Thursday, April 11, 2013

The spiritual aspirant should strictly follow the path advised by his Guru in order to get rid of his mental ailments and attain his supreme goal. He should be so busy taking his medicine in the form of devotional practice that there is no idle time left to find faults in others. The spiritual aspirant must be extremely vigilant to avoid this dangerous, unwholesome habit of contemplating others’ faults.
------jagaddguru shri kripalu ji maharaj.
The spiritual aspirant should strictly follow the path advised by his Guru in order to get rid of his mental ailments and attain his supreme goal. He should be so busy taking his medicine in the form of devotional practice that there is no idle time left to find faults in others. The spiritual aspirant must be extremely vigilant to avoid this dangerous, unwholesome habit of contemplating others’ faults.
------jagaddguru shri kripalu ji maharaj.

 

करू मन छिन - छिन , हरि - गुरु सुमिरन ।
जाने कब जाय छिन , सुर दुर्लभ तन ।।
------श्री महाराज जी।
करू मन छिन - छिन , हरि - गुरु सुमिरन । 
जाने कब जाय छिन , सुर दुर्लभ तन ।।
---श्री महाराज जी।

 

महापुरुष को समझने की जटिल समस्या यदि सुलझ जाये , तो बिना किसी किन्तु , परन्तु , लेकिन , मगर , चूकिं के ही जीव सीधे अपने लक्ष्य पर पहुँच जाय।
 ...........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
महापुरुष  को समझने की जटिल समस्या यदि सुलझ जाये , तो बिना किसी किन्तु , परन्तु , लेकिन , मगर , चूकिं के ही जीव सीधे अपने लक्ष्य पर पहुँच जाय।
(-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)


एक साधक का प्रश्न : महाराज जी आप कहते हैं कि मानव शरीर के पश्चात मानवेतर योनियों में जन्म लेना पड़ता है। क्या कोई ऐसी स्थिति है जब किसी के बारे में यह कहा जा सके कि इस जन्म में उसे मानव देह ही मिलेगा।

श्री महाराज जी द्वारा उत्तर : जिस व्यक्ति का चिंतन आधे से अधिक समय में भगवदीय हो जायेगा उसके बारे में यह निश्चित है कि अगला जन्म उसको मानव देह ही मिलेगा।
एक साधक का प्रश्न : महाराज जी आप कहते हैं कि मानव शरीर के पश्चात मानवेतर योनियों में जन्म लेना पड़ता है। क्या कोई ऐसी स्थिति है जब किसी के बारे में यह कहा जा सके कि इस जन्म में उसे मानव देह ही मिलेगा।

श्री महाराज जी द्वारा उत्तर : जिस व्यक्ति का चिंतन आधे से अधिक समय में भगवदीय हो जायेगा उसके बारे में यह निश्चित है कि अगला जन्म उसको मानव देह ही मिलेगा।

श्री श्यामा श्याम के दिव्य प्रेम रस का निरंतर पान करो।
---श्री महाराज जी।

 

    जिस महापुरुष के सानिध्य में हृदय में भगवत प्रेम बढ़ने लगे एवं हृदय पिघलने लगे समझो की वह वास्तविक महापुरुष है.
    With Whomsoever Saint’s Company, Your heart melts and Your love for God Increases, Then that saint is the True Saint.
    ~~~~Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj~~~~
    जिस महापुरुष के सानिध्य में हृदय में भगवत प्रेम बढ़ने लगे एवं हृदय पिघलने लगे समझो की वह वास्तविक महापुरुष है.
With Whomsoever Saint’s Company, Your heart melts and Your love for God Increases, Then that saint is the True Saint.
~~~~Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj~~~~

     

    तुम लोग अपने मन को अपने शरण्य में रखो। परस्पर प्यार से रहो एवं स्वयं में दोष देखो, अपनी-अपनी सेवा करो। यदि मुझे सुख देना चाहते हो तो, सदा अपने मन को राग द्वेष रहित रखो एवं शरण्य से प्यार बढ़ाओ। मैं सदा तुम लोगो को याद करता हूँ, तथा एक-एक क्षण का आइडिया नोट करता हूँ। वेद से लेकर रामायण तक अनंत कोटि-कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान एक ही है अत: गुरु सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
    *******जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु********
    तुम लोग अपने मन को अपने शरण्य में रखो। परस्पर प्यार से रहो एवं स्वयं में दोष देखो, अपनी-अपनी सेवा करो। यदि मुझे सुख देना चाहते हो तो, सदा अपने मन को राग द्वेष रहित रखो एवं शरण्य से प्यार बढ़ाओ। मैं सदा तुम लोगो को याद करता हूँ, तथा एक-एक क्षण का आइडिया नोट करता हूँ। वेद से लेकर रामायण तक अनंत कोटि-कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान एक ही है अत: गुरु सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
*******जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु********

    मन का अटैचमेंट किसमें करें?

    एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...