Friday, March 1, 2013

येषां संस्मरणात पुंसां सधयःशुद्धयन्ति वै गृहाः
किं पुनदर्शनस्पर्शपादशौचासनादिभिः (भागवत - 1 -19 -33 )

शास्त्र कहते है की गुरु के स्मरण मात्र से ही अन्तः करण रूपी गृह शुद्ध हो जाता है. फिर उनके साक्षात् दर्शन, उनके श्री चरणों का स्पर्श, उनके श्री युगल चरणों का प्रक्षालन, उनका सानिध्य एवं सत्संग आदि मिल जाये, ये तो हम कलयुग के अधम जीवो का परम सौभाग्य है, ये विशेष भगवत्कृपा है.
येषां संस्मरणात पुंसां सधयःशुद्धयन्ति वै गृहाः 
किं पुनदर्शनस्पर्शपादशौचासनादिभिः (भागवत - 1 -19 -33 ) 

शास्त्र कहते है की गुरु के स्मरण मात्र से ही अन्तः करण रूपी गृह शुद्ध हो जाता है. फिर उनके साक्षात् दर्शन, उनके श्री चरणों का स्पर्श, उनके श्री युगल चरणों का प्रक्षालन, उनका सानिध्य एवं सत्संग आदि मिल जाये, ये तो हम कलयुग के अधम जीवो का परम सौभाग्य है, ये विशेष भगवत्कृपा है.
Be a lover of God, not of the world. Do not beg your God and Master for health, wealth and material goods. When you bow to God but desire the world, you prove that you love not the Creator, but His creation. If you insist on asking God for something, ask the same thing as Prahlad: "God! Kindly destroy the very seed of desire that exists in my heart."

- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.
Be a lover of God, not of the world. Do not beg your God and Master for health, wealth and material goods. When you bow to God but desire the world, you prove that you love not the Creator, but His creation. If you insist on asking God for something, ask the same thing as Prahlad: "God! Kindly destroy the very seed of desire that exists in my heart."
 
- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.

 
मेरे गुरुवर भक्तिरस अवतार..................
मेरे गुरुवर भक्तिरस अवतार..................

जगद्गुरु प्रभु श्री कृपालु जी महाराज हमें समझाते हैं -

**अकेले में सोचो, कमरा बंद करके. जब तक माया के अंडर में है जीव तब तक कौन सी खराबी उसमे नहीं है. कामनाएं नहीं है, कि क्रोध नहीं है, कि लोभ नहीं है, कि मोह नहीं है.. कौन सा दोष नहीं है. अनंत दोष भरे हैं उसमे से एक दोष कोई कह दे, तो क्यों फीलिंग होती है? अपना सर्वनाश क्यों करता है साधक? क्योकि फील करोगे तो मन गन्दा होगा. उससे हानि होगी शरीर को भी. क्रोध से. ये साइंस कहती है. तुम आत्मा हो...**

-जगद्गुरु प्रभु श्री कृपालु जी महाराज.
जगद्गुरु प्रभु श्री कृपालु जी महाराज हमें समझाते हैं -
 
**अकेले में सोचो, कमरा बंद करके. जब तक माया के अंडर में है जीव तब तक कौन सी खराबी उसमे नहीं है. कामनाएं नहीं है, कि क्रोध नहीं है, कि लोभ नहीं है, कि मोह नहीं है.. कौन सा दोष नहीं है. अनंत दोष भरे हैं उसमे से एक दोष कोई कह दे, तो क्यों फीलिंग होती है? अपना सर्वनाश क्यों करता है साधक? क्योकि फील करोगे तो मन गन्दा होगा. उससे हानि होगी शरीर को भी. क्रोध से. ये साइंस कहती है. तुम आत्मा हो...**
 
-जगद्गुरु प्रभु श्री कृपालु जी महाराज.
गुरु एवं भगवान में कभी भी भेद मत मानो, सदा उन्हें अपने साथ ही मानो, अन्यथा मन मक्कारी करने लगेगा। मन को बाँधो । मन के दास न बनो । कुसंग से सदा बचो तथा मन को सदा अपने गुरु में ही लगाये रहो । मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।
...........जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज.
गुरु एवं भगवान में कभी भी भेद मत मानो, सदा उन्हें अपने साथ ही मानो, अन्यथा मन मक्कारी करने लगेगा। मन को बाँधो । मन के दास  न बनो । कुसंग से सदा बचो तथा मन को सदा अपने गुरु में ही लगाये रहो । मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।
...........जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज.

 

साधना का पहला शत्रु है - अहंकार। जहाँ अहंकार आया , समझो दीनता खत्म। दीनता ख़त्म तो समझो कि साधना चौपट हो गयी। आपको उपासना भगवान् की ही करनी है। संसार में बस व्यवहार करना है। बाहर से आदर कीजिये , परन्तु अटैचमेंट न हो , लेकिन ईश्वरीय क्षेत्र में अनन्य प्रेम होना चाहिए।
~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~
साधना का पहला शत्रु  है - अहंकार। जहाँ अहंकार आया , समझो दीनता खत्म। दीनता ख़त्म तो समझो कि साधना चौपट हो गयी। आपको उपासना भगवान् की ही करनी है। संसार में बस व्यवहार करना है। बाहर से आदर कीजिये , परन्तु अटैचमेंट न हो , लेकिन ईश्वरीय क्षेत्र में अनन्य प्रेम होना चाहिए।
~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~

 

व्यवहार उतना मीठा और एक्टिंग में हो कि संसार वाले सदैव खुश रहें और तुम ऊपरी चिंताओं से बचे रहो , कम से कम बोलना चाहिये।
:::::::::::जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज::::::::::
व्यवहार उतना मीठा और एक्टिंग में हो कि संसार वाले सदैव खुश रहें और तुम ऊपरी चिंताओं से बचे रहो , कम से कम बोलना चाहिये। 
:::::::::::जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज::::::::::

 
 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...