Monday, February 11, 2013

भगवान् की भावना हो, फिर कोई नाम लो , सब ठीक है ! भगवान् ने शर्त ही नहीं रखी कि मेरा यह नाम है ! वे तो सब नामों में ऐसे बैठे रहते हैं जैसे दूध में घी ! जितने प्रतिशत तुम उन्हें मानोगे उतने प्रतिशत तुम्हें प्यार हो जायेगा और उतने ही प्रतिशत उसमें तुम्हें आनन्द की प्राप्ति होगी !

*******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ********
भगवान् की भावना हो, फिर कोई नाम लो , सब ठीक है ! भगवान् ने शर्त ही नहीं रखी कि मेरा यह नाम है ! वे तो सब नामों में ऐसे बैठे रहते हैं जैसे दूध में घी ! जितने प्रतिशत तुम उन्हें मानोगे उतने प्रतिशत तुम्हें प्यार हो जायेगा और उतने ही प्रतिशत उसमें तुम्हें आनन्द की प्राप्ति होगी !

*******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ********

 

 




किसी पर क्रोध न करो ! क्रोध पर क्रोध करो !
-------श्री महाराज जी।
समय का सदा सदुपयोग करना मनुष्य का सर्वोत्तम सिद्धान्त है ! सदुपयोग सत पदार्थों के चिन्तन से ही सम्भव है ! सत्य पदार्थ केवल श्यामा श्याम का नाम , रूप,लीला , गुण, धाम एवं जन ही हैं !
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
समय का सदा सदुपयोग करना मनुष्य का सर्वोत्तम सिद्धान्त है ! सदुपयोग सत पदार्थों के चिन्तन से ही सम्भव है ! सत्य पदार्थ केवल श्यामा श्याम का नाम , रूप,लीला , गुण, धाम एवं जन ही हैं !
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.

 
 

जो कर्म भगवान् में प्रेम उत्पन्न नहीं करता , वह अधर्म ही है !

-------- श्री महाराज जी।
जो कर्म भगवान् में प्रेम उत्पन्न नहीं करता , वह अधर्म ही है ! 
( श्री महाराज जी। )

 



किशोरी तोरे, चरनन की बलि जाऊँ |
जिन युग – चरण अरुणिमा – उपमा, पचिहारी नहिं पाऊँ |
जपा गुलाल प्रवाल आदि की, उपमा देत लजाऊँ |
मृदुता में गुलाब नवनी की, समता लखि न सकाऊँ |
जिन चरनन को चापत हरि नित, का महिमा मैं गाउँ |
यह ‘कृपालु’ की चाह रैन दिन, चरनन ध्यान लगाऊँ ||

भावार्थ - हे किशोरी जी ! मैं तुम्हारे चरणों की बलैया लेता हूँ | इन चरणकमलों की लालिमा की उपमा ढूँढकर थक गया, कहीं नहीं पाता | इन्द्र वधूटी ( एक लाल रंग का बरसाती कीड़ा ), गुलाल एवं आम के नये पते आदि की उपमा देने में लज्जा लगती है | कोमलता में गुलाब एवं मक्खन भी फीके लगते हैं | जिन चरणों को निरंतर ही श्रीकृष्ण दबाया करते हैं, उन चरणों की महिमा मैं क्या कहूँ ? ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मेरी यही अभिलाषा है कि मैं दिन – रात इन्हीं चरणों का ध्यान किया करूँ |


( प्रेम रस मदिरा श्रीराधा – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति.
किशोरी तोरे, चरनन की बलि जाऊँ |
जिन युग – चरण अरुणिमा – उपमा, पचिहारी नहिं पाऊँ |
जपा गुलाल प्रवाल आदि की, उपमा देत लजाऊँ |
मृदुता में गुलाब नवनी की, समता लखि न सकाऊँ |
जिन चरनन को चापत हरि नित, का महिमा मैं गाउँ |
यह ‘कृपालु’ की चाह रैन दिन, चरनन ध्यान लगाऊँ ||


भावार्थ  -  हे किशोरी जी ! मैं तुम्हारे चरणों की बलैया लेता हूँ | इन चरणकमलों की लालिमा की उपमा ढूँढकर थक गया, कहीं नहीं पाता | इन्द्र वधूटी ( एक लाल रंग का बरसाती कीड़ा ), गुलाल एवं आम के नये पते आदि की उपमा देने में लज्जा लगती है | कोमलता में गुलाब एवं मक्खन भी फीके लगते हैं | जिन चरणों को निरंतर ही श्रीकृष्ण दबाया करते हैं, उन चरणों की महिमा मैं क्या कहूँ ? ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मेरी यही अभिलाषा है कि मैं दिन – रात इन्हीं चरणों का ध्यान किया करूँ |

 
( प्रेम रस मदिरा   श्रीराधा   –  माधुरी )
   जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

 

Never hurt another's feeling out of pride and rudeness. Think before you speak. Never try to find an excuse for your mistakes, and never try to blame others for your mistakes. Admit your mistake when you are wrong. "
----------SHRI MAHARAJ JI.

"Never hurt another's feeling out of pride and rudeness. Think before you speak. Never try to find an excuse for your mistakes, and never try to blame others for your mistakes. Admit your mistake when you are wrong. "
----------SHRI MAHARAJ JI.

 
Only the person whose mind is not attached to any material object attains Supreme Peace.
जिसका मन संसार के किसी पदार्थ में न हो, एसा व्यक्ति ही परम शान्ति का अधिकारी बन सकता है।
-------Jagadguru shri kripalu ji maharaj.
Only the person whose mind is not attached to any material object attains Supreme Peace.
जिसका मन संसार के किसी पदार्थ में न हो, एसा व्यक्ति ही परम शान्ति का अधिकारी बन सकता है।
-------Jagadguru shri kripalu ji maharaj.

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...