Saturday, June 8, 2013

"God has gifted us a human body due to His compassionate nature. Reflect upon this repeatedly; reflect upon this fact thousands of times. We are suffering because we fail to contemplate properly. What are we thinking? "HOW SHOULD I SPEND MY TIME?" We are constantly planning on how to earn more wealth, constructing a house and leaving behind a large fortune for wife and kids. THERE SEEMS TO BE NO CONCERN ABOUT OUR OWN SPIRITUAL UPLIFTMENT. We must think about why we have come to this world. Our lives are wasted in planning how to make the body happy, and we work towards those plans. Still, we fail because our desires keep tormenting us. We may sleep on a bed of gold studded with diamonds, but we still suffer from inside. Happiness comes from within, not from external objects. So, there is no question of attaining happiness from the objects of the world. In fact, this world is full of stress and anxiety. The greater the wealth, beauty and talent one possesses, more are the worries."
( A part of the lecture given by maharajji at Dwarika, Gujarat)
- Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj
Whether you gently touch a piece of iron to a touchstone, or you angrily
strike the two against each other, the iron will definitely be transformed
into gold. If you eat rasgulla (an Indian sweet) out of desire, it will be
sweet; and if you forcibly put it in your mouth, it will still be sweet.
Similarly, whether poison is consumed knowingly, it will cause death; and
if someone makes you drink it without your knowledge, it will still have
the same effect. The holy river Ganga purifies even the water you spit
into Ganga, which becomes a part of the holy Ganga
Similarly, whether you have feelings of love or feelings of hatred, in both
cases the result will be the same-the mind will get absorbed in the world
and become worldly. Since eternity we have had these feelings of love
and hatred in the world. We have to make ourselves free from these two
feelings, and also keep a watch on ourselves to not be afflicted in the
future.

Wednesday, June 5, 2013

मन एक है या तो वह संसार को दे दो,या हरि-गुरु को...........
मन एक है या तो वह संसार को दे दो,या हरि-गुरु को...........
भगवान् और महापुरुष ये दोनों अकारण करुण कहलाते हैं। अकारण करुण माने बिना मूल्य लिये कृपा करना , दया करना। सकारण करुण तो सारा संसार है। हम १००० रुपया देते हैं किसी को वह १००० रूपये का सामान देता है हमको। हमने टेलीफोन कर दिया कि हमको इतने मूल्य का कपड़ा चाहिये ,साड़ी चाहिये वह लाकर पहुँचा देता है , हमारे घर , यह सकारण करुण हुआ , लेकिन अकारण करुण का मतलब यह होता है जिसमें कोई मूल्य न चुकाया जाय। यह ऐसी कृपा है कि कोई मायाबद्ध जीव नहीं कर सकता क्योंकि उसको परमानन्द की प्राप्ति नहीं हुई है इसलिये वह आनंद प्राप्ति के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं सकता , करना तो बहुत दूर की बात है।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!
भगवान् और महापुरुष ये दोनों अकारण करुण कहलाते हैं। अकारण करुण माने बिना मूल्य लिये कृपा करना , दया करना। सकारण करुण तो सारा संसार है। हम १००० रुपया देते हैं किसी को वह १००० रूपये का सामान देता है हमको। हमने टेलीफोन कर दिया कि हमको इतने मूल्य का कपड़ा चाहिये ,साड़ी चाहिये वह लाकर पहुँचा देता है , हमारे घर , यह सकारण करुण हुआ , लेकिन अकारण करुण का मतलब यह होता है जिसमें कोई मूल्य न चुकाया जाय। यह ऐसी कृपा है कि कोई मायाबद्ध जीव नहीं कर सकता क्योंकि उसको परमानन्द की प्राप्ति नहीं हुई है इसलिये वह आनंद प्राप्ति के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं सकता , करना तो बहुत दूर की बात है।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!
 
हम लोगों को साधकों को सदा यही समझना चाहिये कि हमसे जो अच्छा काम हो रहा है वह गुरु एवं भगवान् की कृपा से ही हो रहा है क्योंकि हम तो अनादिकाल से मायाबद्ध , घोर संसारी , घोर निकृष्ट , गंदे आइडियाज़ ( ideas ) वाले बिल्कुल गन्दगी से भरे हैं। हमसे कोई अच्छा काम हो जाये , भगवान् के लिये एक आँसू निकल जाय , महापुरुष के लिये , एक नाम निकल जाय मुख से , अच्छी भावना पैदा हो जाये उसके प्रति हमारी , यह सब गुरु कृपा से हुआ , यही मानना चाहिये। अगर वे सिद्धांत न बताते , हमको अपना प्यार न देते तो हमारी प्रवृत्ति ही क्यों होती। कभी यह न सोचें कि यह मेरा कमाल है। अन्यथा अहंकार पैदा होगा। अहंकार आया दीनता गई। दीनता गई तो भक्ति का महल ढह गया। सारे दोष भर जायेंगे एक सेकण्ड में इसलिये कोई भी भगवत्सम्बन्धी कार्य हो जाय तो उसको यही समझना चाहिये कि गुरु कृपा है , उसी से हो रहा है ताकि अहंकार न होने पाये। अगर गुरु हमको न मिला होता , उसने हमको न समझाया होता , उसने अपना प्यार - दुलार न दिया होता , आत्मीयता न दी होती तो हम ईश्वर की ओर प्रवृत ही नहीं होते। अतः अन्हीं की कृपा से सब अच्छे कार्य हो रहे हैं, ऐसा मानकर चलो।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु !!
हम लोगों को साधकों को सदा यही समझना चाहिये कि हमसे जो अच्छा काम हो रहा है वह गुरु एवं भगवान् की कृपा से ही हो रहा है क्योंकि हम तो अनादिकाल से मायाबद्ध , घोर संसारी , घोर निकृष्ट , गंदे आइडियाज़ ( ideas ) वाले बिल्कुल गन्दगी से भरे हैं। हमसे कोई अच्छा काम हो जाये , भगवान् के लिये एक आँसू निकल जाय , महापुरुष के लिये , एक नाम निकल जाय मुख से , अच्छी भावना पैदा हो जाये उसके प्रति हमारी , यह सब गुरु कृपा से हुआ , यही मानना  चाहिये। अगर वे सिद्धांत न बताते , हमको अपना प्यार न देते तो हमारी प्रवृत्ति ही क्यों होती। कभी यह न सोचें कि यह मेरा कमाल है। अन्यथा अहंकार पैदा होगा। अहंकार आया दीनता गई। दीनता गई तो भक्ति का महल ढह गया। सारे दोष भर जायेंगे एक सेकण्ड में इसलिये कोई भी भगवत्सम्बन्धी कार्य हो जाय तो  उसको यही समझना चाहिये कि गुरु कृपा है , उसी से हो रहा है ताकि अहंकार न होने पाये। अगर गुरु हमको न मिला होता , उसने हमको न समझाया होता , उसने अपना प्यार - दुलार न दिया होता , आत्मीयता न दी होती तो हम ईश्वर की ओर प्रवृत ही नहीं होते। अतः अन्हीं की कृपा से सब अच्छे कार्य हो रहे हैं, ऐसा मानकर चलो।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु !!
हम जितने क्षण मन को भगवान् में रखते हैं बस उतने क्षण ही हमारे सही हैं। शेष सब समय पाप ही तो करेंगे। इस प्रकार २४ घण्टे में कितनी देर हमारा मन भगवान् में रहता है, सोचो। बार - बार सोचना है कि मेरे पूर्व जन्मों के अनंत पाप संचित कर्म के रूप में मेरे साथ हैं। पुनः इस जन्म के भी अनंत पाप साथ हैं फिर भी हम भगवान् के आगे आँसू बहाकर क्षमा नहीं माँगते। धिक्कार है मेरी बुद्धि को। बार - बार प्रतिज्ञा करना है कि अब पुनः किसी के सदोष कहने पर बुरा नहीं मानेंगे। अभ्यास से ही सफलता मिलेगी। प्रतिदिन सोते समय सोचो - आज हमने कितनी बार ऐसे अपराध किये। दुसरे दिन सावधान होकर अपराध से बचो। ऐसे ही अभ्यास करते - करते बुरा मानना बन्द हो जाएगा।
*******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज*******
हम जितने क्षण मन को भगवान् में रखते हैं बस उतने क्षण ही हमारे सही हैं। शेष सब समय पाप ही तो करेंगे। इस प्रकार २४ घण्टे में कितनी देर हमारा मन भगवान् में रहता है, सोचो। बार - बार सोचना है कि  मेरे पूर्व जन्मों के अनंत पाप संचित कर्म के रूप में मेरे साथ हैं। पुनः इस जन्म के भी अनंत पाप साथ हैं फिर भी हम भगवान् के आगे आँसू बहाकर क्षमा नहीं माँगते। धिक्कार है मेरी बुद्धि को। बार - बार प्रतिज्ञा करना है कि अब पुनः किसी के सदोष कहने पर बुरा नहीं मानेंगे। अभ्यास से ही सफलता मिलेगी। प्रतिदिन सोते समय सोचो -  आज हमने कितनी बार ऐसे अपराध किये। दुसरे दिन सावधान होकर अपराध से बचो। ऐसे ही अभ्यास करते - करते बुरा मानना बन्द हो जाएगा। 
*******जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज*******
छोटी-छोटी गलती,छोटी-छोटी गुरु आज्ञाओं के प्रति लापरवाही,एक दिन जीव को पतन के द्वार पर खड़ा कर देती है। गुरु आज्ञा उल्लंघन करके सेवा करना भी नामापराध है।
------श्री कृपालुजी महाप्रभु।
छोटी-छोटी गलती,छोटी-छोटी गुरु आज्ञाओं के प्रति लापरवाही,एक दिन जीव को पतन के द्वार पर खड़ा कर देती है। गुरु आज्ञा उल्लंघन करके सेवा करना भी नामापराध है।
------श्री कृपालुजी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...