Monday, February 11, 2013

अरे मैं तो तैयार बैठा हूँ देने के लिए, कोई लेने वाला तो हो .......
अनाधिकारी को भी अधिकारी मैं बना दूंगा , कोई बात तो माने मेरी........
किसी को परवाह ही नहीं अपनी , तो मैं क्या कर लूँगा ?
.............श्री महाराजजी।
अरे मैं तो तैयार बैठा हूँ देने के लिए, कोई लेने वाला तो हो .......
अनाधिकारी को भी अधिकारी मैं बना दूंगा , कोई बात तो माने मेरी........ 
किसी को परवाह ही नहीं अपनी , तो मैं क्या कर लूँगा ?
.............श्री महाराजजी।

 

आ जाओ मेरे प्यारे बच्चों ......
चिंता न करो.......
मैं हूँ न?......
बस मुझसे प्यार ही तो करना है तुम्हे....येन केन प्रकारेण.......
बाकी सब मैं देख लूँगा........
...
जैसे संसार मैं प्यार करते हैं ठीक वैसे ही ...
लेकिन शर्त वही रहेगी...नित्य , निष्काम , अनन्य ...
मन केवल हरि-गुरु में ही रखो बस .. काम हो जायेगा...
अभ्यास तो करना ही पड़ेगा तुम सब को ..
अनंत जन्म का गलत अभ्यास जो कर रखा है तुम सब ने इसीलिए...

"बरबस पतितन देत प्रेम रस , अस रसिकन सरताज "

हरी गुरु चिंतन साधना , साध्य प्रेम निष्काम।
दिव्य दरस की प्यास नित , बाढ़े आठों याम।।

------तुम्हारा कृपालु।

 

न अपने भोजन की चिंता है न विश्राम की, सोते, जागते उठते-बैठते केवल एक ही काम है- कृपा कृपा कृपा कृपा.
न अपने भोजन की चिंता है न विश्राम की, सोते, जागते उठते-बैठते केवल एक ही काम है- कृपा कृपा कृपा कृपा.

 

भगवान् की भावना हो, फिर कोई नाम लो , सब ठीक है ! भगवान् ने शर्त ही नहीं रखी कि मेरा यह नाम है ! वे तो सब नामों में ऐसे बैठे रहते हैं जैसे दूध में घी ! जितने प्रतिशत तुम उन्हें मानोगे उतने प्रतिशत तुम्हें प्यार हो जायेगा और उतने ही प्रतिशत उसमें तुम्हें आनन्द की प्राप्ति होगी !

*******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ********
भगवान् की भावना हो, फिर कोई नाम लो , सब ठीक है ! भगवान् ने शर्त ही नहीं रखी कि मेरा यह नाम है ! वे तो सब नामों में ऐसे बैठे रहते हैं जैसे दूध में घी ! जितने प्रतिशत तुम उन्हें मानोगे उतने प्रतिशत तुम्हें प्यार हो जायेगा और उतने ही प्रतिशत उसमें तुम्हें आनन्द की प्राप्ति होगी !

*******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ********

 

 




किसी पर क्रोध न करो ! क्रोध पर क्रोध करो !
-------श्री महाराज जी।
समय का सदा सदुपयोग करना मनुष्य का सर्वोत्तम सिद्धान्त है ! सदुपयोग सत पदार्थों के चिन्तन से ही सम्भव है ! सत्य पदार्थ केवल श्यामा श्याम का नाम , रूप,लीला , गुण, धाम एवं जन ही हैं !
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
समय का सदा सदुपयोग करना मनुष्य का सर्वोत्तम सिद्धान्त है ! सदुपयोग सत पदार्थों के चिन्तन से ही सम्भव है ! सत्य पदार्थ केवल श्यामा श्याम का नाम , रूप,लीला , गुण, धाम एवं जन ही हैं !
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.

 
 

जो कर्म भगवान् में प्रेम उत्पन्न नहीं करता , वह अधर्म ही है !

-------- श्री महाराज जी।
जो कर्म भगवान् में प्रेम उत्पन्न नहीं करता , वह अधर्म ही है ! 
( श्री महाराज जी। )

 



मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...