Saturday, September 17, 2011


संत एवं श्यामा श्याम सदा हमारी रक्षा करते हैं। सदा हमारे प्रत्येक संकल्प को नोट करते हैं, सदा सर्वत्त्र बार-बार अनुभव करने का अभ्यास करो। यह कल्पना नहीं सत्य है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज.
संसार संबंधी सभी विषयों में बार-बार आनंदाभाव का चिंतन करो।


संसार संबंधी विषयवर्धक पद्धार्थों से भी यथासम्भव दूर ही रहो।

मानवदेह का सर्वाधिक महत्व सोचकर एक-एक क्षण मूल्यवान मानो, एवं अनावश्यक समय का अपव्यय ना करो।

संत और श्यामा-श्याम हमारे हो चुके, ऐसा बार-बार विश्वास दृढ़ करो, तथा हम भी संत एवं श्यामा-श्याम के हो चुके, ऐसा बार-बार निश्चय करो।

रूपध्यान पर सबसे अधिक ध्यान दो।

--------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.










 

Friday, September 16, 2011

तुम लोगों में दीनता और सहनशीलता नाम की चीज नहीं है । किसी ने कुछ कह दिया तो उसकी फीलिंग,चिंतन,मनन करते रहते हों। यह सब तुममे जो अहंकार भरा पड़ा है उसी वजह से है। वह तुम्हें दीन नहीं बनने देता जबकि तुम्हें तो तृण से भी अधिक दीन बनना है ।
-------श्री महाराजजी.

शास्त्रों, वेदों, और महापुरुषों की वाणी के विरुद्ध जब कभी बुद्धि का फैसला हो तो यह सोचते रहना चाहिए की शास्त्र और महापुरुष गलत नहीं हो सकते ,हम ही गलत हैं।
-------श्री महाराजजी .
जीवन में जितना अधिक सिम्पल रहोगे उतने ही शांत रहोगे । सादा(सिम्पल) रहकर अगर तुम आधा घंटा भी साधना करोगे तो भगवान में मन अधिक लगेगा । सदैव यह सोचो कि तुम्हारे गुरु को तुम्हें सादा रहते देखने में ही प्रससनता होती है।
---------श्री महाराजजी .
तुम लोगों के अंदर में ऐसा बैठ गया हूँ कि तुम लोग कितना ही प्रयत्न करो,घूम फिर कर आओगे यहीं । फिर बेकार चिंतन क्यो करते हो ? अगर तुम कहो कि आप अंदर बैठे हैं ,दीखते तो नहीं ? बाहरी दृष्टि में आना बहुत छोटी चीज है किन्तु अंदर बैठ जाना बहुत बड़ी बात है। यह आवश्यक नहीं कि जो माँ अपने बच्चे को बहुत प्यार करती हो और बच्चा उसे प्रतिक्षण देखता हो।
-------श्री महाराजजी के मुखारविंद से......................
गुरु के आदेशों में उचित-अनुचित का विचार करना ही भयंकर पाप है।
------श्री महाराजजी.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...