"अरे कृतघ्न मन! धिक्कार है तुझे! जिसने तुझ नीच,अकिंचन व अधम को अपने श्रीचरणों में स्थान दिया, तूने उस शरण्य की कृपा को भुला दिया। उनको ही दुखी करने लगा। सच है जहाँ कृपालुता, क्षमाशीलता की पराकाष्ठा है, वहीं तूने अधमता व अपराधशीलता की पराकाष्ठा की है। क्यों न आज से तू अपने प्यारे प्रभु को ही प्रसन्न करने का एक मात्र बीड़ा उठाकर चल।"
This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Friday, September 7, 2012
"अरे कृतघ्न मन! धिक्कार है तुझे! जिसने तुझ नीच,अकिंचन व अधम को अपने श्रीचरणों में स्थान दिया, तूने उस शरण्य की कृपा को भुला दिया। उनको ही दुखी करने लगा। सच है जहाँ कृपालुता, क्षमाशीलता की पराकाष्ठा है, वहीं तूने अधमता व अपराधशीलता की पराकाष्ठा की है। क्यों न आज से तू अपने प्यारे प्रभु को ही प्रसन्न करने का एक मात्र बीड़ा उठाकर चल।"
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