Thursday, June 27, 2013

JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ...........

Krishna means 'One who attracts'. Through His beauty, Grace, sweetness, merciful nature and loving ways, the sweet Lord has the power to attract even the coldest heart, and lighten even the heaviest of minds. He showers Divine love on all, without giving any thought to whether or not the recipient is worthy of the gift.

Tuesday, June 25, 2013

ये तो प्रेम की बात है उद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है........

यहाँ सर दे के होते है सौदे, आशिकी इतनी सस्ती नहीं है॥

ये तो प्रेम की बात है उद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है.........

प्रेम वालो ने कब वक्त पूछा, उनकी पूजा में सुन ले ऐ उद्धव।। यहाँ दम दम होती है पूजा, सर झुकाने की फुर्सत नहीं है॥

ये तो प्रेम की बात है उद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है...........

जो असल में है मस्ती में डूबे, उन्हें क्या परवाह जिंदगी की। जो उतरती है चढ्ती है मस्ती, वो हकीकत में मस्ती नहीं है॥

ये तो प्रेम की बात है उद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है............

जिनकी नज़रो में है श्याम प्यारे, वो तो रहते हैं जग से न्यारे। जिनकी नजरो में मोहन समाये,
वो नज़र फिर तरसती नहीं है॥

ये तो प्रेम की बात है उद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है.............
ये तो प्रेम की बात है उद्धव, बंदगी तेरे बस की नहीं है...............................
जिस समय कुसंस्कार आये उस समय और अधिक परिश्रम करना चाहिये जैसे चढ़ाई आने पर साइकिल चलाने में और अधिक जोर लगाना पड़ता है।
.......श्री महाराज जी।
जिस प्रेम के द्वारा संसार की कामना नहीं कर रहा है किन्तु उससे मुक्ति की कामना कर सकता है। मुक्ति से भी ईश्वर की प्राप्ति होती है - एकत्व मुक्ति की। लेकिन उससे भी ऊँची स्थिति है मुक्ति की भी कामना न करके भगवान् का निष्काम प्रेम चाहना।
..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
The name of God is endowed with all His powers. If one develops a firm conviction that God and His names are not two separate entities, but are both one and the same, he will certainly attain God. Therefore, you need not fall prey to the tricks of dodgy babas. First purify your heart and make it eligible to receive the grace of Guru.
..........JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
भगवान् केवल भाव नोट करते हैं , क्रिया नहीं।
......श्री महाराज जी।
मन ! ‘मैं’ को मत छोड़ तू , दास जोड़ दे और |
‘मेरा’ भी रख साथ में , सो रसिकन सिरमौर ||३१||

भावार्थ – हे मन ! तू ‘मैं’ को मत छोड़ | वरन ‘मैं’ के आगे दास को और जोड़ दे (मैं दास हूँ) मेरा भी मत छोड़ | वरन मेरा के आगे रसिक शेखर श्रीकृष्ण जोड़ दे | (मेरे स्वामी)

(भक्ति शतक )
जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित |

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...