Saturday, August 11, 2018

सुनी इन, कानन जब ते तान।
तब ते बिसरि गई सुधि सिगरी, कान करैं सखि! का न?।
अब सो तान सुरीली मुरलिहिं, छुटत न कैसेहुँ ध्यान।
अब सो ध्यान जरावत हमरो, सिगरो तन, मन, प्रान।
अब सो प्रान पयान करन चह, रह्यो न कछु मोहिं भान।
अब ‘कृपालु’ सोइ भान रहत इक, सुनहुँ तान नहिं आन।।
भावार्थ:– एक विरहिणी कहती है कि अरी सखी! जब से इन कानों ने श्यामसुन्दर की सुरीली तान सुनी है तब से मुझे कोई सुधि नहीं है। ये कान जो न करें वह थोड़ा है। अरी सखी! अब तो उस मुरली की तान का ध्यान एक क्षण के लिए भी नहीं हटता एवं तान का ध्यान रहने के कारण विरह में मेरा तन, मन, प्रान सभी जल रहा है और कहाँ तक कहूँ अब मेरा प्राण निकलना चाहता है। मुझे कुछ भी होश नहीं है। ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में मुझे एक ही होश है कि वह तान फिर कब सुनूँ।
(प्रेम रस मदिरा:-विरह–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।
हमारो राधावल्लभ प्रान।
कोटिन प्रान वारि दउँ लखि सखि! नेकु मंद मुसकान।
चितवनि चपल लखत अपलक दृग, कलप पलक सम मान।
झूमत मुकुट लटनि मुख चूमति, घूमति भृकुटि कमान।
लकुटिहिं लपट पीतपट अटपट, काछनि नट उनमान।
सो ‘कृपालु’ रस को बखान जब, टेरत मुरलिहिं तान।।
भावार्थ:– श्री राधावल्लभ जी हमारे प्राणों के भी प्राण हैं। उनकी थोड़ी सी मधुर मुस्कान पर मैं अपने अनन्त प्राण न्यौछावर करती हूँ। उनकी रसभरी चंचल चितवन को निर्निमेष दृष्टि से देखते हुए इतना रस पाती हूँ कि एक कल्प भी एक क्षण के समान प्रतीत होता है। मतवाली चाल के कारण मोर मुकुट का झोंके खाना, घुँघराली लटों का मुख चूमना एवं भौहों का अटपटे ढंग से घूमना देखते ही बनता है। अटपटे ढंग से लकुटी पर लिपटा हुआ पीत पट एवं नट के समान कछी हुई काछनी अनुपमेय है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं–जब वे राधावल्लभ रसभरी मुरली की तान छेड़ते हैं तब जो रस बरसता है, वह पीते ही बनता है, शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

(प्रेम रस मदिरा:- श्रीकृष्ण–माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित:-राधा गोविन्द समिति।

कुत्ता जब हड्डी चबाता है तो चबाते चबाते उसके ही मुँह से खून निकलने लगता है । कुत्ता सोचता है हड्डी से खून निकल रहा है और चबाता जाता है। ऐसे ही हम लोग हैं बार बार संसार वालों से जूते चप्पल खाते हैं और फिर वहीं आनंद ढूँढते हैं । उसी बाप से उसी बीवी से कहते हैं कि तुम स्वार्थी हो और फिर यह उम्मीद करते हैं कि वो हमारा सुख चाहेगा और हमें आनंद दे देगा। वो कहाँ से दे देगा वो तो तुमसे सुख चाहता है।

अनुब्रजाम्य्हम नित्यं पूयेयेत्यंघ्रिरेणुभिः। (भागवत 11-14-16)
भगवान पीछे पीछे चलता है भक्तों के, कि उनकी चरण धूलि उड़कर मेरे ऊपर पड़े और मैं पवित्र हो जाऊं। उन चरणों पर आज मुझ अभागे का मस्तक पड़ रहा है। अनंत पाप किये हुए एक नगण्य जीव का, कितना बड़ा सौभाग्य है हमारा !! तो उन चरणों पर अगर सिर को झुका दें, छू लें उन चरणों को फिर वो होश में रहेगा नहीं। उसने समझा ही नहीं उन चरणों का क्या महत्त्व है? हाँ, ठीक है, सब छू रहे हैं तो अपन भी पटक दो। वन परसेंट, टू परसेंट, टेन परसेंट कुछ भावना होगी आप लोगों की, लेकिन प्रणाम माने सेंट परसेंट भावना, बुद्धि का सरेंडर, बुद्धि को दे देना गुरु के चरणों में, इसी का नाम ''शरणागति'' है। यही वास्तविक प्रणाम है........।।
-------जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज।


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Many people approach Saints and ask to be blessed. They feel that all the Saint has to do is to place his hand on their head, and they will become enlightened. Consequently, there is no shortage of impostors who prey on such naive people. It is all a matter of supply and demand.
Please think! To be successful at anything, you have to first practice. Whether it is a ballerina, an opera singer, an expert typist, a tightrope walker in the circus or a professional singer or musician, the same rule applies for all: practice makes perfect. You cannot buy expertise or purchase talent. In the same way, you cannot be given enlightenment - you have to earn it.


कृष्णमेन मवेहि त्वमात्मानं सर्वदेहिनाम ( भागवत)
उन परमात्मा श्री कृष्ण की आत्मा एकमात्र वृषभानुनंदिनी राधा हैं।
आत्मा तु राधिका तस्य (स्कंद पुराण)
अतएव समस्त #प्राणी #एकमात्र श्रीकृष्ण के दास हैं। ऐसे ही श्री कृष्ण भी #श्रीराधा जी के दास हैं। यद्यपि #सिद्धांततः #राधा_कृष्ण एक ही हैं। #भावार्थ यह कि समस्त #जीवों के #आराध्य राधाकृष्ण ही हैं। यही सबका #लक्ष्य है।
-----तुम्हारा #जगद्गुरु#कृपालु:
The world is nothing but a stage where the selfish game of self-interest is being enacted. Each player plays his role according to his intellectual ability. But until we understand where our true self-interest lies, that is, until there is a firm decision that the material world is to be renounced, our ultimate purpose or aim will not be fulfilled. In the world, everyone is wandering around for the fulfilment of their aim of perfect happiness. If an expert, a Saint tells us that the path to attain this goal is not here but in the opposite direction, then we will surrender to God and attain that Supreme Bliss. But those who don’t surrender and continue to love the material world as they have done in countless past lives remain bound.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...