Friday, November 24, 2017

जगद्गुरु स्वामी श्री कृपालु जी महाराज हम अधमों को समझाते हैं....!!!
।।...भगवान् की कृपा देखो कि उसने कृपा करके मानव देह दिया, मन में भगवत जिज्ञासा दी, महापुरुष से मिलाया, इन कृपाओं को हम महसूस करें तो हमारा हृदय पत्थर न बना रहे, पिघल जाय...।।
।।...अपने को अधम पतित मानकर मनुहार करो और आँसू बहाकर भगवान् के निष्काम प्रेम की कामना करो। संसार न मांगो। तब भगवान् महापुरुष के द्वारा अपना दिव्य स्वरुप दिखायेंगे...।।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज ने आज तक किसी को मन्त्रदान नहीं दिया।
अमेरिका में एक बहुत बड़े पादरी(POP) ने महाराजजी से प्रश्न किया की आपके कितने लाख शिष्य है ? तो महाराजजी का जवाब सुनकर वो पादरी आश्चर्य चकित हो गये जब श्री महाराजजी ने मुस्कुराते हुये जवाब दिया - एक भी नहीं। उस पादरी ने पुनः प्रश्न किया- आप वर्तमान मूल ओरिजिनल जगद्गुरु हैं और आप का एक भी शिष्य नहीं ? क्या आप कान नहीं फूँकते ? जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज ने उत्तर दिया- नहीं, मैं कान नही फूँकता। बल्कि कान फूँकने वालो की बुराई करता हूँ। इसलिये हमारे खिलाफ हो गये है सारे बाबा लोग की ये खुद भी शिष्य नहीं बनाते न किसी को बनाने देते हैं।
इस धराधाम पर अनन्त बार श्रीहरि के अवतार हुये परन्तु अपने मन के दोष के कारण यह जीव कभी उनकी कृपा का पात्र नहीं बन सका ! ब्रह्म श्रीकृष्ण को भी यहाँ चोर - जार की उपाधि से विभूषित किया गया ! श्रीकृष्ण के अवतार काल में मिथ्या वासुदेव भी था जिसने दो नकली भुजाएं लगा ली थीं ! उनके श्रीकृष्ण के पास संदेश भेजा था कि असली वासुदेव मैं हूँ , तुम नहीं हो !
..........श्री महाराज जी।

एक साधक का प्रश्न - शरणागति का क्या अर्थ है ?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर - हमें भगवान् की शरणागति करनी है शरणागति का मतलब है कुछ न करना लेकिन अनादिकाल से हम सब कुछ करने के अभ्यस्त है ― इसलिये कुछ न करने की अवस्था पर आने के लिये हमे बहुत कुछ करना है इसी का नाम 'साधना' है । जो भगवान् का दर्शन आदि मिलता है वह सब उसी की शक्ति ही से मिलता है ।
एक साधक का श्री महाराजजी से प्रश्न - जगत् की कामनाओं को ईश्वरीय कामनाओं में कैसे बदलें ?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर - कामनायें प्रमुख रूप से पाँच प्रकार की होती हैं । पाँचों ज्ञानेन्द्रियों की कामनायें ― कान का शब्द, आँख का रूप, नासिका की गन्ध ,रसना का रस और त्वचा का स्पर्श ― तो ये पाँचो कामनायें यदि जगत् सम्बन्धी हैं, संसार सम्बन्धी हैं तो संसार से अटैचमेन्ट बढ़ेगा । इससे मन और गन्दा होगा तथा भक्ति में ये बाधक हैं । अगर यही पाँच कामनायें श्री कृष्ण सम्बन्धी हो जायें । उनके देखने की इच्छा, उनके शब्द सुनने की इच्छा, उनके स्पर्श पाने की इच्छा हो तो अन्त:करण शुद्ध होगा क्योंकि भगवान् शुद्ध को भी शुद्ध करने वाला परम शुद्ध है । बार बार भगवान् के नाम, रूप, लीला, गुण, धाम, जन का संकीर्तन करने से जगत् की कामनायें ईश्वरीय कामना में बदल जायेंगी ।
राधे - राधे ।

Monday, November 13, 2017

मन का एक काम है स्मरण , चिन्तन । और ऐसा मन हमको भगवान् ने दिया है कि जो सदा वर्क करता है । एक सैकंड को पैंडिंग में नहीं रह सकता । वह कर्म करेगा । अच्छा करे , बुरा करे या अच्छे बुरे से परे वाला कर्म भगवद् विषयक भक्ति करे । तीन ही कर्म तो होंगें । बुरा कर्म करेगा पाप कर्म करेगा , तो नरक जायेगा । पुण्य कर्म करेगा , अच्छा कर्म करेगा तो स्वर्ग जायगा और अच्छा बुरा दोनों छोड़ कर श्रीकृष्ण की भक्ति करेगा तो भगवान् के लोक को जायेगा । चौथी कोई चीज नहीं है ।

---- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

बलिहार युगल सरकार, हमरिहुँ ओर निहार ।
तुम कर नित पर उपकार, हम मानत नहिँ आभार l
तुम मम 'कृपालु' आधार, हम जानत नाहिँ गमार।।

----- श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...