Monday, June 17, 2013

आनंद के सभी दास हैं। अतः श्री कृष्ण के भी सभी दास हैं। क्योंकि श्री कृष्ण का दूसरा नाम ही आनंद है।
~~~~ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ~~~~~

Saturday, June 15, 2013

God is so kind and merciful that he can give himself in exchange for the devotional service of the devotee.
भक्ति में अनन्यता परमावश्यक है। हमारे मन की आसक्ति 'भक्ति', 'भक्त', 'भगवान' के अतिरिक्त और कहीं नहीं होनी चाहिए।
------श्री कृपालु महाप्रभु।
एक बार आप भगवान् का नाम न लें और रूपध्यान करें , भगवत्प्राप्ति हो जायेगी। और अनंत कोटि बार आप भगवान् का नाम लें और रूपध्यान न करें, भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती।
बहु जन्म करे यदि श्रवण कीर्तन ,
तभू न पाय कृष्ण पदे प्रेमधन।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
Be always on the alert. Negligence and carelessness is the root cause of all our problems. Whether in worldly chores or in spiritual matters, one who is ever alert can alone make progress. A careless person cannot achieve anything.
........Jagadguru shri kripalu ji maharaj.
Rupdhyan is the only means to restrain the fickle mind.
चंचल मन को टिकाने का, रुपध्यान ही एकमात्र साधन है।
---SHRI MAHARAJ JI.
जीव में जब तक देहाभिमान है, तब तक वह आसानी के साथ स्वयं अपने आपको कभी भी गिरा हुआ नहीं मानता। अतएव, नित्य होश में रहने वाले एक महापुरुष की आवश्यकता होती है जो उस बेहोश साधक की त्रुटियों को बता-बता कर उसे होश में लाता रहता है।

-------श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...