Monday, April 8, 2013

दीनता का दूसरा नाम ही साधना है।
-----श्री महाराजजी।
दीनता का दूसरा नाम ही साधना है।
 -----श्री महाराजजी।

 
 

If you attempt to understand the spiritual truths without guidance from Saints, then instead of freeing yourself from ignorance, you will get more and more confused and entangled. When you attempt to find the answer to one question from the scriptures on your own, you will end up tormented by a thousand other questions. This is because you are unable to grasp the secret of these divine texts.
------jagadguru shri kripalu ji maharaj.
If you attempt to understand the spiritual truths without guidance from Saints, then instead of freeing yourself from ignorance, you will get more and more confused and entangled. When you attempt to find the answer to one question from the scriptures on your own, you will end up tormented by a thousand other questions. This is because you are unable to grasp the secret of these divine texts. 
------jagadguru shri kripalu ji maharaj.

 

श्यामा श्याम निरन्तर गुरु के अन्दर बाहर सन्निहित हैं इस कारण गुरु धाम ही हरि धाम है।
---श्री महाराज जी।
श्यामा श्याम निरन्तर गुरु के अन्दर बाहर सन्निहित हैं इस कारण गुरु धाम ही हरि धाम है।
---श्री महाराज जी।

 

किसी महापुरुष या साधक का अपमान करना भी घोर कुसंग है। साधकगण बहुधा अपने आपको तथा अपने महापुरुष को ही सत्य समझते हैं , शेष साधकों एवं महापुरुषों में दुर्भावना - पूर्ण निर्णय देते हैं । यह महान भूल है । इससे नामापराध हो जायेगा जिसके परिमाणस्वरूप अपना महापुरुष तथा अपना इष्टदेव भी प्रसन्न न हो सकेगा ;
क्योंकि समस्त महापुरुष तथा भगवान् परस्पर एक ही हैं।
.........(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज).
किसी महापुरुष या साधक का अपमान करना भी घोर कुसंग है। साधकगण बहुधा अपने आपको तथा अपने महापुरुष को ही सत्य समझते हैं , शेष साधकों एवं महापुरुषों में दुर्भावना - पूर्ण निर्णय देते हैं । यह महान भूल है । इससे नामापराध हो जायेगा जिसके परिमाणस्वरूप अपना महापुरुष तथा अपना इष्टदेव भी प्रसन्न न हो सकेगा ; 
क्योंकि समस्त महापुरुष तथा भगवान् परस्पर एक ही हैं।
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)

श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
एक बात बड़ी इंपोर्टेंट| हरि, गुरु को अपने साथ ,सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास
पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट| अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।
श्री महाराजजी के श्रीमुख से:
 एक बात बड़ी इंपोर्टेंट| हरि, गुरु को अपने साथ ,सर्वत्र ,सर्वदा महसूस करो। इसका अभ्यास करो। दस दिन ,बीस दिन, महीने, छ: महीने में यह अभ्यास पक्का हो जायेगा कि हम अकेले नहीं हैं। हम जहां अपने को अकेला मानते हैं वहीं पाप कर बैठते हैं - प्राइवेट| अरे, वेद कहता है, अगर तुम गुरु को न भी मानो तो भगवान को तो मानो कि अंत:करण में वो नित्य हमारे साथ है, हमारे आइडिया नोट कर रहा है। तो हरि-गुरु को अपने साथ अपना रक्षक मानो। यह फीलिंग हो - हम अकेले नहीं हैं,सदा वे हमारे साथ है।गलत काम न करें ,गलत चिंतन न करें । सावधानी आयेगी तो अपराध से बचेंगे।

 

कलियुग में एक मात्र संकीर्तन ही साधना निर्धारित की गई है। यदि यह भी मान लें कि कलियुग में अन्य साधनों से भगवत्प्राप्ति हो सकती है तब भी विचारणीय हो जाता है कि इतनी अमूल्य , सरल एवं शीघ्र फल प्रदान करने वाली संकीर्तन साधना को छोड़कर क्लिष्ट अन्य साधनाओं में प्रवृत होने में बुद्धिमता ही क्या है ?'
...........(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज).

' कलियुग में एक मात्र संकीर्तन ही साधना निर्धारित की गई है। यदि यह भी मान लें कि कलियुग में अन्य साधनों से भगवत्प्राप्ति हो सकती है तब भी विचारणीय हो जाता है कि इतनी अमूल्य , सरल एवं शीघ्र फल प्रदान करने वाली संकीर्तन साधना को छोड़कर क्लिष्ट अन्य साधनाओं में प्रवृत होने में बुद्धिमता ही क्या है ?'
(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)

 



कृष्ण मुस्कुराये कहा गोविंद राधे |
मैंने जानि जानि के ना पोता बता दे ||

भावार्थ- श्रीकृष्ण ने स्मित हास्य के साथ कहा स्वामी मैंने जानबूझकर ऐसा किया है |
 
निज धाम जाने के गोविंद राधे |
पूर्व व्याध मारेगा बाण बता दे ||

भावार्थ- यदि मैं दोनों चरणों के तलवों में खीर पोत लेता तो आपके आशीर्वाद से मुझे शरीर के किसी स्थान पर कोई अस्त्र असर ही न करता | अब अपने धाम जाने के पूर्व एक व्याध द्वारा मारा गया बाण इस कार्य का निमित बनेगा |

श्री गुरु चरणों में गोविंद राधे |
शरणागति हो तो हरि ते मिला दे ||

भावार्थ- यदि जीव की गुरु चरणों में शरणागति हो जाय तो उसे निशित रूप से हरि दर्शन प्राप्त हो जायेगा |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).
कृष्ण मुस्कुराये कहा गोविंद राधे |
मैंने जानि जानि के ना पोता बता दे ||

भावार्थ- श्रीकृष्ण ने स्मित हास्य के साथ कहा स्वामी मैंने जानबूझकर ऐसा किया है |

निज धाम जाने के गोविंद राधे |
पूर्व व्याध मारेगा बाण बता दे ||

भावार्थ- यदि मैं दोनों चरणों के तलवों में खीर पोत लेता तो आपके आशीर्वाद से मुझे शरीर के किसी स्थान पर कोई अस्त्र असर ही न करता | अब अपने धाम जाने के पूर्व एक व्याध द्वारा मारा गया बाण इस कार्य का निमित बनेगा |

श्री गुरु चरणों में गोविंद राधे |
शरणागति हो तो हरि ते मिला दे ||

भावार्थ- यदि जीव की गुरु चरणों में शरणागति हो जाय तो उसे निशित रूप से हरि दर्शन प्राप्त हो जायेगा |

..................राधा गोविंद गीत ( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ).................

 

    मन का अटैचमेंट किसमें करें?

    एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...