Friday, March 1, 2013

गुरु एवं भगवान में कभी भी भेद मत मानो, सदा उन्हें अपने साथ ही मानो, अन्यथा मन मक्कारी करने लगेगा। मन को बाँधो । मन के दास न बनो । कुसंग से सदा बचो तथा मन को सदा अपने गुरु में ही लगाये रहो । मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।
...........जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज.
गुरु एवं भगवान में कभी भी भेद मत मानो, सदा उन्हें अपने साथ ही मानो, अन्यथा मन मक्कारी करने लगेगा। मन को बाँधो । मन के दास  न बनो । कुसंग से सदा बचो तथा मन को सदा अपने गुरु में ही लगाये रहो । मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।
...........जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज.

 

साधना का पहला शत्रु है - अहंकार। जहाँ अहंकार आया , समझो दीनता खत्म। दीनता ख़त्म तो समझो कि साधना चौपट हो गयी। आपको उपासना भगवान् की ही करनी है। संसार में बस व्यवहार करना है। बाहर से आदर कीजिये , परन्तु अटैचमेंट न हो , लेकिन ईश्वरीय क्षेत्र में अनन्य प्रेम होना चाहिए।
~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~
साधना का पहला शत्रु  है - अहंकार। जहाँ अहंकार आया , समझो दीनता खत्म। दीनता ख़त्म तो समझो कि साधना चौपट हो गयी। आपको उपासना भगवान् की ही करनी है। संसार में बस व्यवहार करना है। बाहर से आदर कीजिये , परन्तु अटैचमेंट न हो , लेकिन ईश्वरीय क्षेत्र में अनन्य प्रेम होना चाहिए।
~~~~~जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज~~~~~

 

व्यवहार उतना मीठा और एक्टिंग में हो कि संसार वाले सदैव खुश रहें और तुम ऊपरी चिंताओं से बचे रहो , कम से कम बोलना चाहिये।
:::::::::::जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज::::::::::
व्यवहार उतना मीठा और एक्टिंग में हो कि संसार वाले सदैव खुश रहें और तुम ऊपरी चिंताओं से बचे रहो , कम से कम बोलना चाहिये। 
:::::::::::जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज::::::::::

 
 

Tuesday, February 26, 2013

JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ SAYS:

THE DESIRED GOAL OF A SOUL IS TO RECEIVE THE SELFLESS DIVINE LOVE OF RADHAKRISHN. THEY ARE THE SOUL OF YOUR SOUL AND ARE ETERNALLY RELATED TO YOU.KNOWING THIS, YOU HAVE TO DEVELOP A DEEP DESIRE TO SELFLESSLY SERVE THEM AND LOVE THEM AND STRENGTHEN YOUR FAITH IN THEM.
JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ SAYS:
 
THE DESIRED GOAL OF A SOUL IS TO RECEIVE THE SELFLESS DIVINE LOVE OF RADHAKRISHN. THEY ARE THE SOUL OF YOUR SOUL AND ARE ETERNALLY RELATED TO YOU.KNOWING THIS, YOU HAVE TO DEVELOP A DEEP DESIRE TO SELFLESSLY SERVE THEM AND LOVE THEM AND STRENGTHEN YOUR FAITH IN THEM.

 

संसार में हमें 'सुख' दिखायी पड़ता है, पर वास्तव में संसार का सुख ,सुख नहीं धोखा है।
-----श्री महाराजजी।
संसार में हमें 'सुख' दिखायी पड़ता है, पर वास्तव में संसार का सुख ,सुख नहीं धोखा है।
 -----श्री महाराजजी।

 

लोकरंजन का लक्ष्य भी घोर कुसंग है। प्राय: साधक थोड़ा बहुत समझ लेने पर अथवा थोड़ा बहुत अनुभव कर लेने पर, उसे दुनिया के सामने गाता फिरता है,एवं धीरे धीरे यह अभिमान का रूप धारण कर लेता है,जिसके परिणाम-स्वरूप साधक की वास्तविक निधि ,दीनता छिन जाती है एवं हँसी-हँसी में लोकरंजन की बुद्धि परिपक्व हो जाती है। अतएव साधक को लोकरंजन रूपी महाव्याधि से बचना चाहिये।

-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
लोकरंजन का लक्ष्य भी घोर कुसंग है। प्राय: साधक थोड़ा बहुत समझ लेने पर अथवा थोड़ा बहुत अनुभव कर लेने पर, उसे दुनिया के सामने गाता फिरता है,एवं धीरे धीरे यह अभिमान का रूप धारण कर लेता है,जिसके परिणाम-स्वरूप साधक की वास्तविक निधि ,दीनता छिन जाती है एवं हँसी-हँसी में लोकरंजन की बुद्धि परिपक्व हो जाती है। अतएव साधक को लोकरंजन रूपी महाव्याधि से बचना चाहिये।
 
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

 
 
 
 

किसी को कभी किसी जन्म में श्रोत्रिय ब्रहमनिष्ठ महापुरुष गुरु मिल जाये और वह श्रद्धालु विरक्त जिज्ञासु उसे गुरु मान ले यह बहुत बड़ी भगवदकृपा है। गुरु शिष्य नहीं बनायेगा,शिष्य को मन से गुरु मानना होगा। कोई महापुरुष किसी जीव को शिष्य तब तक न बनायेगा जब तक उसका अंत:करण पूर्णतया शुद्ध न हो जायेगा।

-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
किसी को कभी किसी जन्म में श्रोत्रिय ब्रहमनिष्ठ महापुरुष गुरु मिल जाये और वह श्रद्धालु विरक्त जिज्ञासु उसे गुरु मान ले यह बहुत बड़ी भगवदकृपा है। गुरु शिष्य नहीं बनायेगा,शिष्य को मन से गुरु मानना होगा। कोई महापुरुष किसी जीव को शिष्य तब तक न बनायेगा जब तक उसका अंत:करण पूर्णतया शुद्ध न हो जायेगा।
 
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...