चूमनि छवि न्यारी की |
कर मेहँदी, पग रची मिहावरि, सिर सेंदुर अरुणारी की |
कनकन कंकन किंकिनि नूपुर, धुनि चूरिन झनकारी की |
छिनहिं मान, मुसकान छिनहिं पुनि, छवि बरसाने – वारी की |
कह ‘कृपालु’ इक चितवनि महँ गति, लखत बनत बनवारी की ||
लखि श्रृंगार लजत श्रृंगारहुँ, छवि – छवि छवि अस प्यारी की |
मणिन – अलंकृत कनक मुकुट पर, लर – मुक्तन मनहारी की |
घूँघर – वारी अति अनियारी, छवि प्यारी लट कारी की |
अम्बर नील गौर – तनु छवि जनु, घन दामिनि अनुहारी की |
झुकि झूमति नासा नथ – बेसर, मुख चूमनि छवि न्यारी की |
कर मेहँदी, पग रची मिहावरि, सिर सेंदुर अरुणारी की |
कनकन कंकन किंकिनि नूपुर, धुनि चूरिन झनकारी की |
छिनहिं मान, मुसकान छिनहिं पुनि, छवि बरसाने – वारी की |
कह ‘कृपालु’ इक चितवनि महँ गति, लखत बनत बनवारी की ||
भावार्थ – नथवारी वृषभानुदुलारी की उस मनोहारी छवि पर मैं वारी –
वारी जाता हूँ | किशोरी जी के श्रृंगार को देखकर साक्षात् श्रृंगार भी
लज्जित होता है एवं किशोरी जी की छवि को देखकर साक्षात् छवि भी लज्जित
होती है | मणि – मण्डित स्वर्ण के मुकुट पर मोतियों की लड़ों का श्रृंगार
नितांत मनोहारी है | किशोरी जी की घुँघराली, काली एवं घनी लटें अत्यन्त ही
प्यारी हैं | किशोरी जी के गौर शरीर पर नीलाम्बर ऐसा सुशोभित है मानो बादल
एवं बिजली का संयोग हो रहा हो | नासिका में पहनी हुई नथ एवं बेसर झुक –
झुककर झूमती हुई बार – बार मुख चूम रही है | हाथ में लाल मेहँदी, चरणों में
लाल मिहावर, एवं सिर पर लाल सिन्दूर की छवि तो देखते ही बनती हैं | सुवर्ण
के कंकण, सुवर्ण की किंकिणी, सुवर्ण के नूपुर एवं चूड़ियों की झनकार बरबस
मन को मुग्ध कर लेती है | बरसाने वाली की वह छवि सर्वथा अनुपमेय है, जब वह
एक क्षण में तो मान कर लेती हैं तथा दूसरे ही क्षण मुस्कुरा देती हैं |
‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं मुझे तो सबसे बढ़िया छवि श्यामसुन्दर की तब लगती
है जब किशोरी जी एक बार घूमकर उन पर कटाक्षपात कर देती हैं |
( प्रेम रस मदिरा रसिया – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
( प्रेम रस मदिरा रसिया – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
सर्वप्रथम
यह विचार कीजिये कि संसार के किसी भी पदार्थ में आनन्द नहीं है। आप कहेंगे
कि हम लोगों को जब धन, पुत्र, स्त्री, पति आदि में आनन्द मिलता है तब
हमारी बुद्धि यह कैसे मान ले कि संसार में आनन्द नहीं है ? किन्तु
गम्भीरता-पूर्वक विचार करने पर बुद्धि अपना निश्चय बदल देगी। अच्छा यह
बताइये कि वह कौन सी वस्तु है जिसमें आनन्द है? यदि किसी एक वस्तु में
आनन्द होता तो एक तो वह आनन्द सबको मिलता, दूसरे उस आनन्द का वियोग न होता
अर्थात् उस पर दुःख का अधिकार न हो पाता। किन्तु ये दोनों ही बातें
किसी पदार्थ से सिद्ध नहीं होतीं। यथा, मदिरा को ही ले लीजिये। मदिरा के
नाम से एक घोर पियक्कड़ शराबी को आनन्द मिलता है, पुनः पीने से तो मिलता ही
होगा किन्तु उसी मदिरा से एक धर्मात्मा पंडित को महान अशान्ति होती है।
यदि खाने के साथ शराबी के आगे शराब रख दी जाय तो वह बहुत खुश होगा जबकि वह
कर्मकांडी पंडित बहुत दुःखी होगा। तो शराब में शराबी के अनुभव में आने वाला
सुख है या पंडित जी के अनुभव में आने वाला दुःख है ? यदि आप कहें कि पंडित
जी ने शराब को पिया नहीं, देखकर ही अशान्त हो रहे हैं, यदि पीते तो उन्हें
भी शराबी की भाँति आनन्द ही मिलता, तो यह कहना भ्रान्तिजनक है, क्योंकि
यदि पंडित जी को शराब पिला दी जाय तो उल्टी हो जायगी और शायद धर्म के नाते
जीवन भर दुःखी रहेंगे।
प्रेम रस सिद्धान्त,
रचयिता- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
संस्करण 2010, अध्याय 3: आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप, पृ. 58
रचयिता- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
संस्करण 2010, अध्याय 3: आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप, पृ. 58
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