Friday, September 7, 2012


सदा गुरु की आज्ञा ही मानो सब आज्ञा काट के। ईश्वरीय जगत में हर काम मनसा(मन का) से ही नोट होता है, work देखा ही नहीं जाता। हमारा idea जहाँ आया वहाँ गड़बड़ हुआ।

कभी यह ना सोचो कि कृपा की कमी है। कमी जो है वह हममे ही है। महापुरुष शरणागत के लिये क्या-क्या भगीरथ प्रयत्न करता है, यह तो भगवतप्राप्ति होने पर ही साधक को समझ में आ सकता है। सब लोग कमरा बंद करके सोचे तो पायेंगे कि मेरा कितना कायापलट हो गया? में कहाँ जा रहा था,कहाँ लाकर खड़ा कर दिया महाराजजी ने?


The Rig Ved says this. "Oh, human beings, learn to cry! Shed tears and call out to Him - that's it! He will be standing before you."

..........Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.


श्री महाराजजी के मुखारविंद से: तुम लोगो को मै कितना उठाता हूं पर तुम लोग नामापराध करके सब बराबर कर देते हो। मै तुम्हारे अपराधों को देखता हूं फिर भी तुम लोगो से कहने में डर लगता है। सोचता हू, अभी इतने चल रहे हो ,अगर कह दूँगा तो सत्संग भी छोड़ दोगे। मै माफ करना जानता हूँ,सोचता हू , कभी तो अक्ल आएगी तो ठीक हो जाओगे।

गुरु की हो भक्ति वैसी जैसी श्याम श्यामा !
या करो गुरु की ही भक्ति आठु यामा !!
भावार्थ -अपने इष्ट श्यामा -श्याम एवं गुरु की एक जैसी भक्ति ही करनी चाहिये अथवा केवल गुरु की ही भक्ति करें !
ये भक्ति निरन्तर बनी रहे इस का ध्यान रखना है !
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज .


वे हमारी रक्षा करते हैं, वे हमारी रक्षा कर रहें हैं, वे आगे भी हमारी रक्षा करेंगे इस पर विश्वास कर लो।
----श्री महाराजजी।


"अरे कृतघ्न मन! धिक्कार है तुझे! जिसने तुझ नीच,अकिंचन व अधम को अपने श्रीचरणों में स्थान दिया, तूने उस शरण्य की कृपा को भुला दिया। उनको ही दुखी करने लगा। सच है जहाँ कृपालुता, क्षमाशीलता की पराकाष्ठा है, वहीं तूने अधमता व अपराधशीलता की पराकाष्ठा की है। क्यों न आज से तू अपने प्यारे प्रभु को ही प्रसन्न करने का एक मात्र बीड़ा उठाकर चल।"

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...