#प्रेम_तत्व की सार #मादन स्वरुपा #रासेश्वरी श्री #राधारानी ही #सर्वश्रेष्ठ #तत्व है । #श्रीकृष्णजिसकी #आराधना करें, उस तत्व का नाम #राधा #तत्व है । जिसकी चरण-धूलि ब्रह्म श्री कृष्ण अपने सिर पर धारण करते हैं, जिसके अंक में लेटे हुये श्री कृष्ण #गोलोक को भूल जाते हैं, ऐसी सत्ता का नाम है-'#राधा', जिसकी अंश है- ब्रह्माणी, शिवानी, कमला आदि॥
This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Thursday, July 19, 2018
मन भावन सावन आय रे।
घनन घनन घन गरजि तरजि सखि! मोहिं विरहिनि डरपाय रे।
चम चम चम चम चमकि चमकि जनु, चपला मोहिं चिढ़ाय रे।
पिउ पिउ कहि पापी पपिहा सखि! जनु मोहिं जरिहिं जराय रे।
कोकिल कूकि कूकि कलकंठहिं, जनु कटु वचन सुनाय रे।
नाचि नाचि चहुँ ओर मोर गन, जनु तनु सुधि बिसराय रे।
जो ‘कृपालु’ पिय आय जाँय तो, जाँय सबै खिसियाय रे।।
घनन घनन घन गरजि तरजि सखि! मोहिं विरहिनि डरपाय रे।
चम चम चम चम चमकि चमकि जनु, चपला मोहिं चिढ़ाय रे।
पिउ पिउ कहि पापी पपिहा सखि! जनु मोहिं जरिहिं जराय रे।
कोकिल कूकि कूकि कलकंठहिं, जनु कटु वचन सुनाय रे।
नाचि नाचि चहुँ ओर मोर गन, जनु तनु सुधि बिसराय रे।
जो ‘कृपालु’ पिय आय जाँय तो, जाँय सबै खिसियाय रे।।
भावार्थ:–एक विरहिणी सखी कहती है कि मन को लुभाने वाला सावन का महीना आ गया, किन्तु प्रियतम नहीं आये। सखी! देख तो, बादल गरज–गरजकर मुझ विरहिणी को डरा रहे हैं। बिजली चमक–चमककर मानो मुझे चिढ़ा रही है। पापी पपीहा ‘पिउ पिउ’ कह–कहकर मानो मुझ जली को और जला रहा है। कोयल मधुर ध्वनि से कूक–कूककर मानो व्यंग्य वचन सुना रही है। चारों ओर मोरगण नाच–नाचकर मानो मेरी सुधि–बुधि भुला रहे हैं। ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में सखी कहती है कि अगर ऐसे समय में प्रियतम आ जायँ तो सब के सब खिसिया जायँ।
(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
ऐ मन! भूत को भूल वो माफ़ हो जायेगा, उसको बैठ कर मत सोच कि मैंने यह पाप किया, मैंने ये जो किया सो किया, भूल जा, वर्तमान को देख। एक ही मन है दो नहीं है। अगर भूत का चिंतन करेगा, गंदी-गंदी बातें जो तुमने पाप की, की हैं तो फिर मन गंदा होता जायेगा। उसको भूल जा और वर्तमान में, मन में हरि गुरु को ही ला, शुद्ध कर दे मन। मन शुद्ध हो जायेगा, तो फ़िर गुरु दिव्य बना देगा स्वरूप शक्ति से। तब फ़िर लक्ष्य की प्राप्ति हो जायेगी। भूत भविष्य सब बन जायेगा।
Tuesday, June 26, 2018
कामना ' प्रेम ' का विरोधी तत्व है । लेने - देने का नाम व्यापार है । जिसमें #प्रेमास्पद से कुछ #याचना की भावना हो , वह प्रेम नहीं है । जिसमें सब कुछ देने पर भी तृप्ति न हो , वही प्रेम है । संसार में कोई व्यक्ति किसी से इसलिये प्रेम नहीं कर सकता क्योंकि प्रत्येक #जीव#स्वार्थी है वह #आनन्द चाहता है , अस्तु लेने - लेने की भावना रखता है । जब दोनों पक्ष लेने- लेने की घात में हैं तो मैत्री कितने क्षण चलेगी ? तभी तो स्त्री - पति , बाप - बेटे में दिन में दस बार टक्कर हो जाती है । जहाँ दोनों लेने - लेने के चक्कर में हैं , वहाँ टक्कर होना स्वाभाविक ही है और जहाँ टक्कर हुई , वहीं वह नाटकीय #स्वार्थजन्य प्रेम समाप्त हो जाता है । वास्तव में #कामनायुक्त प्रेम प्रतिक्षण घटमान होता है ,जबकि - #दिव्य #प्रेम प्रतिक्षण वर्द्धमान होता है । #कामना #अन्धकार - #स्वरुप है , #प्रेम - #प्रकाश #स्वरुप है ।
Let us reflect on the questions, "Who am I?" and, "Is it personal happiness that I seek or the happiness of others?" The answer will be "I do not know who I am, but I do know that I only desire my own happiness." Now if you were a material being, then you would have attained happiness from material objects, But being a part of #God, you can be truly happy only after attaining #Divine #Bliss. This is logically acceptable and has been proved by our own experience since eternity. If, being divine souls, we could have attained true happiness through material objects, then we would have never been unhappy, dissatisfied or miserable because we have attained material happiness in varying degrees throughout our innumerable past lives. This is a definite proof of the fact that we are divine souls and not material beings, because material things have never really satisfied us.
Excerpt from the book "#Prem #Ras #Siddhanta" #Philosophy of #Divine #Love by ---- #JAGADGURU_SHRI_KRIPALU_JI_MAHARAJ.
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






