Sunday, March 5, 2017

अपने गुरु के ही बताये मार्ग का निरंतर चिंतन, मनन एवं परिपालन करना चाहिये तथा अन्य मार्गावलम्बी साधकों की साधना पर दुर्भाव नहीं करना चाहिये। यह समझ लेना चाहिये कि सभी की साधनायें ठीक हैं । जिसके लिये जो अनुकूल है, वह वही करता है । हमें इस उधेड़बुन से क्या मतलब।
------ जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।


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मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...